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इस छात्र ने कर दिया साबित, परीक्षा में अधिक अंक पाना ही नहीं होता सफलता का पैमाना

Tue, 01 May 2018 08:54 AM IST
मृत्युंजय शुक्ला, अमर उजाला आगरा
मृत्युंजय शुक्ला, अमर उजाला आगरा Updated Tue, 01 May 2018 08:54 AM IST
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agra kanhaiya achieved the success from his hard work
डोसा बनाते कन्हैया - फोटो : अमर उजाला
किसी परीक्षा में कम या अधिक अंक पाना ही सफलता का पैमाना नहीं है। यह महज अंकों का खेल है। कम अंक हासिल करने वाले भी बड़ी मंजिल पाते हैं। बस, रास्ता सही होना चाहिए। 
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मन में कुछ कर गुजरने की चाहत हो तो अंकतालिका के अंकों झुठलाकर नई इबारत लिखी जा सकती है। कुछ ऐसा ही कर दिखाया है कन्हैया ने। 

रविवार को घोषित हुए इंटरमीडिएट के रिजल्ट में कन्हैया को महज 54 फीसदी अंक मिले लेकिन कन्हैया अपनी राह पहले ही बना चुके हैं। 

मन में कुछ कर गुजरने का जज्बा हो तो कोई भी लक्ष्य मुश्किल नहीं है। 20 वर्षीय कन्हैया इसका उदाहरण हैं। कंप्यूटर सीखने का शौक था लेकिन पारिवारिक मजबूरियों ने उन्हें डोसे के ठेले पर लाकर खड़ा कर दिया। 
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agra kanhaiya achieved the success from his hard work
कन्हैैया - फोटो : अमर उजाला
पिता सुबोध कुमार अग्रवाल के बीमार पड़ने के बाद घर चलाने की जिम्मेदारी कन्हैया पर आ गई। 2012-13 में दसवीं के बाद पढ़ाई छूट गई लेकिन कुछ कर गुजरने की तमन्ना बनी रही। 

ठेला लगाने के बाद जब भी मौका मिलता कंप्यूटर सीखते। कंप्यूटर के कीबोर्ड पर तेजी से चलती उनकी उंगलियों ने कब सॉफ्टवेयर बनाना सीख लिया, कन्हैया को खुद भी नहीं पता चला। 

अब दिल्ली और बंगलूरू की आईटी कंपनियां भी उनसे सॉफ्टवेयर बनवाती हैं। दिन में वह एक फ्रीलांसर के तौर पर सॉफ्टवेयर, एंड्रायड एप और वेबसाइट बनाते हैं और रात को ठेल पर डोसा। 

कन्हैया कुमार अग्रवाल राजामंडी में डोसा की ठेल लगाते हैं। 2017-18 सत्र में उन्होंने यूपी बोर्ड से इंटर की परीक्षा दी। वह 54 फीसदी अंक के साथ द्वितीय श्रेणी में पास हो गए हैं।

यू ट्यूब चैनल से देते हैं ट्रेनिंग

कन्हैया के तीन यू ट्यूब चैनल भी है। जिस पर साढ़े पांच हजार से ज्यादा सब्सक्राइबर हैं। इसके माध्यम से वह कंप्यूटर की ट्रेनिंग देते हैं। ट्राइदेव नाम के इस यू ट्यूब चैनल के माध्यम से टेकिभनकल ट्रेनिंग देते हैं। 

इसके अलावा वह शहर के कुछ संस्थानों में कंप्यूटर भी पढ़ाते हैं। कन्हैया अब तक 33 से ज्यादा वेबसाइट डेवलप कर चुके हैं। उन्होंने मोबाइल मंडी नाम से एक एंड्राइड एप भी बनाया है। 

वह दिल्ली, बंगलूरु की कंपनियों के लिए भी वेबसाइट और साफ्टवेयर बनाते हैं। वेबसाइट डिजाइनिंग करने के बाद भी डोसे की ठेल क्यों लगाते हैं। सवाल पर कन्हैया बताते हैं कि ये पुश्तैनी काम है। इससे घर की रोटी चलती है। 

वेबसाइट डेवलपमेंट का काम नियमित तो है नहीं, जब काम मिलता है तो पैसे मिल जाते हैं। जबकि डोसे की ठेल से नियमित आय मिलती है। जिससे घर का खर्च चलता है। कन्हैया के साथ उनका छोटा भाई भी डोसे की ठेल पर काम करता है। 
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