Potato Seed: एरोपोनिक तकनीक से आलू बीज का संकट होगा दूर, सीपीआरआई करेगा पहल
केंद्रीय आलू अनुसंधान संस्थान (सीपीआरआई) एरोपोनिक तकनीक की मदद से 7 से 8 सालों में देश में 60 फीसदी तक आलू बीज उपलब्ध करवाएगा।
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देश में अब किसानों को आलू बीज की कमी नहीं खलेगी। केंद्रीय आलू अनुसंधान संस्थान (सीपीआरआई) एरोपोनिक तकनीक की मदद से 7 से 8 सालों में देश में 60 फीसदी तक आलू बीज उपलब्ध करवाएगा। संस्थान अब तक 35 आलू बीज उत्पादकों को एरोपोनिक तकनीक से आलू बीज तैयार करने का लाइसेंस जारी कर चुका है। हर साल 8 से 10 लाइसेंस दिए जा रहे हैं। मौजूदा समय में सीपीआरआई देश की मांग के मुकाबले 10 फीसदी ही आलू बीज उपलब्ध करवा पा रहा है। देश में अच्छी गुणवत्ता का वायरस रहित आलू बीज तैयार करने के लिए सीपीआरआई शिमला की ओर से इजाद की गई एरोपोनिक तकनीक इस्तेमाल की जा रही है।
मांग का 10 फीसदी बीज ही उपलब्ध
परंपरागत तकनीक से सीपीआरआई मौजूदा समय में देश की मांग का 10 फीसदी बीज ही उपलब्ध करवा पा रहा है। एरोपोनिक तकनीक इससे कई गुना अधिक बीज उत्पादन करने में सक्षम है। एरोपोनिक तकनीक में नियंत्रित तरीके से पॉलीहाउस के भीतर आलू बीज उत्पादन होता है। सबसे बेहतर टिशू कल्चर (कंद) या पौधा लगाया जाता है, उससे पहले साल में मिनी ट्यूबर बनाए जाते हैं। मिनी टयूबर को दो से तीन जनरेशन आगे बढ़ाकर खेतों में लगाकर संख्या बढ़ाई जाती है और इसके बाद किसानों को फसल लगाने के लिए उपलब्ध करवाया जाता है।
आलू बीज की गुणवत्ता सुनिश्चित होगी
सीड प्लॉट तकनीक की मदद से आलू बीज की गुणवत्ता सुनिश्चित की जाती है। आलू बीज उत्पादन की सामान्य तकनीक में पहले साल में एक टिशू कल्चर या एक पौधे से 6 से 8 आलू बनते हैं, जबकि एरोपोनिक तकनीक में पौधे की जड़ें हवा में लटकी होती हैं और बहुत छोटे आकार पर ही बीज आलू को तोड़ लिया जाता है, इसलिए एक पौधे से 50 से 70 मिनी टयूबर (छोटे बीज आलू) मिल जाते हैं।
क्या है एरोपोनिक तकनीक
एरोपोनिक्स मिट्टी के बिना पौधे उगाने की एक तकनीक है। इसमें पौधों की जड़ों को हवा में लटकाकर, उन पर पोषक तत्वों या पानी का छिड़काव किया जाता है। इससे पौधों को जरूरी पोषक तत्व हवा और पानी से मिलते हैं और वह प्राकृतिक रूप से विकसित हो पाते हैं।