सता रही कंपनियों की 'डुओपॉली': मोबाइल रिचार्ज से लेकर ऑनलाइन फूड-टैक्सी तक, बाजार हो रहा विकल्पहीन
Duopoly In Indian Tech Industry:
देश में बढ़ती महंगाई के साथ-साथ कंपनियों की खराब सेवाओं की शिकायतें भी बढ़ती जा रही हैं। लोग अक्सर इसके लिए मोनोपॉली यानी एक कंपनी के प्रभुत्व को कारण बताते हैं, लेकिन देखा जाए तो भारतीय बाजार में मोनोपॉली नहीं बल्कि डुओपॉली इसकी वजह है। कंपनियों की डुओपॉली आज हर सेक्टर में अपनी पैठ बना चुकी है।

विस्तार
पिछले दिनों इंडिगो की हजारों उड़ानों के रद्द होने के बाद एविएशन सेक्टर की कमजोरियां सामने आईं। भले ही इसे नियमों और स्टाफ की कमी से जोड़ा गया, लेकिन असल में यह समस्या एक गंभीर मुद्दे की ओर इशारा करती है और वो है 'डुओपॉली'। इंडिगो की फ्लाइट्स कैंसिल हुईं तो एयर इंडिया के फ्लाट्स के दाम आसमान छू गए। हुआ ये कि मजबूरी में कई लोगों को 50-60 हजार रुपये महंगा टिकट कटवाकर दूसरी फ्लाइट्स से जाना पड़ा। देखा जाए तो एविएशन सेक्टर में इंडिगो और एयर इंडिया का करीब 65 फीसदी बाजार पर कब्जा है। लेकिन ऐसे हालात सिर्फ एविएशन सेक्टर से साथ ही नहीं हैं, बल्कि आज हर क्षेत्र में सिर्फ एक-दो कंपनियों का ही दबदबा है।
मार्केट में एक या दो कंपनियों की पकड़ होने से सबसे बड़ी समस्या ऑप्शन को लेकर आती है। ग्राहक को यही ऐसी कंपनियों की सर्विस पसंद नहीं आए तो उसके पास तीसरी कंपनी के पास जाने का ऑप्शन ही नहीं बचता। ऐसे में उसे मजबूरन उसी कंपनी के महंगे प्रोडक्ट्स या प्लान खरीदने पड़ते हैं। आइए जानते हैं देश में ऑनलाइन शॉपिंग से लेकर फूड डिलीवरी तक में कैसे लोगों को 'डुओपॉली' का सामना करना पड़ रहा है।
टेलीकॉम में एयरटेल और जियो का एकछत्र राज
टेलिकॉम सेक्टर में एयरटेल और जियो मिलकर करीब 75 फीसदी बाजार पर काबिज हैं। बीएसएनएल अभी भी 4G को पूरी तरह मजबूत नहीं कर पाया है, जबकि वोडाफोन-आइडिया के यूजर्स की संख्या स्थिर है। हमने हाल ही के कुछ वर्षों में देखा कि कैसे दोनों कंपनियों ने अपने प्लान के दाम बढ़ाए हैं। सस्ते मिलने वाले रिचार्ज प्लान अब बंद हो गए हैं या तो उनकी कीमतें काफी बढ़ा दी गई हैं। अभी असर कम दिख रहा है, लेकिन आने वाले समय में रिचार्ज प्लान और महंगे हो सकते हैं। जब सिर्फ दो बड़ी कंपनियां बचती हैं, तो कीमतें बढ़ाने में किसी को रोकने वाला नहीं होता।
मैसेजिंग में WhatsApp-Telegram का विकल्प नहीं
