अमर उजाला अभियान: कब होगा तीर्थनगरी सोरोंजी के इस प्राचीन मंदिर का जीर्णोद्धार?
लोगों का कहना है कि सीताराम मंदिर मुगल आक्रांताओं द्वारा तोड़ा गया। मूर्तियां खंडित की गईं। प्रतिमाओं की पुन: स्थापना होनी चाहिए और इस मंदिर में प्रतिदिन पूजा अर्चना की व्यवस्था हो।
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उत्तर प्रदेश के जिला कासगंज की तीर्थनगरी सोरों विकास की राह देख रही है। यहां की पौराणिक धरोहर में लहरा गंगा मार्ग का सीताराम मंदिर अत्यंत प्राचीन है। पुरातत्व विभाग द्वारा इस मंदिर की देखरेख की जाती है। मंदिर का संबंध सोलंकी वंश से जुड़ा हुआ है। इस मंदिर परिसर में राजा सोमदत्त सोलंकी की यज्ञशाला थी। सन 1511 में सिकंदर लोदी और सन 1693 में औरंगजेब ने सूकर क्षेत्र की सांस्कृतिक और धार्मिक विरासत वाले मंदिर को तहस-नहस कर दिया और प्रभु सीताराम की प्रतिमा भी खंडित कर दी।
तीर्थनगरी के बाशिंदे व श्रद्धालु चाहते हैं कि इस मंदिर का जीर्णोद्धार पुरातत्व विभाग कराए। पुरातत्व विभाग ने मंदिर का जीर्णोद्धार पूरी तरह से नहीं कराया है। इस मंदिर की पौराणिकता मंदिर के निर्माण में प्रयुक्त पत्थर और खंभों से नजर आ जाती है। इन पर संस्कृत व पाली भाषा में विभिन्न प्रकार के लेख खुदे हुए हैं। मंदिर में मौजूदा समय में दीवार में एक मूर्ति स्थापित है। कभी-कभी इस मूर्ति की पूजा अर्चना होती है और मंदिर भी प्रतिदिन श्रद्धालुओं के लिए नहीं खुलता। ऐसी स्थिति में अब सोरोंजी के लोगों की मांग है कि इस मंदिर को पुरातत्व विभाग प्रतिदिन खुलवाए और पूजा अर्चना की प्रतिदिन व्यवस्था की जाए। इससे प्राचीन मंदिर को देखने आने वाले श्रद्धालु निराश न हों। अब तीर्थनगरी के वाशिंदे मंदिर का जीर्णोद्धार कर मूर्ति की स्थापना की मांग कर रहे हैं।
जरूरी है मंदिर का जीर्णोद्धार
पुरातत्वविद व साहित्यकार डॉ. राधाकृष्ण दीक्षित ने बताया कि पुरातत्व विभाग मंदिर की व्यवस्थाओं को लेकर गंभीर नहीं है। मंदिर के अंदर शिलालेखों पर काली परत जमती जा रही है, जिसका अनुरक्षण भी नहीं होता। मंदिर का जीर्णोद्धार किया जाना जरूरी है। समाजसेवी अशोक पांडेय का कहना है कि सीताराम मंदिर मुगल आक्रांताओं द्वारा तोड़ा गया। मूर्तियां खंडित की गईं। प्रतिमाओं की पुन: स्थापना होनी चाहिए और इस मंदिर में प्रतिदिन पूजा अर्चना की व्यवस्था हो।
अत्यंत प्राचीन है मंदिर
पूर्व सभासद डॉ. भुवनेश माहेश्वरी ने बताया कि 1862 में विश्वविख्यात पुरातत्ववेत्ता अलेग्जेंडेर कनिंघम ने अपने अध्ययन में पाया था कि यह मंदिर अत्यंत प्राचीन है, जो अपने समय की एक समृद्धिशाली सभ्यता का हिस्सा था। शासन इस पर गंभीरता से ध्यान दे। वहीं पवन उपाध्याय का कहना है कि सूकरक्षेत्र की प्राचीन संस्कृति और सभ्यता का सीताराम मंदिर प्रमाण है। तमाम धरोहरें इस क्षेत्र में हैं। सीताराम मंदिर पुरात्तव विभाग के अधीन तो आ गया, लेकिन इसके संरक्षण पर पुरातत्व विभाग का ध्यान नहीं हैं।