शोध में खुलासा: जलस्त्रोतों में प्लास्टिक कण, जलीय जीव खाने से बिगड़ रही सेहत
मछलियां और अन्य जलीय जीव प्लास्टिक के सूक्ष्म कण अपना आहार समझकर निगल रहे हैं। ये फूड चेन में आकर मनुष्य के शरीर में प्रवेश कर रहे हैं। केंद्रीय विश्वविद्यालय धर्मशाला, आईआईटी मंडी सहित सात प्रमुख संस्थानों के अध्ययन में यह खुलासा हुआ है।
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प्लास्टिक के सूक्ष्म कण पानी में घुल रहे हैं। मछलियां और अन्य जलीय जीव इसे अपना आहार समझकर निगल रहे हैं। ये फूड चेन में आकर मनुष्य के शरीर में प्रवेश कर रहे हैं। केंद्रीय विश्वविद्यालय धर्मशाला, आईआईटी मंडी सहित सात प्रमुख संस्थानों के अध्ययन में यह खुलासा हुआ है। विशेषज्ञों ने एडवांस फिल्टरेशन तकनीक, ऑक्सीडेशन प्रक्रिया आदि को अपनाने की जरूरत जताई है। यह अध्ययन जर्नल ऑफ एन्वायरनमेंट में छापा गया है। यह शोध हिमाचल प्रदेश केंद्रीय विश्वविद्यालय धर्मशाला के पर्यावरण विज्ञान विभाग की डॉ. सोनिया भंडारी, डॉ. ऋचा पांजला, आईसीएफआरई-हिमालयी वन अनुसंधान संस्थान पंथाघाटी शिमला के वन पारिस्थितिकी और जलवायु परिवर्तन प्रभाग के डॉ. अनिल कुमार और ने किया है।
इनके अलावा इस अध्ययन में गुरु जम्भेश्वर विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय हिसार के रसायन विज्ञान विभाग, हरियाणा केंद्रीय विश्वविद्यालय जांट-पाली महेंद्रगढ़ के पर्यावरण अध्ययन विभाग, महाराणा प्रताप बागवानी विश्वविद्यालय करनाल और महाराणा प्रताप बागवानी विश्वविद्यालय करनाल के प्राकृतिक संसाधन प्रबंधन विभाग के विशेषज्ञों ने भी भाग लिया। अध्ययन के अनुसार माइक्रोप्लास्टिक (एमपी) विभिन्न प्राथमिक और द्वितीयक स्रोतों से उत्पन्न होते हैं व बहुआयामी पर्यावरणीय समस्याएं उत्पन्न करते हैं। वे गैर-बायोडिग्रेडेबल प्रकृति के होते हैं और लंबे समय तक जलीय वातावरण में रह सकते हैं।
वर्तमान समीक्षा अध्ययन में माइक्रो प्लास्टिक से संबंधित नए पहलुओं को शामिल किया गया, जो पहले के अध्ययनों में शामिल नहीं रहे। जलीय प्रजातियां गलती से एमपी को शिकार समझकर और खाद्य कड़ी के माध्यम से निगल लेती हैं और फिर विभिन्न चयापचय विकारों से पीड़ित होती हैं। मछली और अन्य जलीय जीवों का सेवन के परिणामस्वरूप मनुष्यों में स्वास्थ्य संबंधी विकार पैदा हो रहे हैं। इससे न्यूरोटॉक्सिसिटी, साइटोटॉक्सिसिटी, प्रजनन संबंधी समस्याएं, प्रतिकूल व्यवहार और ऑटिज्म भी हो हो रहा है। भविष्य में ऐसे अध्ययन को उन्नत निस्पंदन तकनीकों, उन्नत ऑक्सीकरण प्रक्रियाओं, प्लास्टिक कचरे से ऊर्जा वसूली, जलीय पर्यावरण और मानव स्वास्थ्य में कार्बन पृथक्करण पर प्रभावों पर ध्यान केंद्रित करने की जरूरत जताई गई है।