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पिछड़े तबके को दलित रंगमंच से मिलता प्रतिनिधित्व
Lucknow
Updated Sun, 30 Jun 2013 05:30 AM IST
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लखनऊ। दलित रंगमंच इसलिए भी जरूरी है क्योंकि इससे समाज के अन्य पिछड़े तबकों को भी प्रतिनिधित्व मिलता है। उनमें भी समाज के अन्य लोगों से बराबरी करने की इच्छा जगती है। इसी बहाने पिछड़े तबके में कहीं दबी हुई प्रतिभा उभर कर सामने आती है। शनिवार को सम्यक नाट्य संस्थान और भारतीय दलित नाट्य अकादमी की ओर से राय उमानाथ बली प्रेक्षागृह में हुई ‘दलित रंगमंच का औचित्य’ विषयक संगोष्ठी में वक्ताओं की ये बातें सामने आई।
गोष्ठी की शुरुआत में वरिष्ठ रंगकर्मी विचारक अरुण खोटे ने दलितों को सृजनात्मक वर्ग बताते हुए दलित रंगमंच को जरूरी बताया। उन्होंने कहा कि दतिल रंगमंच का नए संदर्भों में प्रयोग हो रहा है, दक्षिण के प्रदेशों में ये आगे बढ़ी है। नागपुर से आए वरिष्ठ रंगकर्मी संजय सायरे ने चर्चा के दौरान चिंता जताई कि कहीं-कहीं दलित रंगमंच तितर बितर भी हुआ है। नगर की वरिष्ठ रंगकर्मी मृदुला भारद्वाज ने इस बात पर खुशी जताई कि इस विषय को रंगनाट्य समारोह से उठाना अच्छा है। लविवि में हिंदी विभाग के एचओडी डॉ. कालीचरण सनेही ने दलितों को माटी का सच्च सपूत बताते हुए कहा कि दलित साहित्य-दलित नाटकों की दस्तकों ने समाज के अन्य वर्गों के कान खड़े किये हैं। नागपुर से आई दलित साहित्यकार डॉ. सुशीला टांक भौरे ने मुद्दा उठाया कि जब दलितों को सवर्णों के रंगमंच पर प्रतिनिधत्व नहीं मिला तब उन्हें मजबूरन दलित रंगमंच की शुरुआत करनी पड़ी। वरिष्ठ रंगकर्मी सूर्यमोहन कुलश्रेष्ठ ने इस बात पर जोर दिया कि दतिल रंगमंच से वंचित तबके के युवाओं को भी रंगकर्म के मौके मिलेंगे। गोष्ठी की अध्यक्षता कर रहे वरिष्ठ साहित्यकार मुद्राराक्षस ने दलित रंगमंच को अन्य तबकों के बराबर आने का एक माध्यम ठहराया। उन्होंने वेदों के कुछ प्रसंगों पर भी चर्चा की। गोष्ठी में पूर्व आईपीएस एसआर दारापुरी, राजेश चंद्रा, राजेश कुमार और रंगकर्मी श्याम कुमार ने भी विचार रखे।
चुन ले अपनी-अपनी राहें ः कामरेड का बक्सा शनिवार शाम राय उमानाथ बली प्रेक्षागृह में खुला। बक्सा खुला तो बात निकल कर सामने आई कि देश के लोगों को चुनना होगा आगे बढ़ने के लिए अंबेडकर की विचारधारा का चुनाव किया जाये या मार्क्सवादी विचारधारा का। 30 मिनट की इस एकल प्रस्तुति में अभिनय और निर्देशन श्याम कुमार ने किया।
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गोष्ठी की शुरुआत में वरिष्ठ रंगकर्मी विचारक अरुण खोटे ने दलितों को सृजनात्मक वर्ग बताते हुए दलित रंगमंच को जरूरी बताया। उन्होंने कहा कि दतिल रंगमंच का नए संदर्भों में प्रयोग हो रहा है, दक्षिण के प्रदेशों में ये आगे बढ़ी है। नागपुर से आए वरिष्ठ रंगकर्मी संजय सायरे ने चर्चा के दौरान चिंता जताई कि कहीं-कहीं दलित रंगमंच तितर बितर भी हुआ है। नगर की वरिष्ठ रंगकर्मी मृदुला भारद्वाज ने इस बात पर खुशी जताई कि इस विषय को रंगनाट्य समारोह से उठाना अच्छा है। लविवि में हिंदी विभाग के एचओडी डॉ. कालीचरण सनेही ने दलितों को माटी का सच्च सपूत बताते हुए कहा कि दलित साहित्य-दलित नाटकों की दस्तकों ने समाज के अन्य वर्गों के कान खड़े किये हैं। नागपुर से आई दलित साहित्यकार डॉ. सुशीला टांक भौरे ने मुद्दा उठाया कि जब दलितों को सवर्णों के रंगमंच पर प्रतिनिधत्व नहीं मिला तब उन्हें मजबूरन दलित रंगमंच की शुरुआत करनी पड़ी। वरिष्ठ रंगकर्मी सूर्यमोहन कुलश्रेष्ठ ने इस बात पर जोर दिया कि दतिल रंगमंच से वंचित तबके के युवाओं को भी रंगकर्म के मौके मिलेंगे। गोष्ठी की अध्यक्षता कर रहे वरिष्ठ साहित्यकार मुद्राराक्षस ने दलित रंगमंच को अन्य तबकों के बराबर आने का एक माध्यम ठहराया। उन्होंने वेदों के कुछ प्रसंगों पर भी चर्चा की। गोष्ठी में पूर्व आईपीएस एसआर दारापुरी, राजेश चंद्रा, राजेश कुमार और रंगकर्मी श्याम कुमार ने भी विचार रखे।
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चुन ले अपनी-अपनी राहें ः कामरेड का बक्सा शनिवार शाम राय उमानाथ बली प्रेक्षागृह में खुला। बक्सा खुला तो बात निकल कर सामने आई कि देश के लोगों को चुनना होगा आगे बढ़ने के लिए अंबेडकर की विचारधारा का चुनाव किया जाये या मार्क्सवादी विचारधारा का। 30 मिनट की इस एकल प्रस्तुति में अभिनय और निर्देशन श्याम कुमार ने किया।
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