फेसबुक को शुरू करने के पीछे क्या है मार्क जकरबर्ग का मकसद

Wed, 24 Feb 2016 07:25 PM IST
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mark zuckerberg mobile world congress barcelona 2016

    31 साल के मार्क ज़करबर्ग दुनिया के सबसे अमीर और ताकतवर युवा हैं, लेकिन अब भी उन्हें लगता है कि उन्हें ठीक से नहीं समझा गया।

    ये बार्सिलोना में मोबाइल वर्ल्ड कांग्रेस के दौरान एक पत्रकार से 60 मिनट तक ज़करबर्ग की हुई बातचीत का लब्बोलुआब है।

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    भारत में फ़्री बेसिक्स योजना के तहत लाखों लोगों के लिए पहली बार इंटरनेट मुहैया कराने की फ़ेसबुक की योजना को झटका लगा है।

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    फ़ेसबुक की योजना को नेट न्यूट्रैलिटी के ख़िलाफ़ समझा गया। मार्क ज़करबर्ग ने इसे एक निराशाजनक कदम बताया और कहा कि इसने मुझे सिखाया कि, "हर देश अलग होता है।"

    उनका मानना है कि दुनिया को बदलने के उनके मिशन को आम तौर पर ग़लत समझा गया।

    उन्होंने कहा, "बहुत सारे लोगों को लगता है कि कंपनियों को किसी और बात की परवाह नहीं, सिर्फ पैसा कमाने के बारे में वो सोचती हैं। "

    फिर इसके बाद उन्होंने फ़ेसबुक को शुरू करने के पीछे अपने मक़सद के बारे में विस्तार से बताया।

    प्रतिक्रिया चिड़चिड़ाहट पैदा करने वाली

    फेसबुक को शुरू करने के पीछे क्या है मार्क जकरबर्ग का मकसद

    उन्होंने बताया कि फ़ेसबुक बनाने की उनकी कोई मंशा नहीं थी, वो तो हॉर्वड में लोगों को एक-दूसरे से जोड़ना चाहते थे और तब उन्हें लगा कि उनकी इस सोच को आगे बढ़ाने का सबसे बेहतर तरीक़ा है इस नेटवर्किंग साइट को व्यवसाय में तब्दील करना।

    मार्क कहते हैं, "जब मैंने ट्वीट पर अपने विचार डाले तो उस पर आने वाली प्रतिक्रिया चिड़चिड़ाहट पैदा करने वाली थी।"

    "अधिकतर लोगों को लगा कि कंपनियों को तो सिर्फ पैसा कमाने से मतलब होता है। जब मैं लोगों को यह कहता सुनता हूँ कि सभी बिज़नेसमैन लालची है या सभी राजनेता भ्रष्टाचारी हैं तो मुझे यह सही नहीं लगता है।"

    उन्होंने कहा, "मैं हमेशा यह सोचकर हैरान रहता हूँ कि क्या उनके अपने इरादे पूरी तरह से सही हैं।"

    लेकिन पूरी दुनिया को कनेक्ट करने के मार्क ज़करबर्ग के मिशन का सच क्या है? क्या ये फ़ेसबुक के लिए बहुत फायदे का भी सौदा है?

    अफ्रीका के सुदूर इलाकों में ड्रोन के माध्यम से इंटरनेट को पहुंचाना, आभासी वास्तविकता में निवेश और लोग जहां रह रहे हैं वहां के बारे में विस्तार से जानना जैसी योजनाएं रोमांचकारी और महत्वपूर्ण हैं।

    मार्क की दूरगामी सोच

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    मार्क का यह मानना भी दूरगामी सोच वाला लगता है कि संचार के मामले में वीडियो का इस्तेमाल अब बहुत अहम होने जा रहा है।

    हालांकि ये सभी रास्ते ज़्यादा से ज़्यादा लोगों को फ़ेसबुक की दुनिया में लाने की है जहां उनकी ज़रूरतें पूरी हो सकती हैं और विज्ञापनदाताओं को भी उनके आंकड़े (निजता बनाए रखते हुए) मुहैया कराए जा सकते हैं। ऐसा करने पर मार्क ज़करबर्ग को व्यापार में भी बड़ा फ़ायदा होगा।

    इसलिए जब वे मोबाइल उद्योग से विकासशील देशों में लोगों को कनेक्ट करने के बजाए 5जी के इस्तेमाल पर ध्यान केंद्रित करने पर सवाल खड़ा करते हैं तो हॉल में तालियां गूंज उठती हैं। आप समझ सकते हैं कि उनकी भावना कितनी शानदार है।

    या आप ये सोचते हैं कि कार और फ्रिज को इंटरनेट से जोड़ने की बजाय, इंसानों को जोड़ने में बड़े पैमाने पर पैसा लगाना फ़ेसबुक को अधिक फ़ायदा पहुंचाएगा।

    कुछ लोग इसी तरह के सवाल ऐपल के मुखिया टिम कुक और उनके द्वारा एक चरमपंथी के आईफ़ोन को अनलॉक करने से इनकार किए जाने के संबंध में भी पूछते हैं।

    टिम कुक के फैसले का समर्थन

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    मार्क ने टिम कुक के इस फैसले का समर्थन किया था। अमरीकी सरकार ने कोर्ट के आदेश के ख़िलाफ़ ऐपल की मुहिम को कंपनी की मार्केटिंग रणनीति बताया है।

    अब आप इंक्रिप्शन को लेकर ऐपल की दलील के प्रति सहानुभूति रख सकते हैं, इस बात को जानते हुए कि मजबूत सुरक्षा घेरे वाला आईफ़ोन, कंपनी के ब्रांड का एक अहम पहलू और भविष्य में फायदा पहुंचाने का जरिया है।

    सिलिकॉन वैली और इनके नेताओं को इस बात का मुगालता रहता है कि दुनिया डेटा शेयरिंग से लेकर सार्वजनिक सुरक्षा के ऊपर निजता को वरीयता देने की दिशा में उठाए गए क़दमों को समझ ही नहीं पाती है।

    और इसलिए मार्क ज़करबर्ग और उनके सहयोगी यह सोचते रहेंगे कि दुनिया हमेशा उन्हें समझ नहीं पाती है।

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