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डीप वेन थ्रोंबोसिस: ऐसी बीमारी जिसमें सांस लेने में होती है दिक्कत और हो जाती है मौत, आगरा में बचाई गई एक जान

Thu, 02 May 2024 01:14 PM IST
धीरेन्द्र सिंह अमर उजाला न्यूज नेटवर्क, आगरा
अमर उजाला न्यूज नेटवर्क, आगरा Published by: धीरेन्द्र सिंह Updated Thu, 02 May 2024 01:14 PM IST
सार

वरिष्ठ न्यूरोसर्जन डॉ. आरसी मिश्रा ने मरीज के सिर की पहले जटिल सर्जरी की। रेडियोलोजिस्ट डॉ. पल्लव गुप्ता ने मैकेनिकल थ्रोंबोक्टोमी प्रक्रिया को अपनाया।
 

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Deep vein thrombosis surgery done in Ujala Cygnus Rainbow Hospital patient's life saved
वरिष्ठ न्यूरोसर्जन डॉ. आरसी मिश्रा - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

उजाला सिग्नस रेनबो हॉस्पिटल में डीप वेन थ्रोंबोसिस की सर्जरी कर युवक की जान बचाई है। इस बीमारी में पैरों की नसों में गांठें बन जाती हैं। सूजन और लालपन की शिकायत रहती है। मरीज को दर्द रहता है। पहली बार इस तकनीक से सर्जरी हुई है। मरीज ठीक होने पर उसे डिस्चार्ज कर दिया है।
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ग्वालियर निवासी अतुल सिंह तोमर (18) को सिर में गंभीर चोट लगने पर उजाला सिग्नस रेनबो अस्पताल भर्ती हुआ। सबसे पहले वरिष्ठ न्यूरोसर्जन डॉ. आरसी मिश्रा ने सिर की जटिल सर्जरी कर जान बचाई। इसके बाद रेडियोलॉजी विभाग के डॉ. पल्लव गुप्ता को कलर डॉप्लर जांच से डीप वेन थ्रोंबोसिस का पता लगा। इस बीमारी में खून पतला करने की दवाएं दी जाती हैं। ब्लीडिंग के चलते मरीज को दवा देने की स्थिति नहीं थी। इस पर उन्होंने डॉ. मिश्रा से बात कर मैकेनिकल थ्रोंबोक्टोमी प्रक्रिया को अंजाम दिया। इसमें बिना चीरा लगाए अतिसूक्ष्म सुई और तार पैरों तक पहुंचाकर बड़ी गांठों को निकाला गया। दो घंटे तक चली सर्जरी के बाद मरीज अब पूरी तरह सुरक्षित है। पैरों में सूजन और दर्द नहीं होने पर बुधवार को डिस्चार्ज कर दिया।
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ये होती है डीप वेन थ्रोंबोसिस बीमारी:
डॉ. पल्लव ने बताया कि पैरों में दो तरह की नसें होती हैं। एक त्वचा की ऊपरी सतह पर और दूसरी गहराई में होती है। इन्हें डीप वेंस कहते हैं। ये नसें फेफड़े और हृदय तक दूषित रक्त पहुंचाने का कार्य करती हैं। हृदय से ये रक्त शुद्ध होकर पूरे शरीर में पहुंचता है। डीप वेन थ्रोंबोसिस होने पर पैरों की इन्हीं गहराई वाली नसों में खून के थक्के जम जाते हैं। इससे दूषित रक्त फेफड़ों और हृदय तक नहीं पहुंच पाता। इससे सूजन और दर्द होने लगता है। डीवीटी के 10 फीसदी मरीजों में थक्के फेफड़ों तक पहुंचकर फंस जाते हैं, जिससे मरीज को सांस लेने में भी दिक्कत होती है। ऐसी स्थिति में मरीज की मौत हो जाती है। जानकारी के अभाव में मसाज करवाने से थक्कों का फेफड़ों में जाने का खतरा और बढ़ जाता है।
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ये हैं लक्षण:
- दर्द होना, सूजन आना।
- सांस लेने में दिक्कत होना।
- धड़कन अनियमित होना।
- सीने में दर्द, बेचैनी होना।
- खांसी के साथ खून आना।
- रक्तचाप कम होना।
- चक्कर आना, बेहोशी।
 
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