विश्व वरिष्ठ नागरिक दिवस: अनुभव की छांव में संवर रहा हिमाचल, 92 फीसदी से अधिक गांवों में रह रहे बुजुर्ग
गांव की चौपाल पर अखबार पढ़ते बुजुर्ग, मंदिर की ओर जाते वरिष्ठ नागरिक, खेतों में अनुभव बांटते दादा-दादी और बच्चों को लोककथाएं सुनातीं नानियां, हिमाचली समाज की एक जीवंत तस्वीर पेश करती हैं।
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हिमाचल में बुजुर्ग सिर्फ उम्र का एक पड़ाव नहीं, बल्कि परिवार और समाज की मजबूत कड़ी हैं। गांव की चौपाल पर अखबार पढ़ते बुजुर्ग, मंदिर की ओर जाते वरिष्ठ नागरिक, खेतों में अनुभव बांटते दादा-दादी और बच्चों को लोककथाएं सुनातीं नानियां, हिमाचली समाज की एक जीवंत तस्वीर पेश करती हैं। यहां बुजुर्ग केवल एक आयु वर्ग नहीं, बल्कि अनुभव, परंपराओं और संस्कारों की जीवित विरासत हैं। प्रदेश के 92 फीसदी से अधिक वरिष्ठ नागरिक ग्रामीण क्षेत्रों में रहते हैं और सेवानिवृत्ति के बाद अधिकांश लोग शहरों की भागदौड़ छोड़ गांव लौटकर अपनी जड़ों से फिर जुड़ रहे हैं।
विश्व वरिष्ठ नागरिक दिवस के अवसर पर जब दुनिया बुजुर्गों के योगदान को याद कर रही है, तब हिमाचल भी एक महत्वपूर्ण सामाजिक बदलाव के दौर से गुजर रहा है। राज्य में हर दसवां व्यक्ति वरिष्ठ नागरिक है। वर्ष 2011 की जनगणना के अनुसार प्रदेश में 60 वर्ष और उससे अधिक आयु के 7.13 लाख वरिष्ठ नागरिक थे, जो कुल आबादी का 10.2 प्रतिशत हैं। वर्ष 2026 के अंत तक यह आंकड़ा नौ लाख के करीब पहुंचने की संभावना है। एक समय था, जब संयुक्त परिवारों में बुजुर्ग घर के केंद्र में होते थे। उनके अनुभव फैसलों की दिशा तय करते थे और परिवार की पहचान उनसे जुड़ी होती थी।
अब आधुनिक जीवनशैली, रोजगार की तलाश में युवाओं का पलायन और छोटे परिवारों की बढ़ती प्रवृत्ति ने इस तस्वीर को काफी हद तक बदल दिया है। हिमाचल के हजारों गांवों में आज बुजुर्ग माता-पिता अकेले रह रहे हैं। बच्चे पढ़ाई और नौकरी के लिए शहरों या दूसरे राज्यों में बस चुके हैं। मोबाइल और वीडियो कॉल ने दूरियां कुछ कम जरूर की हैं, लेकिन साथ बैठकर बातें करने और अपनापन महसूस करने का विकल्प कोई तकनीक नहीं बन पाई है। हिमाचल में जीवन प्रत्याशा बढ़ रही है।
आर्थिक एवं सांख्यिकी विभाग के सर्वेक्षण के अनुसार प्रदेश में जन्म के समय औसत जीवन प्रत्याशा 73.5 वर्ष है। यह स्वास्थ्य सुविधाओं और जीवन स्तर में सुधार का संकेत है। लेकिन लंबी उम्र अपने साथ नई चुनौतियां भी लेकर आती है। बढ़ती आयु के साथ स्वास्थ्य देखभाल, नियमित स्वास्थ्य जांच, मानसिक स्वास्थ्य, अकेलापन और आर्थिक सुरक्षा जैसे मुद्दे अधिक महत्वपूर्ण हो जाते हैं। पहले जहां बुजुर्गों की सबसे बड़ी चिंता आजीविका होती थी, वहीं अब उनके लिए सम्मानजनक और स्वस्थ जीवन सुनिश्चित करना बड़ी आवश्यकता है।
प्रदेश में वरिष्ठ नागरिक महिलाओं की संख्या पुरुषों से अधिक है। 60 वर्ष से अधिक आयु वर्ग में महिलाओं की संख्या 3.66 लाख है, जबकि पुरुषों की संख्या 3.46 लाख है। हिमाचल के बुजुर्ग केवल परिवारों का हिस्सा नहीं, बल्कि समाज की सामूहिक स्मृति भी हैं। खेती-किसानी के पारंपरिक तरीके, जल स्रोतों का संरक्षण, लोकगीत, लोककथाएं, पारंपरिक चिकित्सा और सामाजिक मूल्यों का बड़ा हिस्सा आज भी बुजुर्गों से अगली पीढ़ी तक पहुंच रहा है। डिजिटल युग में जब जानकारी एक क्लिक पर उपलब्ध है, तब भी जीवन के कठिन निर्णयों में परिवार अक्सर अपने बुजुर्गों की सलाह को महत्व देता है। यही सम्मान और पीढ़ियों के बीच यह जुड़ाव हिमाचली समाज की सबसे बड़ी ताकतों में से एक है।
सेवानिवृत्ति के बाद बागवानी बनी जिंदगी की नई पहचान
रोहड़ू निवासी जोगिंद्र सिंह ने सेवानिवृत्ति के बाद अपने जीवन को प्रकृति के करीब लाने का अनोखा रास्ता चुना है। हिम ऊर्जा में सीनियर प्रोजेक्ट ऑफिसर के पद पर सेवाएं देने के बाद वर्ष 2024 में सेवानिवृत्त हुए जोगिंद्र सिंह अब अपना अधिकांश समय बागवानी में बिताते हैं। वह बताते हैं कि नौकरी के दौरान व्यस्त दिनचर्या के कारण बागवानी के लिए अधिक समय नहीं मिल पाता था, लेकिन सेवानिवृत्ति के बाद उन्होंने इसे अपने जीवन का अहम हिस्सा बना लिया। पौधों की देखभाल और हरियाली के बीच समय बिताना उन्हें सुकून और नई ऊर्जा देता है। जोगिंद्र सिंह मधुमेह से भी पीड़ित हैं, लेकिन इसके बावजूद वह सक्रिय रहते हुए अपने शौक को पूरे उत्साह से निभा रहे हैं।