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Shimla News: सेना के साथ विशेष तकनीक और साइबर सुरक्षा पर शोध करेगा एचपीयू
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हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय को दस करोड़ की शोध परियोजना मंजूर, ऊंचाई वाले क्षेत्रों में तैनात जवानों के लिए बनेगी विशेष सामग्री
रडार और विकिरण सुरक्षा से जुड़े विषयों पर होगा शोध
संवाद न्यूज एजेंसी
शिमला। हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय शिमला ने रक्षा क्षेत्र से जुड़े अनुसंधान को लेकर अपनी नई दिशा तय कर ली है। भारतीय सेना के आर्मी ट्रेनिंग कमांड (एआरटीआरैक) शिमला के साथ हुए समझौते के बाद विश्वविद्यालय अब सेना की जरूरतों से जुड़े तकनीकी विषयों पर शोध करेगा।
इस सहयोग के तहत उच्च हिमालयी क्षेत्रों में उपयोग होने वाली विशेष तकनीक, साइबर सुरक्षा और रक्षा से जुड़े अन्य क्षेत्रों को शोध के केंद्र में रखा है।एआरटीआरैक के साथ सहयोग के तहत साइबर क्षेत्र में उद्योगों के साथ मिलकर करीब 10 करोड़ रुपये के अनुसंधान कार्य की योजना बनाई है। इसका उद्देश्य रक्षा क्षेत्र में तकनीकी चुनौतियों के समाधान के लिए नई प्रणालियों और तकनीकों पर काम करना है। विवि के वैज्ञानिक और शोधकर्ता सेना की आवश्यकताओं के अनुरूप अनुसंधान परियोजनाओं को आगे बढ़ाएंगे।
विश्वविद्यालय को एआरटीआरैक सहयोग के तहत उच्च हिमालयी विशेष सामग्री प्रौद्योगिकी से जुड़ी करीब 10 करोड़ रुपये की परियोजना भी प्राप्त हुई है। परियोजना में ऊंचाई वाले क्षेत्रों में तैनात जवानों के लिए उपयोगी विशेष सामग्री विकसित करने पर शोध किया जाएगा। हिमालयी क्षेत्रों में सैन्य तैनाती के दौरान अत्यधिक ठंड, बर्फबारी, कम ऑक्सीजन और कठिन भौगोलिक परिस्थितियां बड़ी चुनौतियां होती हैं। ऐसे क्षेत्रों के लिए हल्की, मजबूत और लंबे समय तक उपयोग में आने वाली सामग्री की जरूरत होती है। परियोजना के तहत इन्हीं आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए तकनीकी समाधान तैयार करने पर काम किया जाएगा।
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रक्षा अनुसंधान के क्षेत्र में विश्वविद्यालय को डीआरडीओ से भी कई परियोजनाएं प्राप्त हुई हैं। न्यूक्लियर और रेडियोलॉजी क्षेत्र से जुड़ी परियोजनाओं के लिए विश्वविद्यालय को करीब 82 लाख, 87 लाख और 60 हजार रुपये की सहायता मिली है। इन परियोजनाओं में विकिरण सुरक्षा, परमाणु क्षेत्र से जुड़े जोखिम और संबंधित तकनीकी विषयों पर अनुसंधान किया जाएगा। एआरटीआरैक भारतीय सेना का प्रशिक्षण और सैन्य रणनीति से जुड़ा प्रमुख कमांड है। इसके साथ सहयोग के माध्यम से विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं को सेना की वास्तविक जरूरतों से जुड़े विषयों पर काम करने का अवसर मिलेगा। इससे रक्षा क्षेत्र में अकादमिक संस्थानों की भागीदारी बढ़ेगी।
शोध कार्यों में भागीदारी बढ़ाने पर जोर
कुलपति प्रो. महावीर सिंह ने बताया कि रक्षा अनुसंधान, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, डेटा विज्ञान, क्वांटम तकनीक और हरित ऊर्जा जैसे क्षेत्रों में शोध को बढ़ावा दिया जा रहा है। विभागों को आपसी सहयोग के साथ राष्ट्रीय महत्व के शोध कार्यों में भागीदारी बढ़ाने पर जोर दिया। एचपीयू और एआरटीआरैक का यह सहयोग विवि के शोध को सीधे रक्षा जरूरतों से जोड़ रहा है। अब विवि की प्रयोगशालाओं में होने वाला अनुसंधान सेना के सामने आने वाली तकनीकी चुनौतियों के समाधान की दिशा में उपयोग किया जाएगा।
