{"_id":"60ff17298ebc3e584a6cf5d6","slug":"sriparas-oxygen-mockdrill-agra-news-agr501394836","type":"story","status":"publish","title_hn":"श्रीपारस में भर्ती मरीजों के परिजन बोले-‘सुबह शुरू हुई अफरातफरी, शाम चार बजे से देर रात तक निकलते रहे शव’","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
श्रीपारस में भर्ती मरीजों के परिजन बोले-‘सुबह शुरू हुई अफरातफरी, शाम चार बजे से देर रात तक निकलते रहे शव’
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आगरा। आईएमए जांच समिति को बयान दर्ज कराने वाले मरीजों के परिजनों ने सोमवार को अमर उजाला को अपना दर्द बताया। मालवीय कुंज रहने वाली गीता ग्रोवर ने बताया कि 26 अप्रैल की सुबह 11 बजे से अफरातफरी शुरू हो गई थी। सीसीटीवी कैमरे बंद कर दिए थे। शाम चार बजे से देर रात तक एक-एक करके शव लेकर परिजन जा रहे थे। सीसीटीवी कैमरे भी बंद कर दिए थे। कुछ तो गड़बड़ जरूर रही, मॉकड्रिल भी हो सकती है।
उन्होंने बताया कि मेरी ननद मीरा ग्रोवर को सांस लेने में परेशानी पर 21 अप्रैल को सुबह 11 बजे श्रीपारस हॉस्पिटल में भर्ती कराया। 22 की सुबह सात बजे फोन आया सिर में दर्द है, इलाज ठीक नहीं मिल रहा, मुझे घर ले जाओ। रात को ही आरटीपीसीआर की रिपोर्ट पॉजिटिव आने पर कोविड वार्ड में शिफ्ट कर दिया। 23 की सुबह सीसीटीवी कैमरे से मरीज को दिखाया। फोन पर पूछने पर उन्होंने बताया कि पूरे दिन दवाएं नहीं दी, इससे उनका पेट फूल गया।
24 अप्रैल को अस्पताल स्टाफ ने मधुमेह और किडनी की परेशानी की जानकारी दी। हमने डॉ. अरिन्जय जैन को विशेषज्ञ को बुलाने के लिए कहा लेकिन डॉ. अरिन्जय ने कोई जवाब नहीं दिया। 25 की शाम को ननद का फोन आया कि मुझे ठंड बहुत लग रही है, कंबल भेज दें। कंबल भेजा और उन्होंने फोन पर बताया कि यहां खाना और चाय ठंडी दी जाती है। इस पर नर्स ने फोन छीन लिया और डांट कर काट दिया। 26 की सुबह चार बजे फोन आया कि ऑक्सीजन खत्म होने वाली, इसकी व्यवस्था करो या फिर अपने मरीज को लेकर जाओ। फतेहाबाद रोड से 18 हजार रुपये में सिलिंडर लेकर आए, लेकिन मरीज को नहीं लगाई। सुबह 11 बजे से अस्पताल में अफरातफरी शुरू हो गई और स्टाफ इधर-उधर भागने लगा। कोई कुछ बता नहीं रहा था। रात आठ बजे हमें बताया कि मेरी ननद की मौत हो गई। हम जब तक रहे तब तक एक-एक करके शव निकाले जा रहे थे। श्मशान घाट तक के पांच हजार रुपये एंबुलेंस वालों ने ले लिए।
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‘वेंटिलेटर पर बेटा जिंदा था तो उसे क्यों हटाया’
रामबाग निवासी ने सुशीला देवी ने बताया कि उनके बेटे पीके उपाध्याय (47) को 23 अप्रैल को श्रीपारस हॉस्पिटल में भर्ती कराया। उस वक्त भी अस्पताल ने ऑक्सीजन की किल्लत बताई, लेकिन बेटे को भर्ती कर लिया। 25 की रात को ही ऑक्सीजन की कमी फिर बताई। 26 की शाम चार बजे हमसे कहा कि इन्हेें घर ले जाओ अब कुछ बचा नहीं है। स्ट्रेचर पर पड़े बेटे को देखा तो उसकी मौत हो चुकी थी। जब अस्पताल स्टाफ से मृत्यु प्रमाणपत्र मांगा तो उन्होंने कहा कि वेंटिलेटर पर थे तब इनमें सांस थी, इस कारण इनका यहां से मृत्यु प्रमाणपत्र नहीं बनेगा। ऐसे में बेटे को शव लेकर घर आ गई। लेकिन यह बात समझ में नहीं आई कि वेंटिलेटर पर इसमें सांस थी तो वेंटिलेटर क्यों हटाया। जब स्ट्रेचर पर शव था तब अस्पताल ने अपने यहां मौत क्यों नहीं मानी। लेकिन उस वक्त कोई सुनने को भी तैयार नहीं था। फिर घर पर मौत दर्शाकर नगर निगम से मृत्यु प्रमाणपत्र बनवाया। आईएमए जांच समिति को भी यह बात बताई है।
