जल की महत्ता बताएगा आंचलिक विज्ञान नगरी

Lucknow Updated Tue, 25 Dec 2012 05:30 AM IST
लखनऊ। आप यह तो जानते हैं कि पृथ्वी पर मौजूद पानी में सिर्फ 3 प्रतिशत पीने लायक है, लेकिन आंचलिक विज्ञान नगरी बताएगी कि इस पीने लायक पानी में से भी सिर्फ 3 प्रतिशत तक ही हमारी पहुंच है। बाकी सारा पानी जमीन में काफी नीचे या ग्लेशियरों के रूप में जमा हुआ है। यही वजह है कि दुनिया के ज्यादातर हिस्सों में पीने का पानी बहुत मुश्किल से मिलता है। इस तरह की तमाम जानकारियां देने के लिए सोमवार को आंचलिक विज्ञान नगरी में एक नई दीर्घा का उद्घाटन किया गया। इसका उद्घाटन संस्कृति मंत्रालय के अपर सचिव रवींद्र सिंह ने किया।
रवींद्र सिंह ने इस प्रयास की तारीफ करते हुए उम्मीद जताई कि लोग अमूल्य जल का महत्व समझेंगे। उन्होंने कहा कि जीवन की उत्पत्ति और उसका अस्तित्व जल से है। आज दुनिया के कई क्षेत्रों में शुद्ध जल की कमी सामाजिक वैमनस्यता का कारण बनती जा रही है। इस मौके पर राष्ट्रीय विज्ञान संग्रहालय परिषद के महानिदेशक जीएस रौतेला और केंद्रीय भू-जल बोर्ड, उत्तर क्षेत्र के इंजीनियर केबी विश्वास ने भी अपने विचार रखे। आयोजन के दौरान राष्ट्रीय विज्ञान केंद्र के निदेशक डी. रामा शर्मा, वैज्ञानिक डॉ. डीएस भाकुनी, पूर्व निदेशक, सीडीआरआई, डॉ. वीपी कंबोज, पूर्व निदेशक, सीडीआरआई डॉ. कंवलराज, वैज्ञानिक, डॉ. सीएम नौटियाल, वैज्ञानिक, बीएसआईपी और डॉ. आनंद अखिला शामिल हुए। आयोजन के दौरान एक क्विज का भी आयोजन हुआ।

दीर्घा में खास
वॉटर फ्लोर : नई दीर्घा में वॉटर फ्लोर तैयार किया गया। दरअसल यह प्रोजेक्टर से तैयार किया गया इफेक्ट है, जो पानी पर चलने जैसा अहसास देता है। साथ ही लगातार होने वाला मूवमेंट को वास्तविकता में दर्शाता है।
कैलक्यूलेट वॉटर प्रॉपर्टी : इस सेक्शन केे जरिए पानी की क्वालिटी पहचानी जा सकती है। इसमें यह भी बताया गया है कि भारत में जहां बोतल बंद पेयजल मिनरल और शुद्ध किस्म का होता है। वहीं दुनिया में 6 तरह का पानी बोतलों में बेचा जा रहा है।
जल चक्र मॉडल : जलचक्र मॉडल में दिखाया गया है कि मैदानों में मौजूद जल स्त्रोतों से पानी भाप बनकर उड़ता है। इसके बाद बादल बनते हैं और बिजली की कड़क के साथ बारिश होती है। यही पानी पहाड़ों से बहकर मैदानों में आता है और फिर सूर्य की गर्मी से वाष्प बनता है। इसके साथ ही ग्लेश्यिरों से होकर आने वाले पानी से नदियां कैसे भरती हैं यह भी इस मॉडल में दिखाया गया है।
वॉटर वैली प्रोजेक्ट : दीर्घा के प्रमुख आकर्षणों में वॉटर वैली प्रोजेक्ट भी है। नदियों के पानी को रोक कर वॉटर वैली प्रोजेक्ट में किस तरह पानी से बिजली बनती है और है ग्रिड के जरिए घरों में सप्लाई होती है आदि जानकारियां इसमें दी गई हैं।

वॉटर फैक्ट्स
- हमारे देश में विश्व का 4 प्रतिशत पानी है, जिस पर हमारे यहां रहने वाली विश्व की 16 प्रतिशत आबादी और 15 प्रतिशत मवेशी निर्भर हैं।
- उत्तर प्रदेश में खेती की 70 फीसदी सिंचाई भू-जल से होती है। यही वजह है कि प्रदेश के 820 ब्लॉक्स में से 250 में खतरनाक स्तर तक दोहन हो चुका है, 70 में अत्यधिक दोहन हुआ है।
- 1 संतरे को उगाने में 50 लीटर पानी खर्च होता है और 1 किलो रेड मीट उत्पादन में 13,500 लीटर।
- इसी तरह ब्रेड के 4 स्लाइस के उत्पादन में 100 लीटर पानी, 1 किलो चावल में 3,400 लीटर और 1 लीटर मूंगफली तेल 8,173 लीटर पानी खर्च करके उत्पादित होता है।

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