अवमानना मामले में गैरहाजिर रहे अफसर, कोर्ट ने सुनाया कड़ा फरमान
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हाईकोर्ट ने अवमानना के एक मामले में प्रधान सचिव शिक्षा आरडी धीमान के अनुपस्थित रहने पर कड़ा संज्ञान लिया है। कोर्ट ने मुख्य सचिव को आदेश दिए कि वह सुनिश्चित करें कि अवमानना के आरोपों का सामना कर रहे सरकारी अधिकारी या कर्मचारी अदालत की अनुमति के बगैर पेशी वाले दिन प्रदेश से बाहर न जाएं।
मुख्य न्यायाधीश मंसूर अहमद मीर और न्यायाधीश तरलोक सिंह चौहान की खंडपीठ ने स्पष्ट किया कि इन आदेशों के उल्लंघन को गंभीरता से लिया जाएगा। प्रार्थी प्रतिभा कौशिक के अनुसार उसे शिक्षा विभाग ने कोर्ट केस जीतने के बावजूद पेंशन जारी नहीं की।
कोर्ट ने 24 सितंबर 2014 को आदेश दिए थे कि शिक्षा विभाग प्रार्थी को 9 फीसदी ब्याज सहित सेवानिवृत्ति संबंधी लाभ 8 सप्ताह के भीतर जारी करे। जब शिक्षा विभाग ने कोर्ट के आदेशों पर कोई अमल नहीं किया तो मजबूरन उसे अवमानना याचिका दायर करनी पड़ी।
कोर्ट ने पाया अफसरों के दौरों से याचिकाकर्ताओं को नहीं मिल रहा हक
कोर्ट ने इस याचिका पर फिर से विभाग को आदेश दिए की वह 6 सप्ताह के भीतर प्रार्थी के सेवा लाभ जारी करे। शिक्षा विभाग ने फिर से कोर्ट के आदेशों को ठेंगा दिखाते हुए प्रार्थी को कोई सेवा लाभ जारी नहीं किए। प्रार्थी को फिर से अवमानना याचिका दायर करनी पड़ी।
कोर्ट ने अवमानना याचिका की प्रारंभिक सुनवाई करते हुए प्रधान सचिव शिक्षा आरडी धीमान को कोर्ट में उपस्थित रहकर अपनी स्थिति स्पष्ट करने के आदेश दिए थे। प्रधान सचिव शिक्षा इन आदेशों को भी दरकिनार करते हुए राज्य से बाहर चले गए और कोर्ट से अनुपस्थित रहने की इज्जाजत लेनी भी उचित नहीं समझी।
मामले की सुनवाई के दौरान कोर्ट ने पाया कि अवमानना की पेशी के दौरान आरोपी अधिकारी या दिल्ली में पाए जाते हैं या किसी टूअर या ट्रेनिंग पर होते हैं। कोर्ट ने पाया कि अदालत के आदेशों के बावजूद याचिकाकर्ताओं को उनका हक समय पर नहीं मिल पा रहा। कोर्ट के आदेशों में कुछ अधिकारी व कर्मचारी बेवजह बाधक बने रहते हैं।
अवमानना मामले में मिलती है इतनी सजा
गौरतलब है की अवमानना मामलों में दोषी को अधिकतम 6 महीने की कैद अथवा माफी मांगने पर सजा से छूट का प्रावधान है। उल्लेखनीय है कि एक तरफ तो सरकार कानून के राज की स्थापना की बात करती है वहीं अधिकारी लोग स्वयं ही अदालतों के फैसले लागू न करने के लिए तरह-तरह के बहाने बनाते हैं। यही कारण है की याचिकाकर्ताओं को बार-बार याचिकाएं दायर कर कोर्ट का दरवाजा खटखटाना पड़ता है।
एचपीसीए से सुरक्षा खर्च वसूलने की याचिका खारिज
हाईकोर्ट ने धर्मशाला स्थित क्रिकेट स्टेडियम में मैच करवाने को लेकर सरकार द्वारा वहन किए गए सुरक्षा खर्च को एचपीसीए से वसूलने की मांग वाली याचिका को प्रार्थी जगदीश शर्मा की मृत्यु के कारण खारिज कर दिया है। मुख्य न्यायाधीश मंसूर अहमद मीर और न्यायाधीश संदीप शर्मा की खंडपीठ के समक्ष यह मामला सुनवाई के लिए लगा था।
प्रार्थी की ओर से पेश हो रहे अधिवक्ता ने कोर्ट को बताया कि प्रार्थी की मौत के कारण वह इस मामले की पैरवी जारी नहीं रख सकता। इसके बाद कोर्ट ने मामले को खारिज कर दिया। मामले के अनुसार एचपीसीए से धर्मशाला में क्रिकेट मैच करवाने के लिए सुरक्षा खर्च वसूलने की मांग उठाई गई थी।
सरकार ने मामले के लंबित होने के दौरान नीतिगत फैसला लिया था कि वह एचपीसीए से केवल व्यावसायिक मैचों के दौरान सुरक्षा खर्च को वसूल करेगी और अंतर्राष्ट्रीय मैचों को इस वसूली से अलग रखा जाएगा। सरकार ने आईपीएल जैसे मैचों को व्यावसायिक मैचों का दर्जा दिया है जिनके आयोजनों के लिए सुरक्षा खर्च एचपीसीए से वसूला जाता है।
बीबीएन के प्रदूषण मामले में एसडीएम नालागढ़ तलब
हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने सोलन जिले के बद्दी में कॉमन एफफ्लुएंट ट्रीटमेंट प्लांट की क्षमता से कम दोहन किए जाने के मामले में एसडीएम नालागढ़ को वीरवार को कोर्ट में व्यक्तिगत रूप से पेश रहने के आदेश दिए हैं। मुख्य न्यायाधीश मंसूर अहमद मीर और न्यायाधीश संदीप शर्मा की खंडपीठ ने जनहित याचिका की सुनवाई के दौरान यह आदेश पारित किए।