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शरद पूर्णिमा व्रत आज, सुबह 11:55 बजे से शुरू होगी तिथि

Sat, 24 Oct 2026 11:59 PM IST
Shimla Bureau शिमला ब्यूरो
Updated Sat, 24 Oct 2026 11:59 PM IST
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Sharad Purnima fast today, date will start from 11:55 am
चांदनी रात में खीर रखने की है मान्यता, चंद्रमा के दर्शन और ध्यान व पूजा है विशेष महत्व
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रात 8:30 से 11:30 बजे तक खीर रखने का शुभ समय
संवाद न्यूज एजेंसी
शिमला। आश्विन मास की पूर्णिमा को मनाया जाने वाला शरद पूर्णिमा का पर्व इस बार 25 अक्तूबर रविवार को मनाया जाएगा। इसे कोजागरी पूर्णिमा और रास पूर्णिमा के नाम से भी जाना जाता है। हिंदू धर्म में इस पर्व का विशेष महत्व है।

धार्मिक मान्यता है कि शरद पूर्णिमा की रात चंद्रमा अपनी सोलह कलाओं से परिपूर्ण होता है और उसकी किरणों से अमृत वर्षा होती है। इसी विश्वास के चलते श्रद्धालु रात में खीर बनाकर खुले आसमान के नीचे रखते हैं और अगले दिन इसे प्रसाद के रूप में ग्रहण करते हैं। यह पर्व पूजा-पाठ के साथ पारिवारिक परंपराओं और भारतीय संस्कृति से जुड़ने का भी अवसर है। गंज बाजार स्थित राधा-कृष्ण मंदिर शिमला के पंडित उमेश चंद्र नौटियाल ने बताया कि पूर्णिमा तिथि 25 अक्तूबर को सुबह 11:55 बजे शुरू होकर 26 अक्तूबर को सुबह 9:41 बजे तक रहेगी। चंद्रोदय शाम करीब पांच बजे होने का अनुमान है, जबकि खीर रखने का शुभ समय रात 8:30 बजे से 11:30 बजे तक बताया है। 26 अक्तूबर को स्नान-दान के लिए ब्रह्म मुहूर्त सुबह 4:46 से 5:38 बजे तक रहेगा। इस रात चंद्रमा के दर्शन, ध्यान और पूजा-अर्चना के साथ खुले आसमान के नीचे खीर रखने की परंपरा निभाई जाती है। पंडित नौटियाल ने बताया कि शरद पूर्णिमा पर मां लक्ष्मी की पूजा और रात्रि जागरण का भी विशेष महत्व है। धार्मिक कथाओं के अनुसार इसी पूर्णिमा की चांदनी रात में भगवान श्रीकृष्ण ने वृंदावन में गोपियों के साथ महारास रचाया था। इसी कारण इसे रास पूर्णिमा भी कहा जाता है।
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मां लक्ष्मी करती हैं पृथ्वी भ्रमण
पौराणिक मान्यता के अनुसार इस रात मां लक्ष्मी पृथ्वी पर भ्रमण करती हैं और यह देखती हैं कि कौन जाग रहा है। इसी मान्यता के चलते इसे कोजागरी पूर्णिमा कहा जाता है। श्रद्धालु मां लक्ष्मी की पूजा-अर्चना कर घर में सुख-समृद्धि की कामना करते हैं। शरद पूर्णिमा का संबंध समुद्र मंथन से भी जोड़ा जाता है। मान्यता है कि समुद्र मंथन के दौरान इसी दिन मां लक्ष्मी प्रकट हुई थीं। इसलिए इस अवसर पर उनकी विशेष पूजा-अर्चना की जाती है।
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