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Shimla News: देव परंपरा और लोक संस्कृति पर शोध करेगी अनुसंधान परिषद

Tue, 21 Apr 2026 11:59 PM IST
Shimla Bureau शिमला ब्यूरो
Updated Tue, 21 Apr 2026 11:59 PM IST
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Research Council will conduct research on Dev tradition and folk culture
देव परंपरा की जड़ों तक पहुंचने की रहेगी पहल, मंडी और कुल्लू की लोक संस्कृति पर होगा व्यापक शोध
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खास खबर
सामाजिक निर्णय में भी देव संस्कृति की अहम भूमिका
संवाद न्यूज एजेंसी
शिमला। मंडी और कुल्लू जिलों की देव परंपरा और लोक संस्कृति को गहराई से समझने तथा संरक्षित करने की दिशा में शोध शुरू हो गया है। भारतीय ऐतिहासिक अनुसंधान परिषद (आईसीएचआर) के सहयोग से संचालित यह शोध परियोजना न केवल प्राचीन धार्मिक परंपराओं की ऐतिहासिक पड़ताल करेगी बल्कि पहाड़ी समाज में उनकी वर्तमान भूमिका और सामाजिक प्रभाव का भी वैज्ञानिक विश्लेषण करेगी।

यह शोध विशेष रूप से देव परंपरा से जुड़े मौखिक इतिहास, लोक कथाओं, अनुष्ठानों और सामुदायिक जीवन के विभिन्न पहलुओं को समझने पर केंद्रित है। पहाड़ी समाज में देव संस्कृति न केवल धार्मिक आस्था का विषय है बल्कि यह सामाजिक निर्णय, सामूहिक पहचान और स्थानीय शासन व्यवस्था तक में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। ऐसे में इस परियोजना के माध्यम से इन परंपराओं के ऐतिहासिक विकास और वर्तमान स्वरूप का तुलनात्मक अध्ययन किया जाएगा। परियोजना का नेतृत्व डॉ. सुनीता देवी कर रही हैं जो एचपीयू डिस्टेंस एजुकेशन स्टडीज से जुड़ी हैं। शोध कार्य के तहत क्षेत्रीय स्तर पर विस्तृत फील्ड वर्क, सर्वेक्षण और गुणात्मक साक्षात्कार किए जाएंगे जिसमें स्थानीय समुदायों, देव संस्थानों और पारंपरिक ज्ञान धारकों से जानकारी एकत्र की जाएगी। इसके साथ ही एकत्रित आंकड़ों का विश्लेषण आधुनिक शोध उपकरणों की मदद से किया जाएगा ताकि एक ठोस और प्रामाणिक अध्ययन प्रस्तुत किया जा सके।
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रिसर्च असिस्टेंट के पद के लिए आवेदन आमंत्रित

परियोजना के तहत एक रिसर्च असिस्टेंट के पद के लिए आवेदन भी आमंत्रित किए हैं। चयनित अभ्यर्थी को डेटा संग्रह, विश्लेषण और रिपोर्ट लेखन सहित विभिन्न शोध गतिविधियों में शामिल किया जाएगा। यह नियुक्ति प्रारंभिक रूप से तीन माह के लिए होगी जिसे प्रदर्शन के आधार पर आगे बढ़ाया जा सकता है। आवेदन की अंतिम तिथि 23 अप्रैल निर्धारित की गई है जबकि साक्षात्कार 25 अप्रैल को ऑनलाइन और ऑफलाइन माध्यम में आयोजित होगा। विशेषज्ञों के अनुसार इस प्रकार की शोध पहलें न केवल हिमाचल की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत को संरक्षित करने में सहायक हैं, बल्कि क्षेत्रीय अध्ययन के क्षेत्र में अकादमिक शोध को भी नई दिशा देती हैं।
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