AI से जैविक हथियारों का खतरा: ओपनएआई, एंथ्रोपिक और गूगल ने सरकारों से की सख्त कानून बनाने की मांग

Nitish Kumar
टेक डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्लीNitish Kumar
Mon, 08 Jun 2026 06:58 PM IST
सार

AI Biological Weapons Risk:

क्या एआई भविष्य में खतरनाक वायरस और जैविक हथियार बनाने का जरिया बन सकता है? इसी चिंता को लेकर ओपनएआई, एंथ्रोपिक, गूगल डीपमाइंड और माइक्रोसॉफ्ट एआई के प्रमुखों ने सरकारों से तत्काल कदम उठाने की अपील की है। उनका कहना है कि एआई की तेजी से बढ़ती क्षमताएं बायोसिक्योरिटी के लिए नई चुनौतियां पैदा कर रही हैं।

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टेक दिग्गजों ने की कानून बनाने की मांग - फोटो : एआई जनरेटेड

    विस्तार

    आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस को लेकर दुनिया भर में उत्साह चरम पर है, लेकिन अब इसकी बढ़ती ताकत ने नई चिंताएं भी पैदा कर दी हैं। ओपनएआई, एंथ्रोपिक, गूगल डीपमाइंड और माइक्रोसॉफ्ट एआई जैसी बड़ी कंपनियों के प्रमुखों ने अमेरिकी सांसदों से ऐसे कानून बनाने की मांग की है, जो AI की मदद से जैविक हथियार विकसित करने की संभावनाओं को रोक सकें।

    इस सार्वजनिक पत्र पर गूगल डीपमाइंड के सीईओ डेमिस हसाबिस, ओपनएआई के सीईओ सैम ऑल्टमैन, एंथ्रोपिक के सीईओ डारियो अमोदेई और माइक्रोसॉफ्ट एआई के सीईओ मुस्तफा सुलेमान समेत कई प्रमुख हस्तियों ने हस्ताक्षर किए हैं।

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    आखिर क्यों बढ़ रही है चिंता?

    यह पहल इंस्टिट्यूट ऑफ प्रोग्रेस और फाउंडेशन फॉर अमेरिकन इनोवेशन की ओर से आयोजित की गई है। लेटर में कहा गया है कि एआई इतनी तेजी से विकसित हो रहा है कि भविष्य में वे ज्ञान संबंधी बाधाएं कमजोर पड़ सकती हैं, जो अब तक गलत इरादों वाले लोगों को जैविक हथियार बनाने से रोकती रही हैं।

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    एक्सपर्ट्स का मानना है कि एआई अब जटिल वैज्ञानिक जानकारी को समझने और उसका विश्लेषण करने में सक्षम होता जा रहा है। ऐसे में इसका दुरुपयोग खतरनाक वायरस या विषैले तत्वों के विकास में किया जा सकता है।

    DNA प्रिंटिंग तकनीक ने बढ़ाई चुनौती

    आज दुनिया भर में कई कंपनियां सिंथेटिक डीएनए और आरएनए तैयार करने की सुविधा देती हैं। इनका उपयोग वैज्ञानिक शोध, दवा निर्माण और डायग्नोस्टिक्स में होता है। हालांकि अधिकांश कंपनियां केवल प्रमाणित शोधकर्ताओं और संस्थानों को ही यह सेवा देती हैं, लेकिन सभी कंपनियां ग्राहकों और उनके ऑर्डर की पर्याप्त जांच नहीं करतीं।

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    2017 में कनाडा के वैज्ञानिकों ने लगभग 1 लाख डॉलर की लागत से मेल-ऑर्डर डीएनए का उपयोग कर विलुप्त हो चुके हॉर्सपॉक्स वायरस को दोबारा तैयार कर दिया था। उस समय विशेषज्ञों ने चेतावनी दी थी कि इसी तकनीक का इस्तेमाल चेचक जैसे घातक वायरस बनाने के लिए भी किया जा सकता है।

    एआई और जीन तकनीक का खतरनाक मेल

    एक्सपर्ट्स के अनुसार एआई मॉडल अब ऐसे नए टॉक्सिन और रोगजनक डिजाइन करने में मदद कर सकते हैं, जो पहले संभव नहीं थे। हालांकि किसी वायरस को पूरी तरह विकसित करने के लिए अभी भी जैव विज्ञान का ज्ञान जरूरी है, लेकिन एआई इस प्रक्रिया को काफी आसान बना सकता है।

    स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी के माइक्रोबायोलॉजिस्ट और बायोसिक्योरिटी विशेषज्ञ डेविड रेलमैन का कहना है कि एआई लोगों को यह भी बता सकता है कि डीएनए ऑर्डर को किस तरह बदला जाए ताकि स्क्रीनिंग सिस्टम उसे पहचान न सके।

    मौजूदा सुरक्षा व्यवस्था कितनी प्रभावी?

    वर्तमान में कई जीन सिंथेसिस कंपनियां ऐसे सॉफ्टवेयर का उपयोग करती हैं जो खतरनाक जीन सीक्वेंस की पहचान कर लेते हैं। इंटरनेशनल जीन सिंथेसिस कंसोर्टियम से जुड़ी कंपनियां वर्षों से स्वैच्छिक स्क्रीनिंग प्रक्रियाओं का पालन कर रही हैं।

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    हालांकि विशेषज्ञ मानते हैं कि केवल डीएनए स्क्रीनिंग पर्याप्त नहीं होगी। पिछले साल माइक्रोसॉफ्ट के शोधकर्ताओं ने एक अध्ययन में पाया था कि कुछ एआई प्रोटीन डिजाइन टूल ऐसे संभावित खतरनाक जीन सीक्वेंस तैयार कर सकते हैं, जो स्क्रीनिंग सिस्टम से बच निकलते हैं। एक्सपर्ट्स का कहना है कि किसी यूजर के लिए AI से बेहद खतरनाक गतिविधियों में मदद लेना लगभग असंभव बना दिया जाना चाहिए।

    एक्सपर्ट्स यह भी कहते हैं कि एआई और बायोटेक्नोलॉजी का मेल भविष्य में चिकित्सा और विज्ञान के लिए क्रांतिकारी साबित हो सकता है, लेकिन इसके साथ सुरक्षा उपायों को भी उतनी ही तेजी से मजबूत करना होगा। वरना यह तकनीक मानवता के लिए एक बड़ा खतरा बन सकती है।

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