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Shimla News: वाहन में डिफेक्ट साबित करने को तकनीकी साक्ष्य अनिवार्य
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जिला आयोग का फैसला किया निरस्त
टेंपो की चेसिस में दरारें आने के मामले में सुनाया फैसला
संवाद न्यूज एजेंसी
शिमला। राज्य उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग ने अपने फैसले में स्पष्ट किया है कि किसी वाहन में मैन्युफैक्चरिंग डिफेक्ट (निर्माण संबंधी दोष) साबित करने के लिए तकनीकी साक्ष्य या विशेषज्ञ की रिपोर्ट होना जरूरी है। केवल चेसिस में दरार आने की शिकायत से मैन्युफैक्चरिंग डिफेक्ट साबित नहीं होता।
राज्य उपभोक्ता आयोग के अध्यक्ष न्यायमूर्ति इंदर सिंह मेहता और सदस्य योगिता दत्ता की खंडपीठ ने जिला उपभोक्ता आयोग, ऊना के उस फैसले को निरस्त कर दिया जिसमें डीलर को हर्जाना देने के आदेश दिए थे। आयोग ने लिब्रा ऑटोमोबाइल लिमिटेड की ओर से दायर अपील को स्वीकार करते हुए यह फैसला सुनाया। ऊना निवासी नीलम कुमारी ने 20 सितंबर 2019 को लिब्रा ऑटोमोबाइल से 9 लाख रुपये में नया टेंपो खरीदा था। शिकायतकर्ता का आरोप था कि पहली सर्विस के दौरान ही वाहन का स्टीरियो खराब हो गया था। इसके बाद वर्ष 2021 में चेसिस के अगले हिस्से में दरारें आ गईं।
आरोप लगाया कि डीलर ने इन्हें ठीक करने या वाहन बदलने से इनकार कर दिया, जिसके चलते शिकायतकर्ता को बाहर से 10 हजार रुपये खर्च कर मरम्मत करवानी पड़ी। इसे सेवाओं में कमी बताते हुए उन्होंने जिला उपभोक्ता आयोग ऊना में शिकायत दर्ज करवाई थी। जिला आयोग ने डीलर और निर्माता के खिलाफ एकतरफा सुनवाई करते हुए 1,71,500 रुपये नौ प्रतिशत ब्याज सहित लौटाने, 30 हजार रुपये मानसिक उत्पीड़न के लिए और 20 हजार रुपये मुकदमे के खर्च के रूप में अदा करने के आदेश दिए थे। इस फैसले के खिलाफ डीलर ने राज्य आयोग में अपील दायर की थी।
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राज्य आयोग ने रिकॉर्ड का अवलोकन करने के बाद पाया कि वर्ष 2020 के जॉब कार्ड में स्टीरियो या चेसिस में दरार से संबंधित कोई शिकायत दर्ज नहीं थी, जबकि उस समय तक वाहन 32,025 किलोमीटर चल चुका था। इसके अलावा, रिकॉर्ड पर कोई विशेषज्ञ रिपोर्ट या तकनीकी साक्ष्य प्रस्तुत नहीं किया था।
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टेंपो की चेसिस में दरारें आने के मामले में सुनाया फैसला
संवाद न्यूज एजेंसी
शिमला। राज्य उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग ने अपने फैसले में स्पष्ट किया है कि किसी वाहन में मैन्युफैक्चरिंग डिफेक्ट (निर्माण संबंधी दोष) साबित करने के लिए तकनीकी साक्ष्य या विशेषज्ञ की रिपोर्ट होना जरूरी है। केवल चेसिस में दरार आने की शिकायत से मैन्युफैक्चरिंग डिफेक्ट साबित नहीं होता।
राज्य उपभोक्ता आयोग के अध्यक्ष न्यायमूर्ति इंदर सिंह मेहता और सदस्य योगिता दत्ता की खंडपीठ ने जिला उपभोक्ता आयोग, ऊना के उस फैसले को निरस्त कर दिया जिसमें डीलर को हर्जाना देने के आदेश दिए थे। आयोग ने लिब्रा ऑटोमोबाइल लिमिटेड की ओर से दायर अपील को स्वीकार करते हुए यह फैसला सुनाया। ऊना निवासी नीलम कुमारी ने 20 सितंबर 2019 को लिब्रा ऑटोमोबाइल से 9 लाख रुपये में नया टेंपो खरीदा था। शिकायतकर्ता का आरोप था कि पहली सर्विस के दौरान ही वाहन का स्टीरियो खराब हो गया था। इसके बाद वर्ष 2021 में चेसिस के अगले हिस्से में दरारें आ गईं।
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आरोप लगाया कि डीलर ने इन्हें ठीक करने या वाहन बदलने से इनकार कर दिया, जिसके चलते शिकायतकर्ता को बाहर से 10 हजार रुपये खर्च कर मरम्मत करवानी पड़ी। इसे सेवाओं में कमी बताते हुए उन्होंने जिला उपभोक्ता आयोग ऊना में शिकायत दर्ज करवाई थी। जिला आयोग ने डीलर और निर्माता के खिलाफ एकतरफा सुनवाई करते हुए 1,71,500 रुपये नौ प्रतिशत ब्याज सहित लौटाने, 30 हजार रुपये मानसिक उत्पीड़न के लिए और 20 हजार रुपये मुकदमे के खर्च के रूप में अदा करने के आदेश दिए थे। इस फैसले के खिलाफ डीलर ने राज्य आयोग में अपील दायर की थी।
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राज्य आयोग ने रिकॉर्ड का अवलोकन करने के बाद पाया कि वर्ष 2020 के जॉब कार्ड में स्टीरियो या चेसिस में दरार से संबंधित कोई शिकायत दर्ज नहीं थी, जबकि उस समय तक वाहन 32,025 किलोमीटर चल चुका था। इसके अलावा, रिकॉर्ड पर कोई विशेषज्ञ रिपोर्ट या तकनीकी साक्ष्य प्रस्तुत नहीं किया था।