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उम्मीदवार बनाम पीएम मोदी: तब चौतरफा हमला, अब सधे निशाने पर संधान

Wed, 27 May 2015 06:22 PM IST
शरद मौर्य
शरद मौर्य Updated Wed, 27 May 2015 06:22 PM IST
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candidate vs PM modi: that time more offensive, now targeted attack
तब आगरा का कोठी मीना बाजार था, इस बार दीनदयाल धाम का मैदान। तब चुनाव प्रचार था, अब एक साल के काम का नतीजा। आगरा में धूप गुनगुनी थी, फरह में झुलसाने वाली। हालांकि मोदी के भाषण के दौरान आए बादलों से कुछ राहत जरूर मिली।
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लेकिन बड़ा फर्क तेवरों का था, भीड़ ही नहीं मोदी का भी। तब विपक्ष पर चौतरफा हमला था, सपा-बसपा, कांग्रेस कोई न बचा। इस बार निशाने पर सिर्फ कांग्रेस और उसके नेतृत्व वाली पूर्ववर्ती सरकार थी। वजह भले पद और मौके का अंतर हो पर भीड़ जो सुनने आई थी, उस ‘आक्रामक मोदी’ से उसकी मुलाकात कुछ ही देर की रही।
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दीनदयाल धाम के मंच से मोदी भले प्रधानमंत्री के रूप में अपनी सरकार का रिपोर्ट कार्ड देने आए थे, पर अधिकांश लोगों को उनसे पीएम-इन-वेटिंग वाली शैली के भाषण की उम्मीद थी। पीएम ने शुरूआत कुछ वैसी ही की पर बिना नाम लिए। लेकिन जब नाम न लेने का सिलसिला लंबा हुआ।
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56 इंच का सीना, एके-49 और मां-बेटे, बाप-बेटे जैसे जुमले न आए तो लोग ऊबते से दिखे। जैसे किसी फिल्म के आक्रामक नायक ने खलनायक को बिना पीटे छोड़ दिया हो। कोई नई घोषणा भी नहीं, बस उपलब्धियों की लंबी फेहरिस्त। बेशक, भुजाएं वैसे ही उठीं, उंगलियां वैसे ही हवा में इशारा करती रहीं, बीच-बीच में भावनात्मक पुट भी दिया लेकिन दिलचस्प जुमलों के न होने से पहले से ज्यादा सधा प्रहार भी वह जोश न भर पाया। वजह साफ है, उम्मीदें बड़ी घोषणाओं की थीं और श्रोताओं के अवचेतन में उम्मीदवार मोदी की छवि लेकिन सामने था देश का प्रधानमंत्री। जो वैसे ललकार भी नहीं सकता जैसा चुनावी मंच पर उसकी खासियत हुआ करती थी।


सबसे बड़ी बात। सूट-बूट की सरकार, विदेश यात्राओं पर तंज और भूमि अधिग्रहण जैसे मुद्दों पर विपक्ष के विरोध पर करारे जवाब की उम्मीद सबको थी। शायद तब मोदी नाम लेते, जुमले भी उछालते मगर इन पर खामोश रहे। हां, एक बात वैसी ही थी। मोदी के प्रति दीवानगी। भीषण गर्मी में अंत तक जमे रहने के कारण कोठी मीना बाजार से कुछ कम होते हुए भी भीड़ कम न आंकी जाएगी। यह तस्दीक है, मोदी की साख जनसामान्य में वही है जैसी उनकी उम्मीदवारी के जमाने में थी।
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