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Hindi News ›   Himachal Pradesh ›   Political journey of Pandit Sukhram: Contested elections for the first time in 1963, was out of the race for the post of CM in 1993

पंडित सुखराम का सियासी सफरनामा: 1963 से 1984 तक किया मंडी सीट का प्रतिनिधित्व

Thu, 12 May 2022 10:33 AM IST
Krishan Singh संवाद न्यूज एजेंसी, मंडी
संवाद न्यूज एजेंसी, मंडी Published by: Krishan Singh Updated Thu, 12 May 2022 10:33 AM IST
सार

1984 के बाद पंडित सुखराम हिमाचल की राजनीति में दमदार उपस्थिति करवाते हुए मंडी जिले से मुख्यमंत्री पद की दावेदारी जताते रहे। उनका यह सपना कभी पूरा नहीं हुआ।

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Political journey of Pandit Sukhram: Contested elections for the first time in 1963, was out of the race for the post of CM in 1993
पूर्व पीएम इंदिरा गांधी के साथ पंडित सुखराम। - फोटो : संवाद

विस्तार

दिवंगत पंडित सुखराम ने 1963 में हिमाचल प्रदेश प्रादेशिक परिषद के लिए आजाद प्रत्याशी के रूप में चुनाव लड़ा और स्वतंत्रता सेनानी सिंध के गांधी के नाम से मशहूर कांग्रेस प्रत्याशी स्वामी कृष्णा नंद को हराया। इसके बाग कांग्रेस में शामिल होकर वर्ष 1984 तक मंडी विधानसभा सीट का प्रतिनिधित्व किया। इस दौरान प्रदेश सरकार के कई महत्वपूर्ण मंत्रालय जिसमें लोक निर्माण, कृषि और पशुपालन शामिल इनके पास रहे। 1984 में उन्होंने सभा की और राजीव गांधी सरकार में एक कनिष्ठ(पद में छोटा) मंत्री के रूप में कार्य किया। उन्होंने रक्षा उत्पादन और आपूर्ति, योजना और खाद्य और नागरिक आपूर्ति राज्य मंत्री के रूप में कार्य किया। 

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1993 में मुख्यमंत्री पद की दौड़ से हुए थे बाहर
1984 के बाद पंडित सुखराम हिमाचल की राजनीति में दमदार उपस्थिति करवाते हुए मंडी जिले से मुख्यमंत्री पद की दावेदारी जताते रहे। उनका यह सपना कभी पूरा नहीं हुआ। प्रदेश के पहले मुख्यमंत्री डा. यशवंत सिंह परमार के करीबी रहे और मंडी से पहले मुख्यमंत्री पद के दावेदार ठाकुर कर्म सिंह के विरोध में खड़े हो गए। चौधरी पीरू राम ,गौरी प्रसाद के अलावा रंगीला राम राव और कौल सिंह के विरोध के चलते सुखराम मुख्यमंत्री पद की दौड़ से बाहर होते चले गए।  वर्ष 1993 में तो 22 विधायकों के समर्थन के बावजूद मंडी से समर्थन न मिल पाने की वजह से पं. सुखराम मुख्यमंत्री की दौड़ से बाहर हो गए।
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बनाई हिविकां और सबसे अधिक वोटों से जीते
प्रधानमंत्री पीवी नरसिम्हा सरकार में सुखराम ने 1993 से 1996 तक केंद्रीय राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) संचार विभाग संभाला, लेकिन दूरसंचार घोटाले के बाद दोनों को कांग्रेस पार्टी से निष्कासित कर दिया गया। निष्कासित होने के बाद पंडित सुखराम ने हिमाचल विकास कांग्रेस का गठन किया। 1998 में हिमाचल प्रदेश भाजपा के साथ चुनाव के बाद गठबंधन किया और सरकार में शामिल हो गए। रोचक किस्सा यह है कि सुखराम ने 1998 में मंडी सदर से विधानसभा क्षेत्र से हिविकां के टिकट पर चुनाव लड़ा और 22,000 से अधिक मतों के भारी अंतर से जीत हासिल की जो उस समय प्रदेश में जीत का सबसे ज्यादा अंतर था।
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2004 में कांग्रेस में हुए शामिल, 2017 में थामी भाजपा
2004 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस में शामिल हो गए और अपनी पार्टी का विलय भी कांग्रेस में कर दिया। 2017 में चुनाव से पहले वीरभद्र सिंह से अनबन के चलते सुखराम राम अपने पोते आश्रय शर्मा के साथ भाजपा में शामिल हो गए। इस चुनाव में भाजपा ने मंडी जिले की 10 में से 9 सीटों पर जीत हासिल की और एक सीट यानी जोगिंद्रनगर को निर्दलीय प्रत्याशी ने जीत लिया।


2019 में फिर कांग्रेस में लौटे
2019 में पोते की राजनीतिक महत्वाकांक्षा के चलते सुखराम पोते आश्रय शर्मा के साथ कांग्रेस में लौट आए। यहीं से उनके राजनीतिक पतन का दौर भी शुरू हो गया। आश्रय शर्मा मोदी लहर में चार लाख से भी अधिक मतों से पराजित हो गया और उनके बेटे अनिल शर्मा को मंत्री पद छोडना पड़ा।

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