Bixonimania: इंसान तो इंसान, AI भी हुआ फेल! फर्जी बीमारी के जाल में फंसे ChatGPT और Gemini

Nitish Kumar
टेक डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्लीNitish Kumar
Wed, 22 Apr 2026 07:34 AM IST
सार

क्या आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) हमेशा सच बोलता है? 2024 में वैज्ञानिकों के एक समूह ने एक फर्जी बीमारी गढ़ी। हैरानी की बात यह रही कि ChatGPT और Gemini जैसे एडवांस AI मॉडल्स ने भी इस झूठी बीमारी को सच मान लिया और इसे एक प्रामाणिक बीमारी के रूप में पेश करने लगे।

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आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) - फोटो : AI

    विस्तार

    तकनीक की दुनिया में अक्सर यह माना जाता है कि बड़े लैंग्वेज मॉडल (AI) कभी गलती नहीं करते। लेकिन 2024 में वैज्ञानिकों के एक छोटे से प्रयोग ने इस दावे की पोल खोल दी। कुछ समय पहले तक किसी ने भी 'बिक्सोनिमेनिया' नाम की बीमारी के बारे में नहीं सुना था। फिर अचानक कुछ वैज्ञानिकों ने इंटरनेट पर एक रिसर्च पेपर डाला, जिसमें दावा किया गया कि कंप्यूटर के अधिक इस्तेमाल से आंखों में यह खतरनाक बीमारी होती है। दिलचस्प बात यह थी कि यह पूरी रिसर्च, लेखकों के नाम, उनके संस्थान और यहां तक कि फंडिंग के स्रोत भी पूरी तरह से फर्जी थे। लेकिन ChatGPT और Gemini जैसे AI टूल्स ने बिना किसी पड़ताल के इस झूठ को सच मान लिया और इंटरनेट पर इसे एक असली बीमारी की तरह परोसने लगे।

    AI मॉडल्स भी खा गए धोखा

    इस फर्जी जानकारी को ChatGPT और Gemini जैसे बड़े AI मॉडल्स ने भी सच मान लिया। इन मॉडल्स ने इस बीमारी को एक असली हेल्थ कंडीशन की तरह पेश किया, जिससे यह भ्रम और भी मजबूत हो गया। यह घटना दिखाती है कि AI सिस्टम भी गलत या भ्रामक जानकारी से प्रभावित हो सकते हैं, खासकर जब डेटा विश्वसनीय दिखता हो।

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    धोखा खाने की इंसानी और मशीनी फितरत

    बिक्सोनिमेनिया का मामला अकेला नहीं है। आज के दौर में चाहे AI हो या इंसान, दोनों ही गलत जानकारी का शिकार हो सकते हैं। इसके पीछे इंसानों की मानसिक प्रवृत्तियां, पूर्वाग्रह और दूसरों पर निर्भर होकर जानकारी हासिल करने की आदत भी जिम्मेदार है। यही कारण है कि गलत जानकारी तेजी से फैलती है और लोग उसे सच मान लेते हैं।

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    कैम्ब्रिज फेस्टिवल में हुआ अनोखा प्रयोग

    हाल ही में कैम्ब्रिज फेस्टिवल में एक खास प्रयोग किया गया, जहां “द ट्रेटर्स” थीम पर आधारित एक साइंस इवेंट आयोजित हुआ। इसमें चार पैनलिस्ट्स ने अपनी रिसर्च पेश की, लेकिन उनमें से कुछ की जानकारी पूरी तरह गलत थी। ऑडियंस को यह तय करना था कि कौन सच बोल रहा है और कौन झूठ। दिलचस्प बात यह रही कि ज्यादातर लोग सही और गलत की पहचान करने में चूक गए।

    इस प्रयोग में पाया गया कि लोग सिर्फ जानकारी ही नहीं, बल्कि प्रस्तुति के तरीके, भाषा, कपड़े, एक्सेंट और पर्सनल बैकग्राउंड के आधार पर निर्णय लेते हैं। कई बार ऑडियंस ने असली रिसर्च को गलत मान लिया, जबकि झूठी जानकारी देने वालों को ज्यादा विश्वसनीय समझा। इससे यह साफ होता है कि हम अक्सर सतही संकेतों के आधार पर फैसले लेते हैं।

    सिर्फ मैथ्स नहीं, क्रिटिकल थिंकिंग भी जरूरी

    विशेषज्ञों का मानना है कि सिर्फ तकनीकी या गणितीय ज्ञान काफी नहीं है। लोगों में क्रिटिकल थिंकिंग यानी तार्किक सोच विकसित करना भी उतना ही जरूरी है। आज के समय में शिक्षा प्रणाली में विज्ञान और गणित पर जोर दिया जा रहा है, लेकिन आलोचनात्मक सोच को उतनी प्राथमिकता नहीं मिल रही। यही वजह है कि लोग आसानी से गलत जानकारी के जाल में फंस जाते हैं।

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