HP High Court: हिमाचल धार्मिक स्वतंत्रता कानून को चुनौती देने के लिए मांगा समय, सुनवाई 15 मार्च निर्धारित
याचिकाकर्ता ने हिमाचल धार्मिक स्वतंत्रता कानून अधिनियम 2019 के प्रावधानों को अदालत में चुनौती दी थी। याचिका में कहा गया था कि इस अधिनियम के प्रावधान भारतीय संविधान के अनुरूप नहीं हैं। ये प्रावधान नागरिकों के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करते हैं।
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हिमाचल धार्मिक स्वतंत्रता कानून को चुनौती देने के मामले में हाईकोर्ट ने याचिकाकर्ता को 15 मार्च तक अपनी याचिका संशोधित करने की छूट दी है। अदालत ने मामले की सुनवाई 15 मार्च निर्धारित की है। सरकार की ओर से दायर जवाब में इस कानून को सही ठहराया गया है। याचिकाकर्ता ने हिमाचल धार्मिक स्वतंत्रता कानून अधिनियम 2019 के प्रावधानों को अदालत में चुनौती दी थी। याचिका में कहा गया था कि इस अधिनियम के प्रावधान भारतीय संविधान के अनुरूप नहीं हैं। ये प्रावधान नागरिकों के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करते हैं। याचिकाकर्ता ने दलील दी थी कि अभी तक प्रदेश में इस अधिनियम में एक भी केस दर्ज नहीं हुआ है। ऐसी सूरत में कानूनी प्रावधानों को और सख्त बनाना कानूनी सिद्धांतों के अनुरूप नहीं है।
बता दें कि तत्कालीन भाजपा सरकार ने मानसून सत्र के आखिरी दिन प्रदेश में धर्मांतरण संशोधन विधेयक को सदन में पारित किया था। अनुसूचित जाति और अन्य आरक्षित वर्ग के लोग अगर धर्म परिवर्तन करते हैं तो उनको किसी तरह का आरक्षण न देने का प्रावधान किया गया है। इसके अलावा अगर वे धर्म परिवर्तन की बात छिपाकर आरक्षण की सुविधाएं लेते हैं तो ऐसे में उन्हें तीन से पांच साल तक सजा और 50 हजार से एक लाख रुपये तक का जुर्माना होगा। संशोधित कानून के मसौदे के मुताबिक किसी व्यक्ति की ओर से अन्य धर्म में विवाह करने और ऐसे विवाह के समय अपने मूल धर्म को छिपाने की स्थिति में भी तीन से 10 साल तक के कारावास का प्रावधान होगा। कानून में दो लाख रुपये तक के जुर्माने का भी प्रावधान है।
हत्या के आरोप में सजायाफ्ता कैदी हाईकोर्ट से बरी
वहीं, प्रदेश हाईकोर्ट ने हत्या के आरोप में सजा भुगत रहे सतपाल को बरी कर दिया है। न्यायाधीश सबीना और न्यायाधीश सुशील कुकरेजा की खंडपीठ ने अपीलकर्ता को तुरंत प्रभाव से रिहा करने के आदेश दिए हैं। सत्र न्यायाधीश सोलन ने सतपाल को हत्या का दोषी ठहराते हुए उम्र कैद की सजा सुनाई थी। इस निर्णय को सतपाल ने अपील के माध्यम से हाईकोर्ट के समक्ष चुनौती दी। मामले के अनुसार भीषम ठाकुर दाड़लाघाट में टैक्सी चलाता था। 19 जून 2009 को पेट्रोन कंपनी ने अपने कुछ कर्मचारियों को पंजाब राज्य के मोगा क्षेत्र में भेजने के लिए भीषम ठाकुर की टैक्सी बुक की। भीषम ठाकुर यात्रियों को छोड़ने मोगा गया लेकिन, वापिस नहीं लौटा। उसके परिजनों ने पुलिस में गुमशुदगी की रिपोर्ट दर्ज करवाई। पुलिस ने जांच के दौरान पाया कि पंजाब के पुलिस थाना कुराली में रिपोर्ट दर्ज हुई कि 20 जून को एक व्यक्ति बेहोशी की हालत में पाया गया। इलाज के लिए उसे पीजीआई भेजा गया। गंभीर हालत होने के कारण उसकी मौत हो गई और पुलिस उसके बयान दर्ज नहीं कर पाई। इधर, पुलिस जांच में पाया गया कि भीषम ठाकुर अपीलकर्ता सतपाल समेत कंपनी के दो अन्य कर्मचारियों को छोड़ने मोगा गया था। जांच के आधार पर पुलिस ने सतपाल के खिलाफ भारतीय दंड संहिता की धारा 302, 364, 392, 427 और 120 बी के तहत मामला दर्ज किया। सतपाल के खिलाफ सत्र न्यायाधीश सोलन की अदालत में अभियोग चलाया गया। निचली अदालत ने अभियोग को स्वीकार करते हुए उसे भीषम ठाकुर की हत्या का दोषी ठहराया था। हाईकोर्ट ने मामले से जुड़े तमाम रिकॉर्ड का अवलोकन करने के बाद पाया की अभियोजन पक्ष आरोपी के खिलाफ अभियोग साबित करने में नाकाम रहा है। अदालत ने अपने निर्णय में कहा कि अभियोजन पक्ष की कहानी और दलीलें विरोधाभासी है। कहानी में यदि शक की गुंजाइश रहती है तो इसका लाभ अभियुक्त को दिया जाना चाहिए।