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ब्रज में फाग: राजपूती होली की महफिलें उदास, सूने पड़े चौपालों के रंग
Sat, 06 Mar 2021 12:51 PM IST
मुकेश कुमार
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, आगरा
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, आगरा
Published by: मुकेश कुमार
Updated Sat, 06 Mar 2021 12:51 PM IST
सार
- कभी नर्तकियां नाचती थीं राजपूती होली में, ढोलक की थाप पर झूमते थे लोग
- वक्त के साथ कई चीजें बदलती चली गई लेकिन उल्लास और उत्साह आज भी बना हुआ
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राजपूती होली का फाइल फोटो
- फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
ब्रज की होली के रंग सबसे निराले हैं। अतीत के पन्ने पलटें तो यह रंग और भी चटख मिलते हैं। तब होली एक-दो दिन नहीं, महीने भर का त्योहार होती थी और हुड़दंग भी जबरदस्त होता था। वक्त के साथ कई चीजें बदलती चली गई लेकिन उल्लास और उत्साह आज भी बना हुआ है।
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ढोलक की थाप, मजीरे की झंकार, हारमोनियम के स्वर, घुंघरूओं की छन-छन और नर्तकियों संग ठुमकते लोग.. कभी ऐसी ही रंगत होती थी भदावर क्षेत्र की राजपूती होली की। आगरा जिले बाह क्षेत्र में राजपूती महफिलों की ठसक ब्रज की होली के रंग को चटख कर देती थी। वक्त की करवट के साथ सिमटी होली की महफिलों के दायरे संग अतीत की रंगीन यादें आज भी जिंदा है।
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बाह, धौलपुर, मुरैना, भिंड, मैनपुरी और इटावा तक फैले भदावर क्षेत्र में होली आते ही महफिलें सजने लगती थीं। वसंत पंचमी से फाग तक जमने वाली महफिलों की अब यादें ही बची हैं। गांव की चौपालों इनकी चर्चा के साथ सामाजिक प्रेम और सद्भाव के वो दिन याद कर बुजुर्ग बताते हैं कि आजकल महफिलें जमती ही नहीं। वे कहते हैं कि नई पीढ़ी तो टीवी और मोबाइल से फुर्सत ही कहां तो होली की महफिल सजाएं।
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घर के अंदर नाती का शव था, बाहर झूमते रहे हुरियारे
कमतरी के राज बहादुर सिंह बताते हैं कि 40 साल पहले की बात है पछाय गांव में मोहन सिंह के घर पर होली की महफिल सजी थी, उनके नाती की मौत हो गई। घर के अंदर शव रखा था और बाहर होली की महफिल सजी थी। होली के गीतों पर हुरियारे झूम रहे थे। मोहन सिंह के मुंह से उफ तक नहीं निकली। भोर की बेला में गुमसुम मोहन सिंह को कुरेदे जाने पर आंखों से आंसू बह निकले। यह घटना कद्रदानों की होली के प्रति समर्पण को दर्शाती है।
गोरी धन छमकि अटरिया चढ़ गई.....पर चली गई सुखई की नौकरी
सकतपुरा (भिंड ) से निकलकर खेड़ा राठौर (बाह) में बसे लोक गायक सुखई के खयाल के बिना होली की महफिलें अधूरी समझी जाती थी। होली गायक और साहित्यकार डॉ. वीपी मिश्र ने बताया कि सुखई के होली के खयाल गोरी धन छमकि अटरिया चढ़ गई पर पटवारी की नौकरी चली गई थी। उन्होंने यह खयाल जल्दी में अपनी खतौनी की किताब के चौसठवें पन्ने पर लिख दिया था। तहसीलदार ने जवाब तलब किया तो उन्होंने उन्हें अपना इस्तीफा सौंप दिया।
कमतरी के राज बहादुर सिंह बताते हैं कि 40 साल पहले की बात है पछाय गांव में मोहन सिंह के घर पर होली की महफिल सजी थी, उनके नाती की मौत हो गई। घर के अंदर शव रखा था और बाहर होली की महफिल सजी थी। होली के गीतों पर हुरियारे झूम रहे थे। मोहन सिंह के मुंह से उफ तक नहीं निकली। भोर की बेला में गुमसुम मोहन सिंह को कुरेदे जाने पर आंखों से आंसू बह निकले। यह घटना कद्रदानों की होली के प्रति समर्पण को दर्शाती है।
गोरी धन छमकि अटरिया चढ़ गई.....पर चली गई सुखई की नौकरी
सकतपुरा (भिंड ) से निकलकर खेड़ा राठौर (बाह) में बसे लोक गायक सुखई के खयाल के बिना होली की महफिलें अधूरी समझी जाती थी। होली गायक और साहित्यकार डॉ. वीपी मिश्र ने बताया कि सुखई के होली के खयाल गोरी धन छमकि अटरिया चढ़ गई पर पटवारी की नौकरी चली गई थी। उन्होंने यह खयाल जल्दी में अपनी खतौनी की किताब के चौसठवें पन्ने पर लिख दिया था। तहसीलदार ने जवाब तलब किया तो उन्होंने उन्हें अपना इस्तीफा सौंप दिया।