प्रेम का प्रतीक है वैलेंटाइन डे, ज्योतिष के नजरिए से जानिए इसके बारे में
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प्रेम के प्रतीक वैलेंटाइन को ज्योतिष में भी खोजा जा सकता है। ऐसा माना है ज्योतिषाचार्य पंडित रामचंद्र शर्मा वैदिक का। उनके अनुसार गन्धर्व विवाह, स्वयंवर, मदनोत्सव, वसन्तोत्सव व आदिवासी समाज में प्रचलित घोटुल और भगोरिया उत्सव का संबंध भी जीवन साथी चुनने से है। इन प्रथाओं का इतिहास वर्षों पुराना है। इस दृष्टि से भारतीय वैलेंटाइन डे का स्वरूप ज्यादा व्यापक और प्राचीन है ।
ज्योतिषाचार्य के अनुसार प्रेम और रोमांस में सुंदरता और आकर्षण प्रधान है। भारतीय ज्योतिष ने जन्मकुंडली में लग्न को इसका आधिपत्य दिया है। रोमांस के लिए साहस, पसंद व भाग्य आवश्यक है। साहस के लिए पराक्रम, पसंद के लिए पंचम भाव व भाग्य के लिए नवम भाव पर विचार किया जाता है। सप्तम भाव जीवन साथी का है जो रोमांस व प्रेम के भौतिक परिणाम का भाव है।
रोमांस और प्रेम में चंद्र, शुक्र और मंगल की महत्वपूर्ण भूमिका है। चंद्रमा मन का कारक है। मन की चंचलता पर चंद्रमा का एकाधिकार है, जो मन की पसंद नापसंद को व्यक्त करता है। इसीलिए चंद्रमा प्रधान व्यक्ति को मुढ़ी कहा जाता है। मंगल साहस, पराक्रम व ऊर्जा से समंध रखता है। चंद्र मंगल की भूमिका स्त्री के जीवन में महत्व रखती है। शुक्र काम जीवन का कारक व आकर्षण का कारण माना जाता है। शुक्र मंगल की युति रोमांस का कारण होती है। इस पर चंद्रमा का प्रभाव जातक को रोमांटिक बनाता है।
ज्योतिषाचार्य बताते हैं कि आज वेलेंटाइन डे का अर्थ व्यापक हो गया है। यह प्रिय व्यक्ति के चयन या मित्रता का प्रतीक बन गया है। लग्न और पंचम के स्वामी ग्रहों अथवा भावों का संबंध चतुर्थ भाव से हो तो वैलेंटाइन उसकी माता होती है। एकादश भाव मित्रता का है। लग्न, पंचम व एकादश का संबंध हो तो वैलेंटाइन मित्र होता है। इसी प्रकार अन्य भावों से व्यक्ति के वैलेंटाइन को ज्योतिष विज्ञान के जरिए जाना जा सकता है।
उनका मानना है कि अगर सभी तथ्यों को ध्यानपूर्वक देखा जाए तो वैलेंटाइन डे का संबंध शुक्र, मंगल व चंद्र से है तीनों ही ग्रह युवा वर्ग से संबंधित है। इसलिए प्रचलन में यह युवाओं का दिन है। इसलिए वैलेंटाइन का अर्थ प्रिय व्यक्ति से होता है जो कोई भी हो सकता है। इस दिन अपने प्रिय के साथ उपहारों का आदान प्रदान होता है।