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हाईकोर्ट के फैसले को 'देव संसद' में चुनौती

Fri, 12 Sep 2014 09:21 AM IST
Updated Fri, 12 Sep 2014 09:21 AM IST
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slaughtered ritual: challenge to HC verdict in himachal.

हाईकोर्ट की ओर से धार्मिक स्थलों में पशु बलि पर रोक के फैसले को देव समाज से जुड़े लोग देव परंपरा पर संकट मान रहे हैं। यही वजह है कि इस मसले पर कुल्लू के नग्गर में जगती (देव ससंद) बुलाई जा रही है।

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संकट की घड़ी में ही जगती का आयोजन होता है। 100 साल में ऐसा तीसरी बार हो रहा है। पशु बलि पर जगती पट्ट नग्गर में 26 सितंबर को देव ससंद बुलाई गई है। इसमें इस मसले पर देवताओं की राय जानी जाएगी। देवता ही तय करेंगे कि बलि पर रोक लगेगी या नहीं।
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इसके साथ ही पशु बलि पर कोर्ट के फैसले पर पुनर्विचार याचिका भी दाखिल की जाएगी। देव मानस मिलन के प्रतीक कुल्लू दशहरा उत्सव से ठीक पहले इस जगती का अलग महत्व माना जा रहा है। लोगों की देवताओं में गहरी आस्था है। इसलिए लोग कोर्ट के फैसले को भी चुनौती दे रहे हैं।

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देवसंसद ने खारिज किया था 1600 करोड़ का प्रोजेक्ट

slaughtered ritual: challenge to HC verdict in himachal.

इससे पहले 100 साल में दो बार इस देव संसद का आयो‌जन किया जा चुका है। 16 फरवरी 2006 में जगती का आयोजन हुआ था। उस दिन घाटी के सौ देवता जगती पट्ट मंदिर में एकत्रित हुए थे।

इस दौरान देवताओं ने 1600 करोड़ के स्की विलेज प्रोजेक्ट को खारिज कर दिया था। प्रदेश सरकार ने पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए इस प्रोजेक्ट को तैयार किया था। लेकिन जहां ये प्रोजेक्ट लगना था, वहां के लोगों ने इसका विरोध किया था।

लोगों ने इसे देव परंपरा के खिलाफ माना था। इसलिए बाद में देव संसद बुलाई गई जिसमें सभी देवताओं ने इसे खारिज कर दिया था। ऐसे में सरकार का स्की विलेज का सपना भी टूट गया था।

1971 में भी बुलाई थी जगती

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1971 में दशहरा उत्सव के दौरान उठे विवाद के बाद भी जगती बुलाई गई थी। कारदार संघ के महासचिव टीसी महंत ने बताया कि देव-मानस मेले में सदियों से पशु बलि की परंपरा रही है। लिहाजा, देव समाज ने संकट की इस घड़ी में देवताओं की शरण ली है। सौ करडू की सौह नग्गर में जगती पट्ट मंदिर में 26 सितंबर को जगती बुलाने का निर्णय लिया है।

नग्गर कैसल में है जगती पट्ट

जगती पट्ट मंदिर रियासतकालीन राजधानी नग्गर कैसल में है। इसे अठारह करडू की सौह के नाम से भी जाना जाता है। इस मंदिर में स्थापित चपटे स्लेटनुमा शिला के बारे में बताया जाता है कि अठारह करोड़ देवी-देवताओं ने मधुमक्खी का रूप धारण कर इसे स्वयं उठाकर यहां लाया है।

क्या है जगती

धार्मिक, आर्थिक, सांस्कृतिक व सामाजिक स्तर पर संकट होने की स्थिति में देव समाज के लोग जगती का आयोजन करते हैं। महामारी और अकाल पर भी जगती बुलाने की बात कही जाती है। जगती पूछ के लिए दूर-दूर से घाटी के देवता अपने रथ समेत मंदिर पहुंचते हैं। वे अपने गूर के माध्यम से अपना फैसला सुनाते हैं।

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