यहां सबूत नहीं, बकरे की मौत तय करती है सजा
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शायद आपको भी यकीन नहीं होगा मगर ये सच है। भारत में एक गांव ऐसा भी है जहां आज भी देश का कानून नहीं माना जाता। संविधान का कोई भी कानून व नियम यहां के लोग नहीं मानते। यहां लोग खुद को सिकंदर के वंशज बताते हैं और अपना कानून खुद बनाते हैं।
यह गांव हिमाचल के जिला कुल्लू में स्थित मलाणा है। एक बार तो इस बात पर भरोसा नहीं होता, पर यहां के लोग अपने आपको सिकंदर के सैनिकों का ही वंशज मानते हैं। इसका इनके पास सबूत भी है।
लोग मलाणा के जमलू देवता के मंदिर के बाहर लकड़ी की दीवारों पर की गई नक्काशी दिखाते हैं। इस नक्काशी में युद्ध करते सैनिकों को एक विशेष तरह की वेश-भूषा के साथ हथियारों के साथ दिखाया दिखाया गया है।
देवता करते हैं फैसला
इस गांव की खास बात तो यह है कि भारत का हिस्सा होने के बाद भी यहां के लोगों को भारतीय कानून से कोई वास्ता नहीं है। यहां पर फैसले लेने और उसका पालन कराने की अलग परंपरा है।
किसी भी अपराध की सजा यहां के लोग खुद तय करते हैं। यदि यहां भी बात नहीं बनी तो फैसला यहां के जमलू देवता करते हैं। यहां का खान पान भी थोड़ा हटकर है।
देश आज भले ही तरक्की कर रहा हो मगर हिमाचल का ये गांव न तो तकनीक को इस गांव में आने की अनुमति देता है और न ही ऐसा कानून लागू होने देता है जो यहां के लोगों को पसंद न हो।
देवता ऐसे देते हैं अपना फैसला
जमलू देवता के फैसला सुनाए जाने का तरीका भी बड़ा अजीब है। यहां दोनों पक्षों से एक-एक बकरा मंगाया जाता है। इसके बाद दोनों बकरों की टांग चीरकर उसमें निर्धारित मात्रा में जहर भरा जाता है।
जिस पक्ष का भी बकरा पहले मर जाता है उसे दोषी मान लिया जाता है। इसके बाद उस पक्ष को सजा भुगतनी पड़ती है। बकरा मरने के बाद, इसको देवता का फैसला माना जाता है। देवता के इस फैसले को कोई चुनौती नहीं दे सकता।
अगर किसी ने इस देवता के फैसले को चुनौती देने की कोशिश भी की तो उसे समाज से बाहर निकाल दिया जाता है। देवता के फैसले के समय बकरों को चीरने और जहर भरने का काम चार लोग करते हैं। इन्हे कठियाला कहा जाता है।
गांव की ये है रोचक बातें
कहा जाता है कि गांव के अंदर प्रवेश करने पर बाहरी लोग यहां की कोई भी वस्तु नहीं छू सकते। बाहरी लोगों को यहां के बनाए रास्तों पर ही चलना पड़ता है। बिना अनुमति कोई चीज छूने पर जुर्माना लगता है।
गांव के लोग बाहरी लोगों को अपने से निम्न मानते हैं। ये कभी बाहरी लोगों के हाथों से बनाया खाना नहीं खाते। यदि बाहरी आदमी ने गांव की कोई चीज छू ली है तो उसे फिर बलि देकर ही शुद्घ किया जाता है।
यहां के लोग मेहनती और सीधे साधे भी है। चरस की खेती बड़े पैमाने पर होती है और यही काला सोना कहलाती है।
सबसे पुरानी लोकतांत्रिक व्यवस्था
हिमाचल प्रदेश के कुल्लू जिले के मलाणा में विश्व की सबसे पुरानी लोकतांत्रिक व्यवस्था अभी भी चल रही है। भारत का अंग होते हुए भी मलाणा की अपनी एक अलग न्याय और कार्यपालिका है। संविधान के कानून यहां नहीं चलते।
इस गांव की अपनी अलग संसद है, जिसके दो सदन हैं पहली ज्येष्ठांग (ऊपरी सदन) और कनिष्ठांग (निचला सदन)। ज्येष्ठांग में कुल 11 सदस्य हैं। जिनमें तीन सदस्य कारदार, गुर व पुजारी स्थायी सदस्य होते हैं।
शेष आठ सदस्यों को गांववासी मतदान द्वारा चुनते हैं। इसी तरह कनिष्ठांग सदन में गांव के प्रत्येक घर से एक सदस्य को प्रतिनिधित्व दिया जाता है। यह सदस्य घर का सबसे बुजुर्ग व्यक्ति होता है। अगर ज्येष्ठांग सदन के किसी सदस्य की मृत्यु हो जाये तो पूरे ज्येष्ठांग सदन को पुनर्गठित किया जाता है।
खुद लेते हैं बड़े फैसले
इस संसद में घरेलु झगडे, जमीन-जायदाद के विवाद, हत्या, चोरी और बलात्कार जैसे मामलों पर सुनवाई होती है। सबूत मिलने पर दोषी को सजा सुनाई जाती है। संसद भवन के रूप में यहां एक ऐतिहासिक चौपाल है जिसके ऊपर ज्येष्ठांग सदन के 11 सदस्य और नीचे कनिष्ठांग सदन के सदस्य बैठते हैं।
अगर संसद किसी विवाद का निपटारा करने में विफल रहती है तो मामला स्थानीय देवता जमलू के सुपुर्द कर दिया जाता है और इस मामले में देवता का निर्णय माना जाता है।
इस संसद में घरेलु झगडे, जमीन-जायदाद के विवाद, हत्या, चोरी और बलात्कार जैसे मामलों पर सुनवाई होती है। दोषी को सजा सुनाई जाती है।
ग्रीक की बोली बोलते हैं लोग
अपने आपको सिकंदर के सैनिकों का वंशज होने का दावा करने वाले यहां के लोगों की भाषा भी हिमाचल में बोली जाने वाली भाषा से बहुत अलग है। कहा जाता है कि मलाणा के लोग जो भाषा बोलते हैं वह ग्रीक में बोली जाने वाली भाषा से काफी हद तक मेल खाती है।
यहां के लोगों की शक्ल-सूरत भी ग्रीक देश के लोगों की तरह ही है। इस बात को कम ही लोग जानते हैं कि विश्व में सबसे अच्छा चरस हिमाचल की मलाणा की पार्वती घाटी में तैयार होता है।
यहां चरस को काला सोना कहा जाता है। इस इलाके की खास बात यह है कि चरस के अलावा दूसरी फसल नहीं होती।