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रक्षाबंधन से उपाकर्म तक: श्रावणी पूर्णिमा के दिन मनाई जाती हैं ये परंपराएं, जानिए इनका महत्व
Thu, 27 Aug 2026 02:44 PM IST
विनोद शुक्ला
धर्म डेस्क, अमर उजाला
धर्म डेस्क, अमर उजाला
Published by: विनोद शुक्ला
Updated Thu, 27 Aug 2026 02:44 PM IST
सार
हिंदू धर्म में श्रावण पूर्णिमा का विशेष महत्व होता है। श्रावणी उपाकर्म सावन मास की पूर्णिमा को मनाया जाता है और इस दिन कई तरह तरह की परंपराएं होती है।
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रक्षाबंधन का पर्व
- फोटो : Amar Ujala
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विस्तार
श्रावण मास की पूर्णिमा भारतीय परंपरा में विशेष महत्व रखती है। यह तिथि एक साथ कई ऐसी परंपराओं से जुड़ी है, जिनमें धर्म, पारिवारिक भावनाएं और ज्ञान की समृद्धि विरासत दिखाई देती है। इसी दिन जनेऊधारी ब्राह्मणों के लिए उपाकर्म का विधान होता है, भाई-बहन के प्रेम का पर्व रक्षाबंधन मनाया जाता है और भारतीय ज्ञान परंपरा की भाषा संस्कृत के सम्मान में संस्कृत दिवस मनाया जाता है। इस प्रकार श्रावणी पूर्णिमा केवल धार्मिक अनुष्ठानों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह आत्मशुद्धि, रिश्तों की आत्मीयता और ज्ञान के प्रति सम्मान का संदेश देने वाली महत्वपूर्ण तिथि है। वेदों की परंपरा, सामाजिक संबंधों और भारतीय भाषाई विरासत का यह अनूठा संगम इस दिन को विशेष बनाता है।
1. उपाकर्म: ज्ञान और संकल्प की नई शुरुआत
श्रावणी उपाकर्म सावन मास की पूर्णिमा को मनाया जाता है और यह पर्व मुख्यतः जनेऊधारी ब्राह्मणों के लिए अत्यंत पावन माना गया है। इस दिन ब्राह्मण पुरानी जनेऊ को त्यागकर मंत्रोच्चार सहित नई जनेऊ धारण करते हैं। यह प्रक्रिया केवल बाह्य नहीं, बल्कि आत्मिक शुद्धि का प्रतीक होती है। उपाकर्म का अर्थ ही होता है - ज्ञान, तप और नई शुरुआत। पवित्र नदियों में स्नान, तर्पण और संकल्प के साथ यह संस्कार वैदिक परंपरा में आदिकाल से प्रचलित है।
2. यज्ञोपवीत: अनुशासन और ज्ञान का स्मरण
श्रावणी उपाकर्म यज्ञोपवीत संस्कार का एक महत्वपूर्ण भाग है। इस दिन वेदों का पुनः अध्ययन प्रारंभ करने की परंपरा रही है। ब्राह्मण न केवल अपने लिए बल्कि अपने यजमानों के लिए भी इस दिन रक्षा सूत्र बांधकर उनकी रक्षा की कामना करते हैं। यह संस्कार ब्राह्मण जीवन के अनुशासन, आत्मसंयम और ज्ञान-साधना का स्मरण कराता है।
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3. रक्षा बंधन: रक्षा सूत्र से रिश्तों की डोर तक
समय के साथ यह वैदिक परंपरा सामाजिक रूप लेकर रक्षा बंधन में परिवर्तित हो गई। इसका उल्लेख भविष्योत्तर पुराण में मिलता है, जब इंद्र की पत्नी इंद्राणी ने उनके हाथ में रक्षा सूत्र बांधा था। यही परंपरा बाद में बहनों द्वारा भाइयों को राखी बांधने के रूप में प्रतिष्ठित हुई। आज भी यह पर्व भाई-बहन के रिश्ते को प्रेम, सुरक्षा और समर्पण से जोड़ता है।
श्रावणी पूर्णिमा को संस्कृत दिवस के रूप में भी मनाया जाता है। संस्कृत न केवल एक भाषा है, बल्कि वेद, उपनिषद, आयुर्वेद, ज्योतिष और योग जैसे समस्त ज्ञान की जननी है। भारत सरकार ने 1969 से इस दिन को संस्कृत दिवस के रूप में मनाने की परंपरा शुरू की। प्राचीन काल में इसी दिन से गुरुकुलों में शिक्षा सत्र प्रारंभ होता था, जिससे इसका शैक्षणिक महत्व भी स्पष्ट होता है।
