फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Himachal Pradesh ›   Pandavas had spent time in this village during exile, many marks are present

Himachal: हिमाचल के इस गांव को कहा जाता है पांडव भूमि, पढ़ें रोचक जानकारी

Sun, 18 Sep 2022 05:26 PM IST
Krishan Singh संवाद न्यूज एजेंसी , बिलासपुर
संवाद न्यूज एजेंसी , बिलासपुर Published by: Krishan Singh Updated Sun, 18 Sep 2022 05:26 PM IST
विज्ञापन
सार
 दंतकथाओं के अनुसार महाभारत काल के दौरान पांडवों की ओर से अज्ञातवास हिमाचल प्रदेश के अलग-अलग क्षेत्रों में काटा गया। 
loader
Pandavas had spent time in this village during exile, many marks are present
पांडव भूमि, - फोटो : संवाद

विस्तार

देव भूमि हिमाचल में जगह-जगह ऐसे अनेक स्थान मिल जाएंगे, जिनका इतिहास आज भी गुमनाम है। ऐसा ही एक गांव बिलासपुर की सदर विधानसभा क्षेत्र का पंजगाईं है। दंतकथाओं के अनुसार महाभारत काल के दौरान पांडवों की ओर से अज्ञातवास हिमाचल प्रदेश के अलग-अलग क्षेत्रों में काटा गया। बिलासपुर जिले का पंजगाईं गांव उन्हीं क्षेत्रों में से एक है। इस गांव को पांडव भूमि भी कहा जाता है। उल्लेखनीय है कि पांच गांव से जोड़कर बनने वाले एक गांव को पंजगाईं का नाम दिया गया है। स्थानीय भाषा में पांच ग्राईं का अर्थ होता है पांच गांव, ऐसा प्रतीत होता है कि महाभारत काल में पांच गांव को जोड़कर एक गांव बनाया गया था जिसका नाम था पांच ग्राईं, लेकिन वर्तमान में गांव का नाम पंजगाईं पड़ा।



क्या है ग्राम पंजगाईं नाम का इतिहास
ग्राम पंचायत पंजगाईं के टिक्करी गांव में पांडवों के नाम से पांच पानी की  बावड़ियां बनी हुई हैं। दंतकथाओं के अनुसार यहां बने शिव मंदिर के शिवलिंग को पांडवों ने स्थापित किया था। बताया जाता है कि इस स्थान पर पहले जंगल ही होता था। यहां सिर्फ एक शिवलिंग और पांच बावड़ी थीं। लेकिन बाद में एक महिला ने इस शिवलिंग पर मंदिर बनवाया। पांडवों ने इस शिवलिंग को वनवास के समय स्थापित किया था।


दो साधुओं ने की थी शिवलिंग ले जाने की कोशिश
क्षेत्र के इतिहास के जानकार दौलत राम ने बताया कि उनके बुजुर्ग बताते थे कि मंदिर में स्थापित शिवलिंग को दो साधुओं ने यहां से ले जाने की कोशिश की थी। लेकिन वे सफल नहीं हो पाए। यहां तक कि उन्होंने इस पर चोट भी की, लेकिन शिवलिंग जमीन के अंदर और धंस गया।
 
नहीं सुलझा आज तक गुफा का रहस्य
अज्ञातवास के नियमानुसार यदि पांडवों को उस एक साल के दौरान कोई ढूंढ लेता तो उन्हें फिर से 12 वर्ष का वनवास और एक वर्ष का अज्ञातवास भोगना पड़ता। इसलिए पांडव अधिकतर रास्ता सुनसान मार्गों और गुफाओं से तय करते थे। पंजगाईं के कुनणु गांव में भी एक ऐसी ही गुफा है जिसका मुख्य द्वार तो है, लेकिन उसका अंत कहां होता है इसका किसी को कोई पता नहीं। जानकारी के अनुसार भूस्खलन की वजह से गुफा आधे रास्ते में बंद हो गई है। गुफा के मुख्यद्वार के पत्थरों पर कुछ ऐसे चित्र उभरे हुए हैं जिन्हें कहा जाता है कि यह पांडवों के हाथ और गायों के पैरों के निशान हैं। यह निशान देखने में सामान्य इंसानों के हाथ की छाप से काफी बड़े हैं। कई साल पहले तक लोग इस गुफा के अंदर दीपक लेकर जाते थे।

