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एंडोस्कोपी से भी निकलेगा स्कल बेस का ट्यूमर
Lucknow
Updated Sun, 03 Feb 2013 05:30 AM IST
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लखनऊ। स्कल बेस में होने वाले ट्यूमर को एंडोस्कोपी से भी निकाला जा सकता है। इसके लिए नाक के रास्ते इंडोस्कोप ले जाकर स्कल बेस में छेद किया जाता है। पांच से आठ घंटे तक चलने वाली इस सर्जरी के बाद मरीज को आराम मिल जाता है। यहीं नहीं ओपेन सर्जरी की तरह ऑपरेशन के बाद होने वाली दिक्कतें भी नहीं होतीं और मरीज जल्दी घर वापस पहुंच जाता है। संजय गांधी पीजीआई में न्यूरो सर्जरी और केजीएमयू के एनॉटमी विभाग के सहयोग से आयोजित स्कल बेस पेरीऑपरेटेड वर्कशॉप में प्रो.संजय बिहारी ने यह जानकारी दी। एसजीपीजीआई के न्यूरो सर्जन प्रो. बिहारी ने बताया कि स्कल बेस सिर का वो हिस्सा है, जिसके ऊपर मस्तिष्क टिका होता है। इसी जगह पिट्यूटरी ग्लैंड होती है। यह ऐसे हार्मोन का स्राव करती है, जो शरीर के कई अंगों के लिए बहुत जरूरी होते हैं। इस ग्लैंड में ट्यूमर होने पर ऑप्टिक नर्व दबने से सिर दर्द, शारीरिक विकास में कमी, शरीर में बाल न होना, महिलाओं को मासिक धर्म न होना, आंखों की रोशनी के चले जाने की संभावना होती है। ऐसे में पिट्यूटरी ग्लैंड के ट्यूमर को इंडोस्कोप के माध्यम से निकाला जाता है। नानावती हॉस्पिटल मुंबई से आए डॉ. नारायण जयशंकर ने बताया कि न्यूरो सर्जरी एक टीम वर्क है। इसमें न्यूरो सर्जन के अलावा ईएनटी सर्जन की भी महत्वपूर्ण भूमिका होती है। मरीज के ट्यूमर को देखकर ये तय किया जाता है कि उसकी ओपेन सर्जरी करनी है या फिर इंडोस्कोपिक सर्जरी। उन्होंने बताया कि पिट्यूटरी ग्लैंड के ट़्यूमर को निकालने के लिए नाक के रास्ते का इस्तेमाल किया जात है, क्योंकि ये ग्लैंड नाक के पीछे होता है। यदि नाक के साइड में ट्यूमर (एंजियो फाइब्रोमा) हो तो उसे गाल के रास्ते हड्डियों को खोलकर निकाला जाता है। इसी तरह कई अन्य ट्यूमर ओपेन सर्जरी से निकाले जाते हैं। उन्होंने बताया इंडोस्कोपिक सर्जरी से स्कल बेस में हुए छेद को टिश्यू या फिर नाक के अंदर की ‘नेजल फ्लैप’ (नाक के बीच में स्थित लाइनिंग) से भरते हैं। इस लाइनिंग में रक्त की आपूर्ति जारी रहती है। इससे छेद जल्दी भर जाता है। कार्यशाल में मैक्स दिल्ली के न्यूरो सर्जरी डॉ. वीके जैन, एम्स दिल्ली के डॉ. आशीष सूरी, लखनऊ से डॉ. मजहर हुसैन, डॉ. राम मनोहर लोहिया इंस्टीट्यूट से डॉ. अरुण श्रीवास्तव आदि भी मौजूद थे।