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उन्होंने बताया कि मेरी ननद मीरा ग्रोवर को सांस लेने में परेशानी पर 21 अप्रैल को सुबह 11 बजे श्रीपारस हॉस्पिटल में भर्ती कराया। 22 की सुबह सात बजे फोन आया सिर में दर्द है, इलाज ठीक नहीं मिल रहा, मुझे घर ले जाओ। रात को ही आरटीपीसीआर की रिपोर्ट पॉजिटिव आने पर कोविड वार्ड में शिफ्ट कर दिया। 23 की सुबह सीसीटीवी कैमरे से मरीज को दिखाया। फोन पर पूछने पर उन्होंने बताया कि पूरे दिन दवाएं नहीं दी, इससे उनका पेट फूल गया।
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24 अप्रैल को अस्पताल स्टाफ ने मधुमेह और किडनी की परेशानी की जानकारी दी। हमने डॉ. अरिन्जय जैन को विशेषज्ञ को बुलाने के लिए कहा लेकिन डॉ. अरिन्जय ने कोई जवाब नहीं दिया। 25 की शाम को ननद का फोन आया कि मुझे ठंड बहुत लग रही है, कंबल भेज दें। कंबल भेजा और उन्होंने फोन पर बताया कि यहां खाना और चाय ठंडी दी जाती है। इस पर नर्स ने फोन छीन लिया और डांट कर काट दिया। 26 की सुबह चार बजे फोन आया कि ऑक्सीजन खत्म होने वाली, इसकी व्यवस्था करो या फिर अपने मरीज को लेकर जाओ। फतेहाबाद रोड से 18 हजार रुपये में सिलिंडर लेकर आए, लेकिन मरीज को नहीं लगाई। सुबह 11 बजे से अस्पताल में अफरातफरी शुरू हो गई और स्टाफ इधर-उधर भागने लगा। कोई कुछ बता नहीं रहा था। रात आठ बजे हमें बताया कि मेरी ननद की मौत हो गई। हम जब तक रहे तब तक एक-एक करके शव निकाले जा रहे थे। श्मशान घाट तक के पांच हजार रुपये एंबुलेंस वालों ने ले लिए।
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‘वेंटिलेटर पर बेटा जिंदा था तो उसे क्यों हटाया’
रामबाग निवासी ने सुशीला देवी ने बताया कि उनके बेटे पीके उपाध्याय (47) को 23 अप्रैल को श्रीपारस हॉस्पिटल में भर्ती कराया। उस वक्त भी अस्पताल ने ऑक्सीजन की किल्लत बताई, लेकिन बेटे को भर्ती कर लिया। 25 की रात को ही ऑक्सीजन की कमी फिर बताई। 26 की शाम चार बजे हमसे कहा कि इन्हेें घर ले जाओ अब कुछ बचा नहीं है। स्ट्रेचर पर पड़े बेटे को देखा तो उसकी मौत हो चुकी थी। जब अस्पताल स्टाफ से मृत्यु प्रमाणपत्र मांगा तो उन्होंने कहा कि वेंटिलेटर पर थे तब इनमें सांस थी, इस कारण इनका यहां से मृत्यु प्रमाणपत्र नहीं बनेगा। ऐसे में बेटे को शव लेकर घर आ गई। लेकिन यह बात समझ में नहीं आई कि वेंटिलेटर पर इसमें सांस थी तो वेंटिलेटर क्यों हटाया। जब स्ट्रेचर पर शव था तब अस्पताल ने अपने यहां मौत क्यों नहीं मानी। लेकिन उस वक्त कोई सुनने को भी तैयार नहीं था। फिर घर पर मौत दर्शाकर नगर निगम से मृत्यु प्रमाणपत्र बनवाया। आईएमए जांच समिति को भी यह बात बताई है।