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कॉलेजों में नहीं खेल मैदान, कहां खेलें बच्चे
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मैदान में किया गया पानी का छिड़काव।
- फोटो : amar ujala demo
मैनपुरी। सरकार खेलों के लिए प्रतिवर्ष करोड़ों रुपये खर्च कर रही है। खिलाड़ियों के लिए प्रतियोगिताओं का आयोजन भी हर वर्ष हो रहा है। ऐसा कैसे संभव है जब खेल मैदान हों न और खिलाड़ियों को खेलों में निपुड़ बनाया जा सके। माध्यमिक शिक्षा परिषद ने खेल को अनिवार्य विषय घोषित कर दिया है। इसका धरातल पर पालन होता नजर नहीं आ रहा है।
इसका कारण है कि शिक्षण संस्थाओं में खेल मैदान ही नहीं है। जिले के कॉलेजों पर नजर डालें तो पता चलता है कि जिले में 471 माध्यमिक शिक्षा से विद्यालय संचालित हैं। जबकि 22 विद्यालय सीबीएसई बोर्ड से संचालित हैं। माध्यमिक के 300 से अधिक स्कूलों में खेल मैदान नहीं है जबकि सीबीएसई के भी पांच स्कूलों में खेल मैदान नजर नहीं आ रहा है। इससे खिलाड़ियों को प्रशिक्षण नहीं मिल पाता है।
ऐसा नहीं है कि विभाग को इसकी जानकारी न हो। जब विभागीय खेलकूद प्रतियोगिताएं होती हैं तो 473 स्कूलों में 25 से 30 कॉलेजों के छात्र-छात्राएं ही इन प्रतियोगिताओं में भाग लेते हैं। उस समय अधिकारी भी मौजूद होते हैं, लेकिन कभी यह जानने का प्रयास नहीं किया गया कि आखिर इतनी कम संख्या में खिलाड़ी क्यों उपस्थित होते हैं।
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हकीकत यह है कि माध्यमिक शिक्षा की मान्यता के समय खेल का मैदान आवश्यक होता है, लेकिन तब अधिकारी प्रबंधकों से लेनदेन कर खानापूर्ति कर देते हैं। जिससे कॉलेजों से खेल के मैदान गायब होते जा रहे हैं।
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इसका कारण है कि शिक्षण संस्थाओं में खेल मैदान ही नहीं है। जिले के कॉलेजों पर नजर डालें तो पता चलता है कि जिले में 471 माध्यमिक शिक्षा से विद्यालय संचालित हैं। जबकि 22 विद्यालय सीबीएसई बोर्ड से संचालित हैं। माध्यमिक के 300 से अधिक स्कूलों में खेल मैदान नहीं है जबकि सीबीएसई के भी पांच स्कूलों में खेल मैदान नजर नहीं आ रहा है। इससे खिलाड़ियों को प्रशिक्षण नहीं मिल पाता है।
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ऐसा नहीं है कि विभाग को इसकी जानकारी न हो। जब विभागीय खेलकूद प्रतियोगिताएं होती हैं तो 473 स्कूलों में 25 से 30 कॉलेजों के छात्र-छात्राएं ही इन प्रतियोगिताओं में भाग लेते हैं। उस समय अधिकारी भी मौजूद होते हैं, लेकिन कभी यह जानने का प्रयास नहीं किया गया कि आखिर इतनी कम संख्या में खिलाड़ी क्यों उपस्थित होते हैं।
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हकीकत यह है कि माध्यमिक शिक्षा की मान्यता के समय खेल का मैदान आवश्यक होता है, लेकिन तब अधिकारी प्रबंधकों से लेनदेन कर खानापूर्ति कर देते हैं। जिससे कॉलेजों से खेल के मैदान गायब होते जा रहे हैं।