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रडार और विकिरण सुरक्षा से जुड़े विषयों पर होगा शोध
संवाद न्यूज एजेंसी
शिमला। हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय शिमला ने रक्षा क्षेत्र से जुड़े अनुसंधान को लेकर अपनी नई दिशा तय कर ली है। भारतीय सेना के आर्मी ट्रेनिंग कमांड (एआरटीआरैक) शिमला के साथ हुए समझौते के बाद विश्वविद्यालय अब सेना की जरूरतों से जुड़े तकनीकी विषयों पर शोध करेगा।
इस सहयोग के तहत उच्च हिमालयी क्षेत्रों में उपयोग होने वाली विशेष तकनीक, साइबर सुरक्षा और रक्षा से जुड़े अन्य क्षेत्रों को शोध के केंद्र में रखा है।एआरटीआरैक के साथ सहयोग के तहत साइबर क्षेत्र में उद्योगों के साथ मिलकर करीब 10 करोड़ रुपये के अनुसंधान कार्य की योजना बनाई है। इसका उद्देश्य रक्षा क्षेत्र में तकनीकी चुनौतियों के समाधान के लिए नई प्रणालियों और तकनीकों पर काम करना है। विवि के वैज्ञानिक और शोधकर्ता सेना की आवश्यकताओं के अनुरूप अनुसंधान परियोजनाओं को आगे बढ़ाएंगे।
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विश्वविद्यालय को एआरटीआरैक सहयोग के तहत उच्च हिमालयी विशेष सामग्री प्रौद्योगिकी से जुड़ी करीब 10 करोड़ रुपये की परियोजना भी प्राप्त हुई है। परियोजना में ऊंचाई वाले क्षेत्रों में तैनात जवानों के लिए उपयोगी विशेष सामग्री विकसित करने पर शोध किया जाएगा। हिमालयी क्षेत्रों में सैन्य तैनाती के दौरान अत्यधिक ठंड, बर्फबारी, कम ऑक्सीजन और कठिन भौगोलिक परिस्थितियां बड़ी चुनौतियां होती हैं। ऐसे क्षेत्रों के लिए हल्की, मजबूत और लंबे समय तक उपयोग में आने वाली सामग्री की जरूरत होती है। परियोजना के तहत इन्हीं आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए तकनीकी समाधान तैयार करने पर काम किया जाएगा।
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रक्षा अनुसंधान के क्षेत्र में विश्वविद्यालय को डीआरडीओ से भी कई परियोजनाएं प्राप्त हुई हैं। न्यूक्लियर और रेडियोलॉजी क्षेत्र से जुड़ी परियोजनाओं के लिए विश्वविद्यालय को करीब 82 लाख, 87 लाख और 60 हजार रुपये की सहायता मिली है। इन परियोजनाओं में विकिरण सुरक्षा, परमाणु क्षेत्र से जुड़े जोखिम और संबंधित तकनीकी विषयों पर अनुसंधान किया जाएगा। एआरटीआरैक भारतीय सेना का प्रशिक्षण और सैन्य रणनीति से जुड़ा प्रमुख कमांड है। इसके साथ सहयोग के माध्यम से विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं को सेना की वास्तविक जरूरतों से जुड़े विषयों पर काम करने का अवसर मिलेगा। इससे रक्षा क्षेत्र में अकादमिक संस्थानों की भागीदारी बढ़ेगी।
शोध कार्यों में भागीदारी बढ़ाने पर जोर
कुलपति प्रो. महावीर सिंह ने बताया कि रक्षा अनुसंधान, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, डेटा विज्ञान, क्वांटम तकनीक और हरित ऊर्जा जैसे क्षेत्रों में शोध को बढ़ावा दिया जा रहा है। विभागों को आपसी सहयोग के साथ राष्ट्रीय महत्व के शोध कार्यों में भागीदारी बढ़ाने पर जोर दिया। एचपीयू और एआरटीआरैक का यह सहयोग विवि के शोध को सीधे रक्षा जरूरतों से जोड़ रहा है। अब विवि की प्रयोगशालाओं में होने वाला अनुसंधान सेना के सामने आने वाली तकनीकी चुनौतियों के समाधान की दिशा में उपयोग किया जाएगा।