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अगस्त क्रांति: आगरा शहर की सड़कों पर पुलिस का चल रहा था राज, हर व्यक्ति से कर रहे थे पूछताछ

Fri, 13 Aug 2021 10:40 AM IST
Abhishek Saxena न्यूज डेस्क अमर उजाला, आगरा
न्यूज डेस्क अमर उजाला, आगरा Published by: Abhishek Saxena Updated Fri, 13 Aug 2021 10:40 AM IST
सार

इतिहासकार प्रो. सुगम आनंद ने बताया कि क्रांतिकारी परशुराम की शहादत के बाद भड़की चिंगारी ने असर दिखाना शुरू कर दिया था। शहर से सटे ग्रामीण इलाकों में आंदोलन तेज हो गए थे। पुलिस ने शहर को पूरी तरह से अपने कब्जे में ले लिया था।

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August kranti history police investigate every person
अगस्त क्रांति - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

अगस्त क्रांति की ज्वाला ताजनगरी की गलियों से निकल कर ग्रामीण इलाकों तक पहुंच गई थी। 13 अगस्त, 1942 को कई तहसील क्षेत्रों में हुए प्रदर्शनों की जानकारी पुलिस के पास पहुंची। हालांकि अंग्रेजों का पूरा ध्यान शहरी क्षेत्र पर था। शाम होते ही गली-मोहल्लों को सुनसान करा दिया जाता। शक के आधार पर तमाम लोगों का उत्पीड़न किया गया।

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इतिहासकार प्रो. सुगम आनंद ने बताया कि क्रांतिकारी परशुराम की शहादत के बाद भड़की चिंगारी ने असर दिखाना शुरू कर दिया था। शहर से सटे ग्रामीण इलाकों में आंदोलन तेज हो गए थे। पुलिस ने शहर को पूरी तरह से अपने कब्जे में ले लिया था। शाम सात बजे के बाद घर से निकलने वाले हर व्यक्ति से पूछताछ की जा रही थी। फिर भी क्रांतिकारी पुलिस की नजरों से बचते हुए गुप्त बैठकों में पहुंच जाते थे। इन्हीं किसी एक बैठक के दौरान देहात क्षेत्र के रेलवे स्टेशनों को निशाना बनाने की योजना बनाई गई।
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शहरी इलाके में तो सख्त पहरा था लेकिन ग्रामीण अंचल में पुलिस की कार्रवाई धीमी थी। 14 अगस्त को बरहन और इसके कुछ दिनों बाद चमरौली स्टेशन को निशाना बनाया गया। दोनों ही स्टेशनों को क्रांतिकारियों ने फूंक दिया और ट्रेन की पटरियां उखाड़ दीं। यह सिलसिला जिले के अन्य रेलवे स्टेशनों पर भी चला। सरकारी इमारतों के बाहर अंग्रेज सरकार के पुतले फूंके गए थे। हर वर्ग के लोगों ने इस आंदोलन में अपनी भागेदारी दी।

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दस से 14 अगस्त तक दनादन गिरफ्तारियां
लगातार बढ़ते आंदोलन को देखते हुए अंग्रेजों ने गिरफ्तारियों का सिलसिला भी तेज कर दिया। गुप्त बैठक स्थलों पर छापेमारी की गई। कांग्रेस के कई नेता गिरफ्तार किए। इतिहासकार बताते हैं कि दस से 14 अगस्त के बीच तमाम लोगों की गिरफ्तारियां हुईं। इनमें बाबूलाल मित्तल, रमेश दत्त पालीवाल, प्यारे लाल, तारा सिंह धाकरे, उल्फत सिंह निर्भय, प्रताप सिंह जादौन, डॉ. करन सिंह, नत्थीलाल शर्मा, रवि वर्मा, श्याम सुंदर शर्मा, ज्वाला प्रसाद, रमेेश शर्मा, मिट्ठूलाल शास्त्री, उमराव सिंह, नेपाल सिंह, सोहराब सिंह, श्याम बाबू शर्मा, सुरजीत पाल, जगजीत सिंह, बसंत लाल झा, गोपीनाथ शर्मा, मनोहर लाल शर्मा, गुरुदयाल सिंह, सोरन सिंह, मुकुट सिंह चौहान, गर्जन सिंह, गुरुदयाल आदि क्रांतिकारी शामिल थे।

पड़ोसी जिलों में भी भड़क उठा था आंदोलन
अंग्रेजों के जुल्म की कोई इंतहा न थी। हर ओर सायरन बजाती हुईं गाड़ियां दौड़ रही थीं। परशुराम की शहादत के बाद आगरा ही नहीं आसपास के अन्य जिलों में भी क्रांति की ज्वाला तेजी से भड़क उठी थी। पुलिस ने जिले की सीमाओं को सील कर दिया था। पब्लिक ट्रांसपोर्ट के पहिये भी थाम दिए गए थे। - इमामुद्दीन कुरैशी, वयोवृद्ध क्रांतिकारी  

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