यहां बेटियों को समझते थे बोझ, इन्होंने आसमान छूकर 'आईना' दिखाया
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बेटी है इसे ज्यादा पढ़ाने की जरूरत नहीं। प्राइवेट स्कूल में पढ़ाकर क्यों ज्यादा खर्चा कर रहे हो। इसे पास के ही किसी सरकारी स्कूल में दाखिल करवा दो।
स्कूल में दाखिले के समय मेरे पिताजी से कुछ ऐसा ही हमारे रिश्तेदारों और लोगों ने कहा, लेकिन पापा ने उनकी एक न सुनी। यह कहना है पालमपुर (कांगड़ा) की शिवानी राणा का।
उनके मुताबिक मैं ऐसे समाज में पली बढ़ी जहां पर बेटियों को पढ़ाना बोझ समझा जाता था। 20 सितंबर, 1992 को देहरा में मेरा जन्म हुआ। पिता जगरूप सिंह कहते थे कि तुझे ऐसी शिक्षा दूंगा कि सबको तुझ पर नाज होगा। वहीं, माता सतीश कुमारी ने भी मेरा हर कदम पर साथ दिया।
रिश्तेदारों के विरोध के बावजूद पापा मुझे अपने साथ पालमपुर ले गए। यहां आर्मी स्कूल में मेरी एडमिशन करवाई। यहां प्रारंभिक शिक्षा लेने के बाद केंद्रीय विद्यालय पालमपुर में दाखिल करवाया। मुझे बचपन से ही किताबों से बहुत प्यार रहा है।
इंजीनियर बनकर समाज को आइना दिखाया
दसवीं कक्षा में मैंने 80 फीसदी अंक प्राप्त किए। इस बीच, पॉलीटेक्निक प्रवेश परीक्षा भी पास की। कॉलेज अच्छा न मिलने पर पिताजी ने मुझसे जालंधर से एक प्राइवेट यूनिवर्सिटी में तीन साल का इंजीनियरिंग का डिप्लोमा करवाया।
इसमें 84 फीसदी अंक हासिल किए। इसके बाद सुंदरनगर कॉलेज से 74 फीसदी अंकों के साथ बीटेक की डिग्री हासिल की। मैं अपने गांव से इंजीनियर बनने वाली तीसरी लड़की हूं।
किसी समय बेटी को ज्यादा न पढ़ाने की बात कहने वाले लोग और रिश्तेदार अब कहते हैं कि बेटी ने नाम रोशन कर दिया। आज मैंने जो मुकाम पाया है, उसके लिए मैं अपने माता-पिता की शुक्रगुजार हूं।
बस समाज के लोगों से कहना चाहती हूं कि बेटी एक दीपक के समान है, जो पूरे घर को रोशन करने का दम रखती है। बेटी पढ़ी लिखी होगी तो वह मां, बहन, पत्नी और बहू बनकर सबके दिलों से अज्ञान के अंधेरे को दूर करेगी।