हाल ही में Zoho कॉर्पोरेशन के देसी मैसेंजर एप Arattai की खूब चर्चा हुई। इंस्टैंट मैसेजिंग प्लेटफॉर्म में व्हाट्सएप सबसे बड़ा प्लेयर है जिसके देश में 80 करोड़ से ज्यादा रजिस्टर्ड यूजर्स हैं। वहीं, टेलीग्राम को करीब 8.5 करोड़ लोग यूज कर रहे हैं। Arattai एप के बारे में जोहो फाउंडर श्रीधर वेंबु ने खुद कहा था कि उन्हें भारत के लोगों से एप को लेकर मुताबिक रिस्पॉन्स नहीं मिल रहा है। इससे साफ है कि लोग मैसेजिंग एप्स के मामले में भी एक-दो एप तक ही सिमट कर रह गए हैं।
Flipkart और Amazon तक सिमटी ऑनलाइन शॉपिंग
भारत के ई-कॉमर्स सेगमेंट में फ्लिपकार्ट और अमेजन का दबदबा है। लोग हर बार एप के सेल में गड़बड़ी और स्कैम की शिकायते करते हैं, लेकिन अगले साल फिर वही प्लेटफॉर्म सबसे पहले याद आते हैं। विकल्प कम होने की वजह से ये ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म्स ग्राहकों की शिकायतों पर ध्यान नहीं देतीं।
ज्यादातर शहरों में सिर्फ दो कैब कंपनियां
कहीं घूमने निकलना हो या ऑफिस जाना हो तो कैब के लिए सिर्फ Ola या Uber ही है और तीसरा विकल्प शायद ही दिखता है। नतीजा यह कि कंपनियां ग्राहकों से मनमाना किराया वसूल लेती हैं। इसके अलावा, ड्राइवरों का व्यवहार और कारों की हालत भी सवालों में रहती है। डार्क पैटर्न के इस्तेमाल से अलग-अलग फोन पर अलग किराया और अतिरिक्त चार्जेस भी जांच के घेरे में रही है।
फूड में Zomato-Swiggy का भी विकल्प नहीं
ऑनलाइन खाना मंगाना आसान तो जरूर है, लेकिन अब सस्ता नहीं रहा। Zomato और Swiggy के बीच मुकाबले के बावजूद डिलीवरी चार्ज, पैकिंग फीस और तरह-तरह के चार्ज जुड़ते चले जाते हैं। कई बार होटल जाकर खाना ज्यादा किफायती पड़ता है। तेज डिलीवरी में भी Blinkit और Zepto का ही बोलबाला है, जहां रोजमर्रा की चीजें जल्दी मिलती तो हैं, लेकिन ग्राहकों को प्लेटफॉर्म फीस या प्रोसेसिंग शुल्क के नाम पर ज्यादा पैसे चुकाने पड़ते हैं।
कई सर्विस अब दो-तीन कंपनियों तक सिमटी
इतना ही नहीं अगर आप घर में वाई-फाई लगवाते हैं तो मार्केट में JioFiber और Airtel Xstream ही पॉपुलर ऑप्शन हैं। वहीं, अगर दूध लेने जाएं तो अमूल और मदर डेयरी का ही पैकेट मिलता है। नौकरी के लिए Naukri.com और LinkedIn ही भरोसेमंद विकल्प हैं। जबकि UPI में भी Google Pay और PhonePe जैसी कंपनियों का दबदबा है। लगभग हर सेक्टर में विकल्प दो कंपनियों तक सिमट गए हैं। रेल टिकट के लिए IRCTC जैसे मामलों में तो विकल्प का सवाल ही नहीं बचता।
क्या है कम विकल्प का नतिजा?
कम विकल्पों का सीधा असर उपभोक्ता की जेब और अनुभव पर पड़ता है। जब प्रतिस्पर्धा कमजोर होती है, तो सेवाओं की गुणवत्ता गिरती है और कीमतें बढ़ती हैं। भारत में अब चुनौती सिर्फ मोनोपॉली नहीं, बल्कि डुओपॉली बनती जा रही है, जहां दो बड़ी कंपनियां मिलकर उपभोक्ताओं के पास विकल्प ही नहीं छोड़तीं।
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