अल्ट्रासाउंड बताता है सिर की चोट की गंभीरता ः सड़क दुर्घटनाओं के कारण सिर की चोट के मरीजों की संख्या काफी ज्यादा है, लेकिन चोट की गंभीरता का पता लगाने और जरूरी इलाज के लिए सभी अस्पतालों में न तो न्यूरो सर्जन हैं, न ही सीटी स्कैन। ऐसे में अल्ट्रासाउंड की भूमिका बहुत महत्वपूर्ण हो जाती है। यदि डॉक्टर को प्रशिक्षण दे दिया जाए तो अल्ट्रासाउंड से भी चोट की गंभीरता का पता चल जाता है। इसके बाद मरीज को जरूरी इलाज के लिए रेफर किया जा सकता है। एम्स दिल्ली के एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. दीपक अग्रवाल ने कार्यशाला में ये जानकारी दी। उन्होंने बताया कि भारत जैसे देश में जहां अत्याधुनिक इलाज की सुविधाएं सभी जगह नहीं हैं, अल्ट्रासाउंड सिर की चोट का पता लगाने के लिए बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। इसके लिए जरूरी है कि सीएचसी या जिला अस्पताल में मौजूद चिकित्सक ईएमओ या फिर सर्जन प्रशिक्षित हो। डॉ. दीपक ने कहा कि अल्ट्रासाउंड की प्रोब को आंख पर या सिर पर रखकर चोट की गंभीरता का पता लगाया जा सकता है। यदि कोई बड़ी दुर्घटना या आपदा हो गई हो और सीटी स्कैन के लिए मरीजों की भीड़ हो तो अल्ट्रासाउंड से भी जांचकर ये तय किया जा सकता है कि किस मरीज का सीटी स्कैन पहले किया जाए। उन्होंने बताया कि ट्रॉमा में अल्ट्रासाउंड करने का प्रशिक्षण देने के लिए एम्स दो कार्यक्रम चलाता है। एडवांस अल्ट्रासाउंड ट्रॉमा लाइफ सपोर्ट (एयूटीएलएस) और एम्स-किस (कीप इट सिम्पल सोनोग्राफी) नाम के ये दो कोर्स डेढ़-डेढ़ दिन के होते हैं, जो सर्जन या फिर ईएमओ कर सकता है। इसके लिए बहुत ही न्यूनतम शुल्क रखा गया है, जिससे कोर्स की गंभीरता बनी रहे। एम्स की वेबसाइट पर कोर्स की पूरी जानकारी उपलब्ध है।
कैडबर पर सिखा रहे एंडोस्कोपिक सर्जरी के गुर ः संजय गांधी पीजीआई में चल रही कार्यशाला में एक और कीर्तिमान स्थापित हुआ। प्रदेश में ये पहली ऐसी कार्यशाला है, जहां कैडबर (मृत शरीर) पर एंडोस्कोपित सर्जरी के गुर सिखाए गए। इस कार्य में केजीएमयू के एनॉटमी विभाग ने सहयोग किया। वहां से एसजीपीजीआई को पांच कैडबर उपलब्ध कराए गए, जिनका उपयोग सर्जरी की बारीकियां सिखाने के लिए किया गया। प्रो.संजय बिहारी ने बताया कि अभी तक किसी भी कार्यशाला में कैडबर पर सर्जरी नहीं सिखाई गई है। उन्होंने बताया कि केजीएमयू के कुलपति प्रो.डीके गुप्ता, पीजीआई निदेशक प्रो.आरके शर्मा और केजीएमयू के एनॉटमी विभाग के हेड प्रो.एके श्रीवास्तव के सहयोग से ये संभव हुआ। एनॉटमी विभाग ने उन्हें पांच कैडबर उपलब्ध कराए, जिनपर स्कल बेस एंडोस्कोपिक सर्जरी सिखाई जा रही है। इसके अलावा टेलीमेडिसिन प्रेक्षागृह में बैठे न्यूरो सर्जन द्वारा सर्जरी के दौरान ऑपरेशन थिएटर में मौजूद विशेषज्ञों से सवाल पूछने की भी सुविधा है।
