HP High Court: डॉक्टर की राय जानना सूचना के अधिकार से बाहर, घटिया दवाइयों के मामले में सरकार से मांगा जवाब
प्रदेश हाईकोर्ट ने सूचना के अधिकार अधिनियम के तहत अहम निर्णय सुनाया है। अदालत ने कहा कि किसी व्यक्ति की राय जानना और विभाग से जानकारी लेना दोनों ही अलग- अलग है।
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हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने सूचना के अधिकार अधिनियम के तहत अहम निर्णय सुनाया है। अदालत ने कहा कि किसी व्यक्ति की राय जानना और विभाग से जानकारी लेना दोनों ही अलग- अलग है। अदालत ने स्पष्ट किया कि डॉक्टर की राय जानना सूचना के अधिकार के दायरे से बाहर है। मुख्य न्यायाधीश एमएस रामचंद्र राव और न्यायाधीश अजय मोहन गोयल की खंडपीठ ने राज्य सूचना आयोग के निर्णय को खारिज कर दिया। राज्य सूचना आयोग ने याचिकाकर्ता डॉक्टर सुखजीत सिंह को राय न देने पर 15000 रुपये का जुर्माना लगाया था। इसके अलावा सूचना देने के साथ-साथ आयोग ने तीन हजार रुपये मुआवजा देने के आदेश दिए थे। 7 दिसंबर 2018 को सोम दत्त ने सूचना के अधिकार अधिनियम के तहत डॉक्टर की राय मांगी थी। सोम दत्त ने अपने लड़के की बीमारी का कारण पूछा था।
याचिकाकर्ता डॉक्टर से पूछा गया था कि क्या उसके लड़के की बीमारी कम सोने के कारण है या नहीं। जन सूचना अधिकारी के जवाब से असंतुष्ट होकर अपील के माध्यम से चुनौती दी गई। अपीलीय अधिकारी ने याचिकाकर्ता को बिना सुने ही अपील का निपटारा कर दिया। इसके खिलाफ याचिकाकर्ता और सोमदत्त ने राज्य सूचना आयोग के समक्ष चुनौती दी। राज्य सूचना आयोग ने सोमदत्त की अपील को स्वीकार करते हुए सूचना देने के आदेशों के साथ ही याचिकाकर्ता को जुर्माना लगाया था। राज्य सूचना आयोग के इस निर्णय को हाईकोर्ट के समक्ष चुनौती दी गई।अदालत के समक्ष दलील दी गई कि राज्य सूचना आयोग ने अपना फैसला बिना सोचे समझे दिया है। यह निर्णय सूचना के अधिकार अधिनियम के प्रावधानों के विपरीत है। दलील दी गई थी कि डॉक्टर को किसी बीमारी के कारणों पर अपनी राय देने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता है। राय देना सूचना के अधिकार अधिनियम के क्षेत्राधिकार से बाहर है। अदालत ने याचिकाकर्ता की दलीलों से सहमति जताते हुए राज्य सूचना आयोग के निर्णय को निरस्त कर दिया। ब्यूरो
घटिया दवाइयों के उत्पादन मामले में सरकार को जवाब दायर करने के आदेश
हाईकोर्ट ने घटिया दवाइयों के उत्पादन और इसके लिए प्रयोगशाला न होने के मामलों की सुनवाई एक साथ निर्धारित की है। अदालत ने घटिया दवाइयों के उत्पादन के मामले में सरकार को जवाब दायर करने के आदेश दिए हैं। अदालत को बताया गया कि परीक्षण के लिए प्रयोगशाला न होने से घटिया दवाइयों का उत्पादन हो रहा है। प्रयोगशाला न होने का अदालत ने पहले ही संज्ञान लिया है। बता दें कि घटिया दवाइयों के उत्पादन को लेकर दैनिक समाचार पत्रों में छपी खबर पर अदालत ने जनहित याचिका दर्ज की है। खबर में उजागर किया गया है कि राष्ट्रीय औषधि नियामक और केंद्रीय औषधि मानक नियंत्रण संगठन ने हिमाचल में निर्मित 12 दवा के नमूनों को घटिया घोषित किया है। एक नमूने को नकली पाया गया। नकली पाई जाने वालों में एक पशु चिकित्सा की दवा भी शामिल है।
हिमाचल से घटिया घोषित की गई दवाओं में एस्ट्राजोल इंजेक्शन, एस्ट्रीजोल टेबलेट, मिसोप्रोस्टोल टेबलेट, एमोक्सिसिलिन कैप्सूल, पैरासिटामोल ओरल सस्पेंशन, फिनाविव टेबलेट, पैंटोप्राजोल, डोमपेरिडोन कैप्सूल, रैंटिडिन हाइड्रोक्लोराइड टेबलेट और लेवोसेटिरिजिन और इबुप्रोफेन टेबलेट शामिल हैं। इसके अलावा सूबे में दवाइयों के परीक्षण प्रयोगशाला न होने पर भी अदालत ने जनहित याचिका दर्ज की है। वर्ष 2017 में सेंट्रल बैंक ने बद्दी में दवाइयों के परीक्षण के लिए प्रयोगशाला के निर्माण के लिए राशि स्वीकृत की थी। वर्ष 2014 में उद्योग विभाग की ओर से 3.50 करोड़ रुपये प्रयोगशाला के निर्माण के लिए खर्च किए गए है। लेकिन, अभी तक इसे चालू नहीं किया गया है। इसके अलावा केंद्र सरकार ने 12वीं पंच वर्षीय योजना के तहत 30 करोड़ रुपये की राशि जारी की थी। आरोप लगाया गया है कि दवाइयों के परीक्षण के लिए प्रयोगशाला न होने के कारण घटिया दवाइयों का उत्पादन किया जा रहा है।