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बुद्धकालीन हो सकती हैं गढ़वार टीले की प्रतिमाएं
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आगरा। बाह के गढ़वार टीले पर रखी प्रतिमाएं। संवाद
- फोटो : Agra Dehat
बाह (आगरा)। जैतपुर के गढ़वार गांव में यमुना के किनारे ऊंचे टीले पर रखी प्रतिमाएं बुद्धकालीन हो सकती हैं। शनिवार को भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग की दो सदस्यीय टीम ने आकर इसकी छानबीन की।
गढ़वार गांव में ऊंचे टीले पर करीब 50 छोटी-बड़ी प्राचीन प्रतिमाएं रखी हैं। समाजसेवी अखिल प्रताप सिंह की सर्वे की मांग पर पुरातत्व अधीक्षक बसंत कुमार स्वर्णकार ने सहायक पुरातत्वविद जितेंद्र सिंह, आदित्य भूषण की टीम को भेजा। टीम ने प्रतिमाओं की लंबाई-चौड़ाई माफी, फोटोग्राफी की। सहायक पुरातत्वविद जितेंद्र सिंह ने बताया कि प्रथम दृष्टया देखने से मूर्तियां बौद्धधर्म से जुड़ी प्रतीत हो रही हैं।
गौरेया माता के रुप में हैं पहचान
प्रतिमा वाले गढ़वार के टीले की पहचान गौरेया माता के स्थल के रुप में है। गांव के बुजुर्ग कहते हैं कि देवी के रूप में इन प्रतिमाओं की पूजा होती है। गांव के बुजुर्ग शिव नारायन सिंह, राम सेवक सिंह, वीपी सिंह, सीपी शर्मा ने बताया कि पुरखों से सुना था कि अंग्रेजों ने मंदिर को तोड़ा था। यहां से सोने की मूर्ति ले गए थे। अवशेष के रुप में खंडित प्रतिमाएं पड़ी हैं। हर साल माघ मास में यहां धार्मिक आयोजन होते हैं।
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गढ़वार गांव में ऊंचे टीले पर करीब 50 छोटी-बड़ी प्राचीन प्रतिमाएं रखी हैं। समाजसेवी अखिल प्रताप सिंह की सर्वे की मांग पर पुरातत्व अधीक्षक बसंत कुमार स्वर्णकार ने सहायक पुरातत्वविद जितेंद्र सिंह, आदित्य भूषण की टीम को भेजा। टीम ने प्रतिमाओं की लंबाई-चौड़ाई माफी, फोटोग्राफी की। सहायक पुरातत्वविद जितेंद्र सिंह ने बताया कि प्रथम दृष्टया देखने से मूर्तियां बौद्धधर्म से जुड़ी प्रतीत हो रही हैं।
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गौरेया माता के रुप में हैं पहचान
प्रतिमा वाले गढ़वार के टीले की पहचान गौरेया माता के स्थल के रुप में है। गांव के बुजुर्ग कहते हैं कि देवी के रूप में इन प्रतिमाओं की पूजा होती है। गांव के बुजुर्ग शिव नारायन सिंह, राम सेवक सिंह, वीपी सिंह, सीपी शर्मा ने बताया कि पुरखों से सुना था कि अंग्रेजों ने मंदिर को तोड़ा था। यहां से सोने की मूर्ति ले गए थे। अवशेष के रुप में खंडित प्रतिमाएं पड़ी हैं। हर साल माघ मास में यहां धार्मिक आयोजन होते हैं।
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