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Shimla Rail Track: एक चरवाहा जिसके योगदान से पूरा हुआ कालका शिमला रेलवे ट्रैक, अंग्रेज भी थे कायल
Thu, 29 Sep 2022 05:58 PM IST
अरविन्द ठाकुर
अमर उजाला ब्यूरो, शिमला
अमर उजाला ब्यूरो, शिमला
Published by: अरविन्द ठाकुर
Updated Thu, 29 Sep 2022 05:58 PM IST
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बाबा भलकू की प्रतिमा।
- फोटो :
अमर उजाला
विस्तार
अंग्रेजों ने एक चरवाहे की मदद से कालका से ट्रेन शिमला पहुंचाई थी। कालका से शिमला की ओर रेलवे ट्रैक बिछाते हुए टनल नंबर 33 के दोनों छोर आपस में नहीं मिल पा रहे थे। बड़ी चट्टान बीच में आने के कारण ट्रैक बिछाने की लागत में भारी इजाफा हो गया था। ब्रिटिश इंजीनियर जब पूरी तरह फेल हो गए तो एक समय में अंग्रेज शिमला तक ट्रैक बिछाने का काम बीच में ही छोड़ने का फैसला लेने को मजबूर हो गए थे।
इस बीच एक चरवाहे की मदद से रेलवे ट्रैक शिमला पहुंचाया गया। रेलवे ट्रैक को बनाते हुए टनल नंबर 33 के छोर आपस में न मिलने पर ब्रिटिश हुकूमत ने अपने एक अंग्रेज इंजीनियर को एक रुपये जुर्माना लगाया था। इंजीनियर को इस पर इतनी शर्मिंदगी महसूस हुई की उसने खुदकुशी कर ली। 33 नंबर टनल के छोर आपस में मिलने में इंजीनियर बरोग असफल हुए थे।
इसके बाद एक साधारण चरवाहे बाबा भलकू ने अपनी छड़ी से राह दिखाई तब जा कर टनल के छोर आपस में मिले। बाद में इंजीनियर बरोग के नाम पर इस टनल का नाम ही बड़ोग टनल पड़ गया। यह टनल कालका-शिमला रेलवे की सबसे लंबी टनल है और इसकी लंबाई 1143.61 मीटर है। कालका-शिमला रेलवे मार्ग के अलावा हिंदुस्तान-तिब्बत मार्ग के निर्माण में भी बाबा भलखू की अहम भूमिका रही थी।
बाकायदा इसकी पुष्टि अंग्रेजी हुकूमत के दौरान लिखे गए दस्तावेजों में मौजूद है। अंग्रेज अधिकारी सी. बैचलर और जेजी क्लार्सन ने भी अपनी किताबों में बाबा भलखू के योगदान का जिक्र किया है। शिमला में पुराने बस अड्डे के पास रेलवे के संग्रहालय के बाहर बाबा भलकू की प्रतिमा लगाई गई है। संग्रहालय को भी बाबा भलकू रेल संग्रहालय का नाम दिया गया है।