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तेरी परवाह करता हूं मैं मां...

Mon, 04 Mar 2013 05:30 AM IST
Lucknow
Lucknow Updated Mon, 04 Mar 2013 05:30 AM IST
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लखनऊ। ‘तुम चिंता मत करना, मैं रोज एक चिट्ठी जरूर लिखूंगा’...। 1992 में चारबाग रेलवे स्टेशन पर बेटे की विदाई के क्षण में दुखी अपनी मां से ये वादा डॉ. आलोक चांटिया ने किया था। इस वादे को 20 साल हो गए और इन 20 सालों में उन्होंने 2,939 पत्र लिख डाले। वे बताते हैं कि तकनीक ने आपसी संवाद के लिए फोन जरूर दिए हैं लेकिन खतों का अपना मजा है। उनकी मां उनकी भेजी गई चिट्ठियां 10 बार पढ़ती हैं और उनकी लिखावट को महसूस कर अपने जीवन में बेटे की कमी पूरी करती हैं। दूसरी ओर लिम्का बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड्स ने माता-पिता को सबसे ज्यादा समय तक पत्र लिखने के लिए इसे एक नेशनल रिकॉर्ड के तौर पर मान्यता भी दी है।
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डॉ. आलोक श्री जयनारायण पीजी कॉलेज में असिस्टेंट प्रोफेसर हैं। वे कहते हैं कि उनके मां-पिता को कभी अकेलापन महसूस न हो, इसलिए उन्होंने ये चिट्ठियां लिखीं। वे मूलत: बहराइच के हैं। उनके दो भाई, तीन बहनें और माता-पिता महाबीर प्रसाद व रजनीश श्रीवास्तव, सभी बहुत करीब से जुड़े रहे। जब वे और उनके भाई-बहन बड़े हुए तो पढ़ाई व नौकरी के बेहतर विकल्प बहराइच में नहीं मिले और वे बाहर जाने को मजबूर हो गए। खुद आलोक भी 1992 में लखनऊ विश्वविद्यालय में पढ़ने आ गए। इसके बाद उनकी सबसे छोटी बहन शिखा ही माता-पिता के साथ बहराइच में रह रही थी लेकिन शिखा को भी उसके हायर एजुकेशन के लिए डॉ. आलोक ने लखनऊ बुला लिया। वे बताते हैं कि जब माता-पिता शिखा को लखनऊ छोड़ बहराइच लौट रहे थे तो उन्हें अहसास हुआ कि अब घर बिल्कुल सूना हो जाएगा। मां का सब्र जवाब दे गया और भरी आंखों से उन्होंने मुझसे कहा- ‘अब तो खुश है ना, मेरे सभी बच्चों को मुझसे दूर करके?’ डॉ. आलोक ने मां के मन और इस डांट के पीछे के दर्द को समझा और वादा किया कि वे उन्हें रोज चिट्ठी लिखेंगे। उन्हें कभी अकेलेपन का अहसास नहीं होने देंगे। डॉ. आलोक कहते हैं कि उस दिन के बाद से वे देश के चाहे जिस भी हिस्से में रहें, रोज एक चिट्ठी लिखते हैं। ये सिलसिला केवल तभी टूटता है, जब वे माता-पिता के साथ होते हैं।
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मुश्किल वक्त में ममता बनी प्रेरक
डॉ. आलोक बताते हैं कि वादा निभाना मुश्किल था लेकिन मां की ममता ने उन्हें प्रेरित किया। कई बार पोस्ट बॉक्स उनके घर से तीन-चार किलोमीटर दूर होता था और वहां जाने का साधन भी नहीं होता तो वे चिट्ठी पोस्ट करने पैदल ही निकल जाते। गुजरात में सुरेंद्र नगर में पढ़ार जनजातियों के साथ काम करते हुए भी वे रोज 30 किमी दूर शहर चिट्ठी पोस्ट करने जाते।
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फोन कॉल में नहीं है चिटट्ठी का जादू
डॉ. आलोक कहते हैं कि चिट्ठियों की अपनी खासियत है। फोन पर बात तो की जा सकती है लेकिन बूढे़ होते मां-पिता उन बातों में भला कितनी बातें याद रख पाते होंगे? इसके अलावा चिट्ठी हर वक्त उनके पास रह सकती है। वे कई-कई बार उन्हें पढ़ते हैं, बेटे की कही बातों का विश्लेषण करते हैं और उसके स्नेह को महसूस करते हैं। डॉ. आलोक मानवशास्त्री हैं। वे बताते हैं कि मां पर इन खतों का मनोवैज्ञानिक असर हुआ है और वे बच्चों के दूर होने के बावजूद बेहद खुश रहती हैं।


.... रिकॉर्ड के बारे में तो कभी सोचा नही नहीं
डॉ. आलोक कहते हैं कि लिम्का बुक ऑफ रिकॉर्ड्स के बारे में तो कभी सोचा ही नहीं था। इसी वजह से शुरुआती वर्षों के अधिकतर खत नष्ट हो चुके हैं। उनके साथियों ने प्रेरित किया इसलिए उन्होंने लंबे समय तक मां-पिता को लिखे जाने वाले खतों से संबंधित किसी रिकॉर्ड के बारे में जानने के लिए लिम्का बुक में संपर्क किया। मालूम हुआ कि देश में ऐसा कोई रिकॉर्ड नहीं है और उन्होंने ही नया रिकॉर्ड बनाया है। लिम्का बुक ऑफ रिकॉर्ड्स के संपादक विजया घोष ने उन्हें इस रिकॉर्ड से नवाजा है।
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