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वैज्ञानिकों का दावा: आगामी 100 साल तक कमजोर रह सकता है भारत में मानसून

Fri, 09 Aug 2019 12:58 PM IST
अरविन्द ठाकुर न्यूज डेस्क, अमर उजाला, मंडी
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, मंडी Published by: अरविन्द ठाकुर Updated Fri, 09 Aug 2019 12:58 PM IST
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IIT mandi scientist Prediction in research for monsoon will weak in next hundred years in india
- फोटो : अमर उजाला

आने वाले 100 वर्षों में भारतीय ग्रीष्मकालीन मानसून कमजोर रहेगा। भारत के चालीस फीसदी हिस्से में कमजोर मानसून का प्रभाव अधिक रहेगा। विशेष रूप से वर्ष 2100 तक भारत के दक्षिण-पश्चिम तटीय, उत्तरी और उत्तरपूर्वी-मध्य भागों पर त्रिवार्षिक मानसून के कमजोर चक्र का गंभीर प्रभाव दिखेगा। स्कूल ऑफ बेसिक साइंसेज की असिस्टेंट प्रो. डॉ. सरिता आजाद और रिसर्च स्कालर प्रवात जेना, सौरभ गर्ग और निखिल राघा ने अपने एक शोध में यह दावा किया है। उन्होंने ग्रीष्मकालीन भारतीय मानसून से बारिश की पीरियडीसीटी में आए परिवर्तनों का अध्ययन किया और इस डाटा के आधार पर भावी काल चक्र का पूर्वानुमान बताया।

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यह शोध प्रसिद्ध अमेरिकी जियोफिजिकल यूनियन (एजीयू) पीयर-रिव्यू इंटरनेशनल जर्नल अर्थ एंड स्पेस साइंस में प्रकाशित किया जा चुका है। डॉ. सरिता के मुताबिक ग्रीष्मकालीन भारतीय मानसून से बारिश (आईएसएम) के आंकड़ों को प्रोसेस करने के लिए एल्गोरिद्म का शोध किया है। इसके तहत एल नीनो सदर्न ऑसिलेशन जैसे वैश्विक जलवायु परिघटनाओं के बारे में जानकारी हासिल हो सकेगी। इससे मजबूत और कमजोर मानसून वर्षों की पीरियडीसीटी (काल चक्र) का पता चलेगा।

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सरकार को भावी नीति तैयार करने की जरूरत

वैज्ञानिकों ने दावा किया है कि सरकार भविष्य को ध्यान में रखकर आगामी नीतियां तैयार कर सकती है। त्रिवार्षिक उतार-चढ़ाव (ट्रायनियल ऑसिलेशन) के परिवर्तनों के प्रमाण का नीति निर्माता, किसान, जल प्रबंधक आदि उपयोग कर पाएंगे। कृषि प्रधान देश होने के नाते भारत के लिए कमजोर और जोरदार मानसून का कृषि पैदावार और अर्थव्यवस्था पर बुरा असर पड़ता है। इसलिए यह जरूरी है कि पैटर्न और परिवर्तन की गहरी समझ विकसित कर बेहतर योजना और प्रबंधन करें। 

वर्तमान में यह है चुनौती
ग्रीष्मकालीन भारतीय मानसून भारत की जीवन रेखा है। हवा के सालाना चक्र के साथ बारिश का मजबूत चक्र भी यह प्रदान करती है। लेकिन मानसून की सटीक भविष्यवाणी नहीं की जा सकती है। हालांकि यह स्थायी परिघटना है जो हर वर्ष तय समय पर होती है। पर इससे सालाना बारिश थोड़े समय के लिए कम-ज्यादा होती है और इसके बारे में पूर्वानुमान कठिन रहा है। यह भारत के बड़ी चुनौती है।

इस तरह किया शोध
टीम ने 1901 से 2005 के दौरान 1260 महीनों के बारिश के डाटा का इस्तेमाल कर ट्रायनियल ऑसिलेशन के स्पेशियल डिस्ट्रिब्यूशन का परीक्षण किया। तय डाटा का अवलोकन कर उसके पावर स्पेक्ट्रम का विश्लेषण किया गया। भारत के 354 से अधिक ग्रिड के आधे से अधिक हिस्से में 95 प्रतिशत के साथ 2.85 वर्ष की पीरियडिसीटी (काल चक्र) थी। वहीं रिसर्च टीम ने डेटा का एक सहयोगी फ्रेमवर्क-आधारित साइम्युलेशन, जिसे कपल्ड मॉडल इंटरकंपैरिजन प्रोजेक्ट (सीएमआईपी) कहा जाता है, में आकलन किया है। आकलनों से पता चला कि यह उतार-चढ़ाव (ऑसिलेशन) वर्ष 2100 तक कमजोर होगा।

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