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#हिंदीहैंहम: निजी स्वार्थों और हितों की पूर्ति का मोहरा बन रही हिंदी
Sun, 05 Sep 2021 10:50 PM IST
अरविन्द ठाकुर
अमर उजाला नेटवर्क, शिमला
अमर उजाला नेटवर्क, शिमला
Published by: अरविन्द ठाकुर
Updated Sun, 05 Sep 2021 10:50 PM IST
सार
गोपाल दिलैक ने कहा कि कोविड काल में जब हिंदी की अखबारें छप रही थीं तो हिमाचल प्रदेश भाषा एवं संस्कृति विभाग की हिंदी पत्रिकाएं क्यों नहीं निकलीं। शासकीय कर्णधार इस बारे में क्यों चुप्पी साधे रहे।
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हिमाचल प्रदेश के प्रतिष्ठिति साहित्यकार
- फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
अमर उजाला के महत्वाकांक्षी ‘हिंदी हैं हम’ अभियान में रविवार को वेबिनार करवाया गया। अमर उजाला के शिमला कार्यालय से किए गए इस संवाद में प्रदेश के प्रतिष्ठित साहित्यकारों ने भाग लिया। उन्होंने अमर उजाला के इस अभियान की जमकर तारीफ की तो हिंदी भाषा की दशा और दिशा पर भी अपने विचार साझा किए। इनमें से कुछ शब्द शिल्पियों को हिंदी भाषा के लिए अंग्रेजी खतरा नहीं लगती है तो वहीं ये राजभाषा को राष्ट्रभाषा का दर्जा नहीं मिल पाने से चिंतित भी हैं। प्रस्तुत हैं इनसे हुई बातचीत के कुछ अंश :
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रोजगार, शासन और न्याय की भाषा बने हिंदी
संपर्क, संवाद और साहित्य की दृष्टि से हिंदी की स्थिति बहुत अच्छी है लेकिन शासकीय या राष्ट्रीय भाषा के रूप में हिंदी को निश्चय ही वह स्थान नहीं मिल पाया, जिसकी वह हकदार है। शासक और शासित की भाषा, शास्त्र और लोक की भाषा हमेशा से अलग रही है। यह शासक के लिए वर्चस्व बनाए रखने, अवसरों की बंदरबांट आदि में सुविधाजनक रही है। यहां तक कि न्याय की भाषा भी आमजन से भिन्न रही है। इसलिए ही न्याय भी अधिकतर प्रभुजन की गिरफ्त में रहा है। हिंदी भाषा का वास्तविक हित तभी संभव है कि वह रोजगार, शासन और न्याय की भाषा बन पाए। - आत्मा रंजन, सुपरिचित कवि। चर्चित कविता संग्रह ‘पंगडंडियां गवाह हैं’।
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हिंदी भाषा के प्रचार-प्रसार में मीडिया की महत्वपूर्ण भूमिका रहती है। आजकल कई समाचार पत्रों ने भी सोशल मीडिया पर लाइव चैनल शुरू किए हैं। इसमें जिस तरह की हिंदी बोली जा रही है, वह चिंताजनक है। सोशल मीडिया चैनलों पर न केवल सूचना देने की बल्कि भाषा सिखाने की भी जिम्मेवारी है। पर न उच्चारण पर ध्यान दिया जा रहा है और न ही भाषा का पूरी समझ के हिसाब से ही इस्तेमाल किया जा रहा है। अंग्रेजी में अगर कोई वक्ता गलत शब्द बोलता है या गलत उच्चारण करता है तो यह स्वीकार्य नहीं होता है। जबकि हिंदी में ऐसा नहीं हो रहा। - डॉ. सत्यनारायण स्नेही, कवि, साहित्यकार और सहायक आचार्य हिंदी।
