कोर्ट ने सरकार को लगाई फटकार, कहा-अवैध निर्माण नियमित करना गैर कानूनी
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हिमाचल हाईकोर्ट ने प्रदेश सरकार की ओर से अवैध भवन निर्माण को नियमित करने को गैर कानूनी ठहराते हुए आदेश दिए हैं कि अवैध निर्माण नियमित नहीं किए जाने चाहिए। कोर्ट ने कहा इस मामले में सरकारी तंत्र का रवैया शतर्मुर्ग जैसा है।
पहले अवैध निर्माण को देख सरकार आंखें बंद कर लेती हैं और बाद में उसे नियमित करने के नियम कानून बनाती है। इससे सरकारी मशीनरी की नाकामी सामने आती है। न्यायाधीश राजीव शर्मा और न्यायाधीश सुरेश्वर ठाकुर की खंडपीठ ने कहा है कि सरकार को न तो अवैध निर्माण को और न ही वन भूमि पर अवैध कब्जों को नियमित करना चाहिए।
हिमाचल हाईकोर्ट ने अमर उजाला के 20 अगस्त के अंक में ‘अवैध भवनों को वैध बनाने के इस अंधे कानून का क्या करें’ शीर्षक से प्रकाशित ‘सरोकार’ पर संज्ञान लेते हुए यह आदेश दिए।
हाईकोर्ट ने की यह टिप्पणी
हाईकोर्ट का कहना है कि हजारों हजार अवैध निर्माण रातोंरात नहीं होते। सरकार की मशीनरी मूक दर्शक बन कर लालची लोगों को ऐसे अवैध कार्य करने देती है। सरकारी मशीनरी पहले इन्हें अवैध कब्जे करने की छूट देती और फिर उन्हें नियमित करने का कानून बनाती है।
यह वास्तव में संवैधानिक मशीनरी का फेल होना दर्शाता है। सरकार की ऐसी नीतियों से ईमानदार व्यक्ति केवल दया के पात्र बने रहते हैं जबकि बेईमानों को कानून तोड़ने की पूरी इजाजत रहती है। यह ईमानदार और कानून मानने वाले शहरियों के मानवाधिकारों का हनन है जिन्होंने नियम-कानून के तहत अपने घर बनवाए हैं।
कोर्ट ने सरकार की अवैध निर्माण को नियमित करने की नीति पर टिप्पणी करते हुए कहा कि हजारों ऐसे निर्माण हैं जो असुरक्षित हैं, फिर भी उन्हें नियमित किया जा रहा है। हिमालय पर्वत शृंखलाएं भूकंप की दृष्टि से अति संवेदनशील हैं। इससे इंसानी जीवन और संपत्ति के नष्ट होने का खतरा है। कोर्ट ने अपने फैसले में कुछ अंग्रेजी के अखबारों में छपी रिपोर्ट का भी हवाला दिया है।