Himachal: प्रोटीन से भरपूर पराली मशरूम 12 दिन में होगी तैयार, खुब अनुसंधान निदेशालय ने ईजाद की किस्म
खुब निदेशालय में मेले के दौरान पराली मशरूम की प्रदर्शनी में इसके फायदे और उगाने की तकनीक के बारे में जानकारी प्रदान की गई। इस मशरूम की खास बात यह है कि इसे तैयार करने में समय के साथ खर्च भी कम है।
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
विस्तार
प्रोटीन के लिए मांसाहार से परहेज करने वाले शाकाहारी लोग पराली (पैडी स्ट्रॉ) मशरूम के सेवन से इस कमी को पूरा कर सकते हैं। खुब निदेशालय में मेले के दौरान पराली मशरूम की प्रदर्शनी में इसके फायदे और उगाने की तकनीक के बारे में जानकारी प्रदान की गई। इस मशरूम की खास बात यह है कि इसे तैयार करने में समय के साथ खर्च भी कम है। उत्पादन के मामले में यह मशरूम देश में तीसरे स्थान पर है। प्रोटीन के लिए मांसाहार का इस्तेमाल नहीं करने वालों के लिए यह बेहतर विकल्प है। दिल्ली, पंजाब समेत अन्य राज्यों में जलाई जाने वाली धान की पराली के प्रबंधन के लिए खुब अनुसंधान निदेशालय ने इस किस्म को तैयार तैयार किया है।
डीएमआर के डॉ. जगदीश ने बताया कि यह मशरूम 12 दिन में तैयार हो जाती है। इसे गेहूं के भूसे, पराली और कपास के अवशेषों पर भी आसानी से उगाया जा सकता है। डीएमआर ने इसे क्रेट में तैयार करने का भी सफल शोध किया है। इस मशरूम का अधिक सेवन ओडिशा और छत्तीसगढ़ में किया जा रहा है। यह मशरूम बटन और ढींगरी से अधिक स्वादिष्ट होने के साथ अधिक मात्रा में प्रोटीन भी देता है। बाजार में इसकी कीमत 350 से 400 रुपये प्रति किलो रहती है। बाजार में इसकी मांग कम होने पर किसान इसे सुखाने के बाद पाउडर भी तैयार कर सकते हैं। खुब अनुसंधान निदेशालय के निदेशक डॉ. वीपी शर्मा ने बताया कि इस मशरूम में प्रोटीन और विटामिन डी भरपूर मात्रा में है। इस मशरूम को तैयार करने का मुख्य उद्देश्य पराली जलाने पर रोक लगाना है। इस मशरूम को पराली समेत फसलों के अन्य अवशेषों पर तैयार किया जा सकता है।
इसलिए कहते हैं पराली मशरूम
पराली मशरूम की खेती किसानों को पराली जलाने की समस्या से बचाने और इसे मूल्यवान संसाधन में बदलने का एक तरीका है, जो पर्यावरण और किसानों दोनों के लिए फायदेमंद है। पैडीस्ट्रा मशरूम को पराली मशरूम इसलिए कहते हैं कि यह धान (फसल के अवशेष) का उपयोग कर उगाए जाने वाली मशरूम है। यह मिट्टी की उर्वरता बढ़ाता है, और किसानों को अतिरिक्त आय का एक लाभदायक स्रोत प्रदान करता है। किसान इसे पराली के ऊपर खुले खेत में भी तैयार कर सकते हैं। इसमें पराली की एक सतह पर बीज डाला जाता है, जिसके बाद उसे पराली और प्लास्टिक के साथ ढक दिया जाता है। सात दिन बाद इससे प्लॉस्टिक को हटा दिया जाता है। 12 दिन में यह मशरूम तैयार हो जाती है।