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आपातकाल पर विद्यार्थी भी करें शोध : भारद्वाज
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एचपीयू में आपातकाल पर हुई संगोष्ठी
पूर्व मंत्री बोले, आपातकाल देश के लिए काला अध्याय
अमर उजाला ब्यूरो
शिमला। शोध समिति की प्रदेश इकाई ने बुधवार को आपातकाल 1975 : भारतीय लोकतंत्र के सबसे काले अध्याय की पुनर्समीक्षा विषय पर संगोष्ठी का आयोजन किया। हिमाचल प्रदेेश विश्वविद्यालय (एचपीयू) शिमला में आयोजित इस संगोष्ठी में पूर्व मंत्री सुरेश भारद्वाज ने बतौर मुख्य अतिथि शिरकत की। उन्होंने छात्रों और शोधार्थियों को आपातकाल विषय पर शोध करने का सुझाव भी दिया। उन्होंने 1975 में लागू आपातकाल की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि, उसके दुष्परिणामों और लोकतांत्रिक संस्थाओं पर पड़े प्रभावों पर प्रकाश डाला।
उन्होंने कहा कि वह भारतीय लोकतंत्र की परीक्षा की घड़ी थी जिसने संविधान, नागरिक स्वतंत्रता और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को गहरे संकट में डाल दिया। यह देश के लिए काला अध्याय है। कहा कि तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की तानाशाही नेतृत्व शैली ने मंत्रिमंडल से सलाह लिए बिना राष्ट्रीय आपातकाल लगा दिया। संगोष्ठी में निदेशक यूआईएलएस प्रो. शिव डोगरा ने संविधान के सिद्धांतों की रक्षा के लिए जन-जागरुकता और सांवैधानिक मूल्यों के प्रति प्रतिबद्धता को आज के संदर्भ में आवश्यक बताया। कहा कि यह घटना हमें हमेशा याद दिलाती है कि कैसे हमारे भारतीय संविधान की हत्या की। वक्ताओं ने कहा कि यह केवल एक राजनीतिक घटना नहीं थी बल्कि यह भारतीय लोकतंत्र की आत्मा पर गहरी चोट थी। इससे हमें आज भी सीख लेने की आवश्यकता है। संगोष्ठी में विभिन्न उच्च शिक्षण संस्थानों के शिक्षकों, शोधार्थियों, विद्यार्थियों और बुद्धिजीवियों ने भाग लिया। इनमें प्रो. देवदत्त शर्मा, प्रो. प्रमोद शर्मा, प्रो. उमेश शर्मा, अभाविप पूर्व प्रांत संगठन मंत्री कौल नेगी, रोहित शर्मा, डॉ. शशिकांत शर्मा, डॉ. रीतिका शर्मा, सर्वेश दीक्षित और निकिता लखनपाल मौजूद रहे।
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पूर्व मंत्री बोले, आपातकाल देश के लिए काला अध्याय
अमर उजाला ब्यूरो
शिमला। शोध समिति की प्रदेश इकाई ने बुधवार को आपातकाल 1975 : भारतीय लोकतंत्र के सबसे काले अध्याय की पुनर्समीक्षा विषय पर संगोष्ठी का आयोजन किया। हिमाचल प्रदेेश विश्वविद्यालय (एचपीयू) शिमला में आयोजित इस संगोष्ठी में पूर्व मंत्री सुरेश भारद्वाज ने बतौर मुख्य अतिथि शिरकत की। उन्होंने छात्रों और शोधार्थियों को आपातकाल विषय पर शोध करने का सुझाव भी दिया। उन्होंने 1975 में लागू आपातकाल की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि, उसके दुष्परिणामों और लोकतांत्रिक संस्थाओं पर पड़े प्रभावों पर प्रकाश डाला।
उन्होंने कहा कि वह भारतीय लोकतंत्र की परीक्षा की घड़ी थी जिसने संविधान, नागरिक स्वतंत्रता और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को गहरे संकट में डाल दिया। यह देश के लिए काला अध्याय है। कहा कि तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की तानाशाही नेतृत्व शैली ने मंत्रिमंडल से सलाह लिए बिना राष्ट्रीय आपातकाल लगा दिया। संगोष्ठी में निदेशक यूआईएलएस प्रो. शिव डोगरा ने संविधान के सिद्धांतों की रक्षा के लिए जन-जागरुकता और सांवैधानिक मूल्यों के प्रति प्रतिबद्धता को आज के संदर्भ में आवश्यक बताया। कहा कि यह घटना हमें हमेशा याद दिलाती है कि कैसे हमारे भारतीय संविधान की हत्या की। वक्ताओं ने कहा कि यह केवल एक राजनीतिक घटना नहीं थी बल्कि यह भारतीय लोकतंत्र की आत्मा पर गहरी चोट थी। इससे हमें आज भी सीख लेने की आवश्यकता है। संगोष्ठी में विभिन्न उच्च शिक्षण संस्थानों के शिक्षकों, शोधार्थियों, विद्यार्थियों और बुद्धिजीवियों ने भाग लिया। इनमें प्रो. देवदत्त शर्मा, प्रो. प्रमोद शर्मा, प्रो. उमेश शर्मा, अभाविप पूर्व प्रांत संगठन मंत्री कौल नेगी, रोहित शर्मा, डॉ. शशिकांत शर्मा, डॉ. रीतिका शर्मा, सर्वेश दीक्षित और निकिता लखनपाल मौजूद रहे।
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