सेमीकॉन 2.0: कमर्शियल प्रोडक्शन से पहले चिप प्लांट नहीं बेच सकेंगी कंपनियां, सरकार ने जारी किए दिशा-निर्देश
SEMICON India 2026:
भारत सरकार ने 1.27 लाख करोड़ रुपये की सेमीकॉन 2.0 योजना के दिशा-निर्देश जारी कर दिए हैं। नए नियमों के अनुसार, कंपनियां पूरी तरह कमर्शियल प्रोडक्शन शुरू होने से पहले बिना नोडल एजेंसी की मंजूरी के चिप प्लांट को बेच या गिरवी नहीं रख सकती हैं।

विस्तार
भारत को ग्लोबल सेमीकंडक्टर हब बनाने की दिशा में सरकार ने कदम तेज कर दिए हैं। केंद्र सरकार ने 1.27 लाख करोड़ रुपये के परिव्यय वाली सेमीकॉन 2.0 योजना के दिशा-निर्देश जारी कर दिए हैं। इस योजना के तहत सरकार ने साफ कर दिया है कि चिप बनाने वाली कंपनियां पूरे प्रोजेक्ट का कमर्शियल प्रोडक्शन शुरू होने से पहले प्लांट का कोई भी हिस्सा बेच नहीं सकेंगी। इस कदम का मुख्य उद्देश्य देश में सेमीकंडक्टर इकोसिस्टम को मजबूत करना और कंपनियों की जवाबदेही तय करना है।
प्लांट बेचने और गिरवी रखने पर सख्त पाबंदी
नई गाइडलाइंस के मुताबिक, सेमीकॉन 2.0 योजना के तहत मंजूरी प्राप्त किसी भी चिप प्रोजेक्ट को उसकी पूरी कमर्शियल शुरुआत की घोषणा होने तक बेचा या निपटाया नहीं जा सकता है। इसके अलावा, कंपनियां नोडल एजेंसी की पूर्व अनुमति के बिना प्रोजेक्ट की संपत्ति को गिरवी नहीं रख सकती हैं और न ही उस पर कोई प्रभार बना सकती हैं। यह नियम केवल सामान्य व्यापारिक प्रक्रियाओं के मामले में ही कुछ छूट देता है। सरकार का यह फैसला सुनिश्चित करेगा कि वित्तीय सहायता पाने वाली कंपनियां प्रोजेक्ट को बीच में अधूरा न छोड़ें।
सेमीकंडक्टर इकोसिस्टम के छह प्रमुख स्तंभ
इस महत्वाकांक्षी योजना को छह प्रमुख स्तंभों पर तैयार किया गया है। इनमें चिप डिजाइन, मशीन और सामग्री, नए फैब की स्थापना, एटीएमपी और ओसैट उद्योग को मजबूत करना, रिसर्च एंड डेवलपमेंट तथा टैलेंट डेवलपमेंट शामिल हैं। सरकार ने फिलहाल मशीन और सामग्री, नए फैब की स्थापना और एटीएमपी तथा ओसैट उद्योग को बढ़ावा देने वाले तीन स्तंभों के लिए दिशा-निर्देश जारी किए हैं। इसके साथ ही, मशीन और सामग्री के क्षेत्र में आवेदन करने वाली कंपनियों को भारत में निर्मित उपकरणों की घरेलू खरीद पर प्रोडक्शन-लिंक्ड इंसेंटिव यानी पीएलआई का लाभ भी मिलेगा।
तीन साल तक प्रोडक्शन जारी रखना अनिवार्य
योजना के तहत वित्तीय सहायता प्राप्त करने वाली कंपनियों को एक और महत्वपूर्ण शर्त पूरी करनी होगी। उन्हें पूरे प्रोजेक्ट का कमर्शियल प्रोडक्शन शुरू होने की तारीख से कम से कम तीन साल तक अपना काम जारी रखना होगा। इसके लिए कंपनियों को एक अंडरटेकिंग भी देनी होगी। वहीं, जमीन की खरीद और उसके विकास, अस्थायी ढांचे, साइट कार्यालयों या अस्थायी सुविधाओं पर किए गए खर्च को योजना के तहत योग्य पूंजीगत व्यय नहीं माना जाएगा। इसके अलावा टेक्नोलॉजी ट्रांसफर, निर्माण के दौरान ब्याज और रिसर्च एंड डेवलपमेंट के खर्च को भी निवेश का हिस्सा नहीं माना जाएगा। इस योजना से भारत में लैम रिसर्च जैसी कंपनियों के दस हजार करोड़ रुपये के निवेश से सेमीकंडक्टर यूनिट स्थापित होने का रास्ता भी साफ हुआ है।
शेयरहोल्डिंग और स्वामित्व को लेकर भी कड़े नियम
सरकार ने वित्तीय सहायता समझौते के तहत स्वामित्व की शर्तों को भी स्पष्ट किया है। दिशा-निर्देशों में कहा गया है कि आवेदन करने वाली कंपनी, प्रमोटर या ग्रुप को प्रोजेक्ट कंपनी में कम से कम इक्यावन प्रतिशत की इक्विटी शेयर पूंजी और समान वोटिंग अधिकार बनाए रखने होंगे। यह नियम वित्तीय समझौते की अवधि और कमर्शियल शुरुआत के बाद के तीन वर्षों तक लागू रहेगा। आवेदन के समय ही नियंत्रक इकाई की पहचान करना अनिवार्य है, और शेयरहोल्डिंग में किसी भी तरह के बदलाव की जानकारी नोडल एजेंसी को देना जरूरी होगा।
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