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कोविड काल में जब हिंदी की अखबारें छप रही थीं तो हिमाचल प्रदेश भाषा एवं संस्कृति विभाग की हिंदी पत्रिकाएं क्यों नहीं निकलीं। शासकीय कर्णधार इस बारे में क्यों चुप्पी साधे रहे। यह भी दुर्भाग्यजनक है कि सार्वजनिक स्थानों पर जो पट्टिकाएं लगी होती हैं, उनमें हिंदी की गलतियों पर जिम्मेवार विभाग ध्यान ही नहीं देता है। रिज के पास पर्यटन विभाग की एक पट्टिका लगी हैं, उसमें ‘देवतात्मा’ शब्द लिखा है। कोई इस शब्द की उत्पत्ति समझाए। इस तरह की खामियों पर ध्यान देने की जरूरत है। अमर उजाला का यह अभियान अच्छा है। - गोपाल दिलैक, सेवानिवृत्त सहायक निदेशक भाषा।
बच्चे भाषा पहले घरों में सीखते हैं, उसके बाद स्कूलों में सीखी जाती है। हिंदी की किताबें हाशिये पर जा रही हैं। हिंदी में पुस्तक संस्कृति बहुत जरूरी है। सारिका, दिनमान, धर्मयुग आदि कई पत्रिकाएं घरों में होती थी। ये सोच को समृद्ध करती थीं। टीवी वाले हिंदी भाषा सिखा रहे है। इसमें शालीनता नहीं है, बेहूदगी है। पुस्तकें बेचने वाले विक्रेताओं ने अब फल बेचने शुरू कर दिए हैं। शिक्षा पद्धति में अंग्रेजी स्कूल खुल गए हैं। अंग्रेजी का वर्चस्व है। हिंदी उपेक्षित भाषा है। अंग्रेजी को रोजगार से जोड़ा जाता है। घरों में हिंदी भाषा को बोलने का माहौल नहीं है। - कुलराजीव पंत, कवि-साहित्यकार।
एक से अधिक भाषा में प्रवीणता व्यक्ति और समाज के लिए लाभदायक होती है। मैं अंग्रेजी पढ़ाती हूं। मेरा मानना है कि द्विभाषी व्यक्ति दो संस्कृतियों को जानता है। ज्यादा भाषाएं जानने से मनुष्य का मस्तिष्क बेहतरीन काम कर सकता है। हिंदी हमारे लिए गौरव की भाषा है। बहुत से बच्चे शोध कर रहे हैं तो पहाड़ी शब्द उनके शोधों में हिंदी में जगह लेने लगे हैं। ये सही है। अंग्रेजी चोर भाषा है। यह सारी भाषाओं से शब्द ले लेती है, इसलिए इसकी स्वीकार्यता वैश्विक होती गई। हिंदी को भी दूसरी भाषाओं से शब्द ग्रहण करने चाहिए। अंग्रेजी को अवसरों का माध्यम रखना चाहिए। - डॉ. मीनाक्षी एफ. पॉल, अंग्रेजी और हिंदी दोनों भाषाओं की लेखिका, अंग्रेजी की प्रोफेसर।
हिंदी को भले ही राष्ट्रभाषा और राजभाषा का दर्जा दिया गया हो लेकिन जमीनी स्तर पर इसके प्रचार-प्रसार को लेकर सरकार उदासीन ही रही है। अंग्रेजी का वर्चस्व बढ़ता ही जा रहा है। हिंदी सीखने का बचपन जहां से शुरू होता है, उन राजकीय पाठशालाओं की स्थिति कॉन्वेंट कल्चर के आगे धूमिल होती जा रही है या जानबूझकर यह भ्रम फैलाया जाता है कि सरकारी स्कूलों में न अब भविष्य है और न हिंदी आपको रोजगार ही दे सकती है। हिमप्रस्थ जैसी पुरानी पत्रिका का सर्कुलेशन इतना भी नहीं कि शिमला मॉल के किसी स्टाल पर मिल सके, जबकि इसका विभाग ही ‘लोक संपर्क’ है। - एसआर हरनोट, हिंदी के प्रख्यात कथाकार।
हिंदी ने खुद को संपर्क भाषा के रूप में स्थापित किया है। बच्चे अगर हिंदी और अंग्रेजी को मिलाकर हिंग्लिश का इस्तेमाल कर रहे हैं तो इससे कुछ खतरा नहीं है। इससे उनके बोलचाल में तो हिंदी है ही। हिंदी बोलचाल की भाषा और संपर्क की भाषा के रूप में समृद्ध हुई है। यह सिलसिला जारी रहेगा। उन्हें इसकी विकास यात्रा की आशा है। जब हिमाचल प्रदेश भाषा एवं संस्कृति विभाग में निदेशक के रूप में कार्यरत था तो अंग्रेजी से हिंदी और हिंदी से अंग्रेजी की ग्लॉसरी बनाने का प्रयास किया। हिंदी बहुत अधिक बोली जाने वाली भाषा है। - केआर भारती, हिंदी और अंग्रेजी दोनों भाषाओं के लेखक, सेवानिवृत्त आईएएस अधिकारी।