श्रावणी पूर्णिमा भारतीय संस्कृति का एक अद्भुत संगम है, जिसमें उपाकर्म की आत्मिक पवित्रता, रक्षा बंधन की भावनात्मक मधुरता और संस्कृत दिवस की बौद्धिक ऊंचाई एक साथ विद्यमान हैं। यह पर्व भारतीय जीवन के विभिन्न आयामों का दर्पण है। जो धर्म, परिवार और ज्ञान को एक सूत्र में बांधता है। यह पर्व हमें आत्मशुद्धि, आत्मीयता और ज्ञान के प्रति सम्मान की प्रेरणा देता है।
डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यहां दी गई जानकारी सामान्य मान्यताओं, ज्योतिष, पंचांग, धार्मिक ग्रंथों आदि पर आधारित है। यहां दी गई सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है।
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1. उपाकर्म: ज्ञान और संकल्प की नई शुरुआत
श्रावणी उपाकर्म सावन मास की पूर्णिमा को मनाया जाता है और यह पर्व मुख्यतः जनेऊधारी ब्राह्मणों के लिए अत्यंत पावन माना गया है। इस दिन ब्राह्मण पुरानी जनेऊ को त्यागकर मंत्रोच्चार सहित नई जनेऊ धारण करते हैं। यह प्रक्रिया केवल बाह्य नहीं, बल्कि आत्मिक शुद्धि का प्रतीक होती है। उपाकर्म का अर्थ ही होता है - ज्ञान, तप और नई शुरुआत। पवित्र नदियों में स्नान, तर्पण और संकल्प के साथ यह संस्कार वैदिक परंपरा में आदिकाल से प्रचलित है।
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2. यज्ञोपवीत: अनुशासन और ज्ञान का स्मरण
श्रावणी उपाकर्म यज्ञोपवीत संस्कार का एक महत्वपूर्ण भाग है। इस दिन वेदों का पुनः अध्ययन प्रारंभ करने की परंपरा रही है। ब्राह्मण न केवल अपने लिए बल्कि अपने यजमानों के लिए भी इस दिन रक्षा सूत्र बांधकर उनकी रक्षा की कामना करते हैं। यह संस्कार ब्राह्मण जीवन के अनुशासन, आत्मसंयम और ज्ञान-साधना का स्मरण कराता है।
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3. रक्षा बंधन: रक्षा सूत्र से रिश्तों की डोर तक
समय के साथ यह वैदिक परंपरा सामाजिक रूप लेकर रक्षा बंधन में परिवर्तित हो गई। इसका उल्लेख भविष्योत्तर पुराण में मिलता है, जब इंद्र की पत्नी इंद्राणी ने उनके हाथ में रक्षा सूत्र बांधा था। यही परंपरा बाद में बहनों द्वारा भाइयों को राखी बांधने के रूप में प्रतिष्ठित हुई। आज भी यह पर्व भाई-बहन के रिश्ते को प्रेम, सुरक्षा और समर्पण से जोड़ता है।
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4. संस्कृत दिवस: ज्ञान की भाषा को नमनश्रावणी पूर्णिमा को संस्कृत दिवस के रूप में भी मनाया जाता है। संस्कृत न केवल एक भाषा है, बल्कि वेद, उपनिषद, आयुर्वेद, ज्योतिष और योग जैसे समस्त ज्ञान की जननी है। भारत सरकार ने 1969 से इस दिन को संस्कृत दिवस के रूप में मनाने की परंपरा शुरू की। प्राचीन काल में इसी दिन से गुरुकुलों में शिक्षा सत्र प्रारंभ होता था, जिससे इसका शैक्षणिक महत्व भी स्पष्ट होता है।
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5. पूर्णिमा एक, परंपराएं तीनश्रावणी पूर्णिमा भारतीय संस्कृति का एक अद्भुत संगम है, जिसमें उपाकर्म की आत्मिक पवित्रता, रक्षा बंधन की भावनात्मक मधुरता और संस्कृत दिवस की बौद्धिक ऊंचाई एक साथ विद्यमान हैं। यह पर्व भारतीय जीवन के विभिन्न आयामों का दर्पण है। जो धर्म, परिवार और ज्ञान को एक सूत्र में बांधता है। यह पर्व हमें आत्मशुद्धि, आत्मीयता और ज्ञान के प्रति सम्मान की प्रेरणा देता है।
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डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यहां दी गई जानकारी सामान्य मान्यताओं, ज्योतिष, पंचांग, धार्मिक ग्रंथों आदि पर आधारित है। यहां दी गई सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है।