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मोहर्रम: आज भी शहादत की गवाही दे रही है करबला की मिट्टी से बनी तस्वीह

Tue, 10 Sep 2019 02:33 AM IST
Abhishek Saxena फहीम खान, अमर उजाला
फहीम खान, अमर उजाला Published by: Abhishek Saxena Updated Tue, 10 Sep 2019 02:33 AM IST
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Muharram witnessing martyrdom is made from Karbala ki mitti Story from Etah
करबला की मिट्टी से बनी तस्वीह शरीफ - फोटो : अमर उजाला
नवासा-ए-नबी की शहादत को भले ही सदियां बीत गई हों लेकिन उस अजीम शहादत की गवाही मारहरा का एक इमामबाड़ा आज भी दे रहा है। जहां पर करबला की मिट्टी से बनी तस्वीह शरीफ रखी है। ये तस्वीह भी कोई साधारण नहीं है। मुहर्रम की दस तारीख की शाम चार बजे तस्वीर के दाने पूरी तरह से सुर्ख हो जाते हैं। इनकी जियारत करने के लिए बड़ी दूर-दूर से लोग आते हैं।
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पैगंबर-ए-इस्लाम के दीन को बचाने के लिए नवासा-ए-नबी ने अपने अहले खानदान के साथ शहादत दी लेकिन जालिम यजीद की शर्तों को नहीं माना। आज पूरी दुनिया में हजरत इमाम हुसैन की शहादत को याद किया जा रहा है।
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एटा के मारहरा कस्बे में बड़े ही अकीदत के साथ करबला के बाकिये को याद किया जाता है। यहां पर पक्का बाग स्थित बने इमामबाड़ा में दशकों पुरानी इराक की करबला की मिट्टी लाकर बनाई गई तस्वीह मुबारक रखी है।
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Muharram witnessing martyrdom is made from Karbala ki mitti Story from Etah
मुबीन अहमद - फोटो : अमर उजाला
यहां रहने वाले सैयद निसार अहमद बताते हैं कि 1368 हिजरी में परदादा हाफिज सैयद इब्ने इमाम इस मिट्टी को लेकर आए और तस्वीह बनाई। तभी से इसे मुहर्रम की दस तरीख को सुबह रखा जाता है और शाम चार बजे ये पूरी तरह से सुर्ख हो जाती है। निसार बताते हैं कि एक शर्त है कि जिस दिन मुहर्रम होगा उसी दिन सुर्ख होगी।

निसार बताते हैं कि इस तस्वीह शरीफ को ईराक से लाए गए प्याले में ही रखा जाता है। दसवी की सुबह इसे निकाला जाता है और इसमें गुलाब जल डाला जाता है। शाम चार बजे ये पूरी गुलाब जल पूरी तरह से लाल होता है।

इसकी जियारत करने के लिए लोग आते हैं। उन्हें तबुर्रुक तकसीम किया जाता है। हाफिज नदीम बताते हैं कि इस मंजर को हम कई सालों से देख रहे हैं। ये बाकया हजरत इमाम हुसैन की शहादत को याद दिला देता है। 

कहते हैं जिसके पास हुनर होता है वह किसी का मोहताज नही होता। कुछ ऐसा ही है कस्बा के बड़ा बाजार स्थित चूड़ी वाली गली निवासी अलबत्ता के पुत्र मुबीन अहमद के साथ। मुबीन अहमद न तो बोलना जानते हैं और न ही सुनना लेकिन उनकी कारीगरी ऐसी है कि वह सबको चकित कर देते हैं। अपनी कारीगरी से वह खुद का रोजगार भी कर लेता है जिससे वह किसी पर बोझ नही बनता।

वह अपनी कारीगरी से हर वर्ष मोहर्रम के मौके पर आकर्षित ताजिए बनाते हैं। थर्माकोल की सीट व रंगीन किरकिरे की मदद से वह ताजिया को सुंदर रूप देते हैं। उनकी कारीगरी के कारण उन्हें ताजियादार अपने ताजिया बनाने के लिए बुलाकर ले जाते हैं जिसके बदले वह मुबीन को मेहनताना भी देते हैं।
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