वर्ल्ड कप में कितना लंबा होगा एशियाई टीमों का सफर?
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वर्ल्ड कप फुटबॉल के इतिहास को 84 साल होने वाले हैं, लेकिन दुर्भाग्य की बात है की अभी तक कोई एशियाई टीम यह खिताब नहीं जीत सकी है।
इस बार भी वर्ल्ड कप में एशिया से 4 टीमें अपनी चुनौती पेश करने वाली हैं। ब्राजील में होने वाले फुटबॉल के इस महासमर में एशियाई टीम कहां तक पहुंचती हैं प्रशंसकों में इसका उत्साह रहेगा।
भारत ने गंवाया इतिहास रचने का मौका
ईरान ने पहली बार 1978 में एशियाई टीम के रूप में वर्ल्ड कप में शिरकत की थी। इसके बाद 2002, 2006 और 2010 वर्ल्ड कप में भी ईरान ने भाग लिया लेकिन यह टीम खिताब के करीब तक भी नहीं पहुंच सकी।
लेकिन इससे 28 साल पहले भारत के पास वर्ल्ड कप में खेलने वाली पहली टीम बनने का मौका था लेकिन टीम आर्थिक तंगी के कारण इतिहास नहीं बना सकी। एशिया के इस दूसरे सबसे बड़े देश को सिर्फ एक बार 1950 वर्ल्ड कप में खेलने का मौका मिले लेकिन नंगे पांव खेलने की जिद के कारण भारतीय टीम को इस महाकुंभ में भाग लेने से मना कर दिया गया।
दूसरी ओर, चीन ने सिर्फ 2002 वर्ल्ड कप में हिस्सा लिया था लेकिन ग्रुप स्टेज से ही बाहर हो गया।
कोरिया का है सबसे शानदार रिकॉर्ड
हमेशा की तरह इस बार भी कोई किसी एशियाई टीम के चैंपियन बनने की उम्मीद नहीं कर रहा है।
हालांकि पिछले हफ्ते पार्क जी-सुंग ने दावा किया था की एक न एक दिन दक्षिण कोरिया चैंपियन जरूर बनेगी। सर्वाधिक आठ बार वर्ल्ड कप खेलने वाली दक्षिण कोरिया एशिया की पहली टीम है जिसने विश्व कप में सेमीफाइनल तक का सफर तय किया है। यह टीम 2002 वर्ल्ड कप के सेमीफाइनल में पहुंची थी।
वर्ल्ड कप में होगा एशिया बनाम अफ्रीका
इस बार ब्राजील में अगले राउंड में पहुंचने के लिए एशिया और अफ्रीका की टीमों के बीच रोमांचक जंग देखने को मिलेगी। जापान अपना पहला मुकाबला आइवरी कोस्ट से खेलेगा तो ईरान की भिड़ंत नाइजीरिया से होगा।
वहीं ग्रुप-एच में शामिल दक्षिण कोरिया अपना दूसरा लीग मैच अल्जीरिया से खेलेगा। सिर्फ ग्रुप-बी में शामिल ऑस्ट्रेलिया को लीग मैच में किसी भी अफ्रीकी टीम से नहीं भिड़ना होगा। दूसरे राउंड में पहुंचने के लिए एशियाई टीमों को अफ्रीकी टीमों पर जीत दर्ज करनी ही होगी।
हालांकि बात सिर्फ जीत हासिल करने की नहीं है, इससे भी बढ़कर यह देखना बेहद अहम होगा की वर्ल्ड कप में भाग ले रही एशियाई टीमें पूरी दुनिया में एशियाई फुटबॉल का स्तर कहां तक पहुंचा पाती हैं। यदि इनमें से कोई भी टीम लंबा सफर तय करने में कामयाब रही तो एशियाई फुटबॉल के लिए इससे अच्छा और कुछ नहीं हो सकता।