गुफा के बीच रास्ते में है बड़ी शिला
दंतकथाओं के अनुसार कुनणु गांव की गुफा के बीच रास्ते में बड़ी शिला है। पुराने समय में लोग दीपक लेकर जब गुफा के अंदर जाते थे तो इस शिला में कान लगाकर सुनते थे। जब कान लगाते थे तो दूसरी तरफ से पानी की आवाज आती थी। बताया जाता है कि पांडवों ने जब वनवास के लिए इस क्षेत्र को चुना तो वहां मात्र जंगल था।
 
पांडवों ने बनाना था यहां पर हरिद्वार
दंतकथाओं के अनुसार पांडवों ने इस स्थल पर हरिद्वार कुंड बनाना था। इसके लिए ही कुनणु में गुफा का निर्माण भी किया गया था। बताया जाता है कि यह गुफा सीधे सतलुज को पंजगाईं से जोड़ती है। कहा जाता है कि यहां पर हरिद्वार बनाने की शर्त यह थी कि रात में ही इस पूरे तालाब को सतलुज के पानी से भरना था। लेकिन जैसे ही तालाब तैयार हुआ, वैसे ही दूर किसी गुजरी की मधानी की आवाज हुई, इस आवाज को सुनकर पांडवों को लगा कि सुबह हो गई और वो इस कार्य को अधूरा छोड़कर वहां से निकल गए। बताया जाता है कि भौगोलिक दृष्टि से आज भी पंजगाई एक कुंड की तरह है। यहां से पानी की निकासी के लिए विष्णु गांव की तरफ से एकमात्र रास्ता है।

सरकार की उपेक्षा का शिकार पांडव भूमि पंजगाईं
प्रदेश में हमारी संस्कृति और धरोहरों को संजोये रखने के लिए बाकायदा एक विभाग बना हुआ है लेकिन इस गांव तक भाषा एवं संस्कृति विभाग का अभी तक कोई अधिकारी नहीं पहुंचा है। आजादी के 73 वर्ष बीतने पर भी इस गुफा का कोई पता नहीं लगा पाए हैं। यह गुफा कहां जाती है और इसका रहस्य क्या है कोई जान नहीं पाया है। यह स्थान पर्यटन की दृष्टि से विकसित हो सकता है।  इससे न केवल इस गांव का जीर्णोद्धार होगा बल्कि प्रदेश सरकार को राजस्व में भी खासा लाभ होगा। पौराणिक शिवलिंग की कार्बन डेटिंग के लिए भाषा एवं संस्कृति विभाग को कई आवेदन किए, लेकिन अभी तक कोई कार्रवाई नहीं हुई।

विभाग पौराणिक धरोहरों को संजोने के लिए प्रयासरत
विभाग इस तरह की ऐतिहासिक धरोहरों को संजोने के लिए प्रयासरत है।  स्थानीय लोग और मंदिर कमेटी के सदस्य पटवारी से फॉर्म लेकर इतिहास की जानकारी भरें। शिवलिंग और गुफा के फोटोग्राफ साथ लगाएं और विभाग में जमा करवाएं। इसके बाद विभाग की तरफ से आगामी कार्रवाई की जाएगी।-रेवती सैनी, जिला अधिकारी भाषा एवं संस्कृति विभाग

विज्ञापन
विज्ञापन

रहें हर खबर से अपडेट, डाउनलोड करें Android Hindi News App, iOS Hindi News App और Amarujala Hindi News APP अपने मोबाइल पे|
Get all India News in Hindi related to live update of politics, sports, entertainment, technology and education etc. Stay updated with us for all breaking news from India News and more news in Hindi.

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

Next Article

Followed