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खेत हो या बागवानी, कीटनाशकों का स्प्रे पड़ सकता है भारी
Lucknow
Updated Sat, 18 May 2013 05:30 AM IST
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लखनऊ। खेतों से लेकर बागवानी तक में अगर आप कीटनाशकों का उपयोग करते हैं तो यह न समझिए कि यह सिर्फ हानिकारक कीटों को खत्म करता है बल्कि यह स्प्रे करने वालों को भी नुकसान पहुंचा सकता है। इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ टॉक्सिकोलॉजी रिसर्च (आईआईटीआर) द्वारा हाल ही किए गए एक अध्ययन में सामने आया है कि कीटनाशक स्प्रे करने वाले व्यक्ति के फेफड़ों को यह कमजोर कर सकता है। साथ ही उसके शरीर के विभिन्न अंदरुनी हिस्सों में पाए जाने वाले जरूरी एंजाइम्स के स्तर में भी कमी आ सकती है। संस्थान की यह रिसर्च प्रदेश के करोड़ों किसानों के साथ-साथ उन बागवानी के शौकीनों के लिए भी एक खतरे का संकेत है जो अपने बागों में कीटनाशकों का स्प्रे करते हैं।
आईआईटीआर की एपिडेमियालॉजी डिवीजन के वैज्ञानिकों डॉ. एमके पाठक, एम फरीद, एके श्रीवास्तव, सी केसवाचंद्रन ने करीब छह महीने तक 18 ऐसे किसानों पर अध्ययन किया जो अपने खेतों में कीटनाशक स्प्रे करने जैसी गतिविधियों को खुद अंजाम देते हैं। अध्ययन में कीटनाशक स्प्रे के महीनों से पहले इन सभी के पल्मोनरी फंक्शन टेस्ट, रक्त में क्लोनिस्टरेस एंजाइम के स्तर और नर्व कंडक्शन वेलोसिटी को मापा गया। वहीं स्प्रे के बाद के महीनों में फिर इन्हीं टेस्ट्स को दोहराया गया। इस दौरान सामने आया कि कीटनाशकों के संपर्क में आने के बाद इन किसानों में क्लोनिस्टरेस एंजाइम की सक्रियता आधी से भी कम रह गई है। इसमें 55 प्रतिशत की औसत कमी दर्ज की गई। वहीं फेफड़ों की क्षमता में औसतन 20 प्रतिशत की कमी दर्ज की गई।
इन दोनों ही नकारात्मक असर को देखते हुए विभाग के वैज्ञानिकों का दावा है कीटनाशकों का स्प्रे बेहद खतरनाक प्रक्रिया है और इसे अंजाम देने के दौरान विशेष सावधानियां और सुरक्षा उपकरणों का उपयोग करना जरूरी है।
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इसलिए होता है खतरा
अध्ययन में पता चला कि आमतौर पर इस किस्म की सुरक्षा का ध्यान कम ही रखा जाता है और कई बार किसान सिर्फ एक कपड़े से मुंह ढंककर कीटनाशकों का छिड़काव करते हैं। दूसरी ओर बागवानी में तो ऐसी कोई सुरक्षा भी लोग नहीं अपनाते है। ऐसे में ये स्प्रे किसानों और आसपास के लोगों के लिए खतरा बन सकते हैं।
सुरक्षा जरूरी
वैज्ञानिकों के अनुसार कीटनाशक उपयोग करने के दौरान अगर व्यक्तिगत सुरक्षा के लिए अच्छी क्वालिटी के मास्क, दस्ताने, स्प्रे कंट्रोलर और शील्ड उपयोग किए जाएं तो इस जहर के प्रति एक्सपोजर को कुछ कम किया जा सकता है। हालांकि, पूरी तरह बचाव के लिए खुद बरती गई सावधानी ही ज्यादा उपयोगी है। जैसे- छिड़काव के दौरान हवा की विपरीत दिशा में जाने से बचना, काम पूरा होने पर हाथों को अच्छे साबुन से धोना, कीटनाशक सिलेंडर में डालने के दौरान लापरवाही नहीं बरतना आदि।
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आईआईटीआर की एपिडेमियालॉजी डिवीजन के वैज्ञानिकों डॉ. एमके पाठक, एम फरीद, एके श्रीवास्तव, सी केसवाचंद्रन ने करीब छह महीने तक 18 ऐसे किसानों पर अध्ययन किया जो अपने खेतों में कीटनाशक स्प्रे करने जैसी गतिविधियों को खुद अंजाम देते हैं। अध्ययन में कीटनाशक स्प्रे के महीनों से पहले इन सभी के पल्मोनरी फंक्शन टेस्ट, रक्त में क्लोनिस्टरेस एंजाइम के स्तर और नर्व कंडक्शन वेलोसिटी को मापा गया। वहीं स्प्रे के बाद के महीनों में फिर इन्हीं टेस्ट्स को दोहराया गया। इस दौरान सामने आया कि कीटनाशकों के संपर्क में आने के बाद इन किसानों में क्लोनिस्टरेस एंजाइम की सक्रियता आधी से भी कम रह गई है। इसमें 55 प्रतिशत की औसत कमी दर्ज की गई। वहीं फेफड़ों की क्षमता में औसतन 20 प्रतिशत की कमी दर्ज की गई।
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इन दोनों ही नकारात्मक असर को देखते हुए विभाग के वैज्ञानिकों का दावा है कीटनाशकों का स्प्रे बेहद खतरनाक प्रक्रिया है और इसे अंजाम देने के दौरान विशेष सावधानियां और सुरक्षा उपकरणों का उपयोग करना जरूरी है।
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इसलिए होता है खतरा
अध्ययन में पता चला कि आमतौर पर इस किस्म की सुरक्षा का ध्यान कम ही रखा जाता है और कई बार किसान सिर्फ एक कपड़े से मुंह ढंककर कीटनाशकों का छिड़काव करते हैं। दूसरी ओर बागवानी में तो ऐसी कोई सुरक्षा भी लोग नहीं अपनाते है। ऐसे में ये स्प्रे किसानों और आसपास के लोगों के लिए खतरा बन सकते हैं।
सुरक्षा जरूरी
वैज्ञानिकों के अनुसार कीटनाशक उपयोग करने के दौरान अगर व्यक्तिगत सुरक्षा के लिए अच्छी क्वालिटी के मास्क, दस्ताने, स्प्रे कंट्रोलर और शील्ड उपयोग किए जाएं तो इस जहर के प्रति एक्सपोजर को कुछ कम किया जा सकता है। हालांकि, पूरी तरह बचाव के लिए खुद बरती गई सावधानी ही ज्यादा उपयोगी है। जैसे- छिड़काव के दौरान हवा की विपरीत दिशा में जाने से बचना, काम पूरा होने पर हाथों को अच्छे साबुन से धोना, कीटनाशक सिलेंडर में डालने के दौरान लापरवाही नहीं बरतना आदि।