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अल्ट्रासाउंड बताता है सिर की चोट की गंभीरता ः सड़क दुर्घटनाओं के कारण सिर की चोट के मरीजों की संख्या काफी ज्यादा है, लेकिन चोट की गंभीरता का पता लगाने और जरूरी इलाज के लिए सभी अस्पतालों में न तो न्यूरो सर्जन हैं, न ही सीटी स्कैन। ऐसे में अल्ट्रासाउंड की भूमिका बहुत महत्वपूर्ण हो जाती है। यदि डॉक्टर को प्रशिक्षण दे दिया जाए तो अल्ट्रासाउंड से भी चोट की गंभीरता का पता चल जाता है। इसके बाद मरीज को जरूरी इलाज के लिए रेफर किया जा सकता है। एम्स दिल्ली के एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. दीपक अग्रवाल ने कार्यशाला में ये जानकारी दी। उन्होंने बताया कि भारत जैसे देश में जहां अत्याधुनिक इलाज की सुविधाएं सभी जगह नहीं हैं, अल्ट्रासाउंड सिर की चोट का पता लगाने के लिए बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। इसके लिए जरूरी है कि सीएचसी या जिला अस्पताल में मौजूद चिकित्सक ईएमओ या फिर सर्जन प्रशिक्षित हो। डॉ. दीपक ने कहा कि अल्ट्रासाउंड की प्रोब को आंख पर या सिर पर रखकर चोट की गंभीरता का पता लगाया जा सकता है। यदि कोई बड़ी दुर्घटना या आपदा हो गई हो और सीटी स्कैन के लिए मरीजों की भीड़ हो तो अल्ट्रासाउंड से भी जांचकर ये तय किया जा सकता है कि किस मरीज का सीटी स्कैन पहले किया जाए। उन्होंने बताया कि ट्रॉमा में अल्ट्रासाउंड करने का प्रशिक्षण देने के लिए एम्स दो कार्यक्रम चलाता है। एडवांस अल्ट्रासाउंड ट्रॉमा लाइफ सपोर्ट (एयूटीएलएस) और एम्स-किस (कीप इट सिम्पल सोनोग्राफी) नाम के ये दो कोर्स डेढ़-डेढ़ दिन के होते हैं, जो सर्जन या फिर ईएमओ कर सकता है। इसके लिए बहुत ही न्यूनतम शुल्क रखा गया है, जिससे कोर्स की गंभीरता बनी रहे। एम्स की वेबसाइट पर कोर्स की पूरी जानकारी उपलब्ध है।
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कैडबर पर सिखा रहे एंडोस्कोपिक सर्जरी के गुर ः संजय गांधी पीजीआई में चल रही कार्यशाला में एक और कीर्तिमान स्थापित हुआ। प्रदेश में ये पहली ऐसी कार्यशाला है, जहां कैडबर (मृत शरीर) पर एंडोस्कोपित सर्जरी के गुर सिखाए गए। इस कार्य में केजीएमयू के एनॉटमी विभाग ने सहयोग किया। वहां से एसजीपीजीआई को पांच कैडबर उपलब्ध कराए गए, जिनका उपयोग सर्जरी की बारीकियां सिखाने के लिए किया गया। प्रो.संजय बिहारी ने बताया कि अभी तक किसी भी कार्यशाला में कैडबर पर सर्जरी नहीं सिखाई गई है। उन्होंने बताया कि केजीएमयू के कुलपति प्रो.डीके गुप्ता, पीजीआई निदेशक प्रो.आरके शर्मा और केजीएमयू के एनॉटमी विभाग के हेड प्रो.एके श्रीवास्तव के सहयोग से ये संभव हुआ। एनॉटमी विभाग ने उन्हें पांच कैडबर उपलब्ध कराए, जिनपर स्कल बेस एंडोस्कोपिक सर्जरी सिखाई जा रही है। इसके अलावा टेलीमेडिसिन प्रेक्षागृह में बैठे न्यूरो सर्जन द्वारा सर्जरी के दौरान ऑपरेशन थिएटर में मौजूद विशेषज्ञों से सवाल पूछने की भी सुविधा है।
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