यदि एक राशन कार्ड, एक राष्ट्र, एक संविधान-एक झंडा, एक राष्ट्र-एक चुनाव पर बात हो सकती है तो एक राष्ट्र एक भाषा क्योें नहीं। हिंदी दिवस, पखवाड़ा या सप्ताह थकने वाली कवायद नहीं होनी चाहिए। हिंदी को अंग्रेजी से कोई खतरा नहीं है। बाजारवाद और भूमंडलीकरण के चलते यह विज्ञापन और विपणन की भाषा के तौर पर स्वीकार्य है। खतरा तो संविधान की आठवीं अनुसूची को लेकर है। यदि हिंदी की प्राणदायिनी बोलियों को आठवीं अनुसूची में स्थान मिल गया और भाषा का दर्जा मिल गया तो हिंदी की बड़ी जनसंख्या कट जाएगी। - डॉ. देवेंद्र गुप्ता, साहित्यकार और पूर्व भाषा एवं संस्कृति निदेशक।
समाज में पुराने समय से दो भाषाएं विद्यमान रही हैं, एक राजभाषा, एक लोकभाषा जैसे वैदिक संस्कृत और लौकिक संस्कृत रही हैं। हिंदी राजभाषा है न कि राष्ट्रभाषा, यह विडंबना रही है। राजभाषा सरकार बनाती है। मुगल काल की राजभाषा उर्दू-फारसी रही, जो आज तक चली हुई है। हमारा पूरा राजस्व रिकॉर्ड उर्दू में है। यही नहीं, हम अपने रोजमर्रा की बोलचाल में ना जाने ऐसे कितने शब्दों का प्रयोग करते हैं। ऐसे ही अंग्रेजी के कितने ही शब्दों का प्रयोग आज किया जाता है। जैसे फिल्म, विज्ञापन से हिंदी का प्रयोग बढ़ा है वैसे हिंदी के प्रचार के लिए काम हो सकता है। - सुदर्शन वशिष्ठ, कथाकार, कवि और पूर्व सचिव, भाषा कला संस्कृति अकादमी।
संपर्क भाषा के रूप में देश भर में हिंदी की स्वीकार्यता बढ़ी है। शासकीय भाषा के रूप में भी हिंदी की जरूरत को लेकर मैं बहुत आशान्वित हूं कि जड़ता से उबर कर भाषा का सहज और स्वीकार्य स्वरूप विकसित होगा। भाषा को किसी पर थोपा नहीं जा सकता, वह अपनी खूबियों के चलते सहज ही स्वीकृति पा लेती है। हिंदी अन्य भाषाओं और बोलियों के शब्दों से समृद्ध होगी है न कि कमजोर। संसदीय समितियों पर भारी व्यय होता है, उसके स्थान पर यदि छोटी-छोटी जगहों पर पुस्तकालय और चर्चाओं के लिए सभागार बनाए जाएं तो हिंदी स्वाभाविक रूप से समृद्ध होगी। - डॉ. निरंजन देव शर्मा, कथाकार और समालोचक।
हर भाषा की अपनी प्रकृति होती है, अपना स्वभाव होता है। हिंदी की प्रकृति जोड़ने की रही है। उसने आरंभ से ही भिन्न संस्कृतियों को जोड़ने का काम किया है। कबीर, नानक, रैदास जैसे अनेक भक्त-संत कवि इसके साक्षी हैं। देखा जाए तो खड़ी बोली हिंदी की उत्पत्ति तक दो संस्कृतियों के मिलन से हुई है, अमीर खुसरो इसके गवाह हैं। नवजागरण की सदी में और कालांतर में स्वाधीनता संग्राम में हिंदी ने भारतीय जनमानस को रूढ़ियों और अंधविश्वासों से दूर कर अंग्रेजी औपनिवेशिक नीति के खिलाफ एक संगठित मोर्चे के रूप में जोड़ा था। लेकिन वर्तमान युग में हिंदी को निजी स्वार्थों और हितों की पूर्ति का मोहरा बनाया जा रहा है और उसे वर्चस्व और वैमनस्य की छद्म लड़ाई में धकेला जा रहा है। आज साहित्यकारो, भाषा-विद्वानों, राजभाषा-अधिकारियों, शिक्षकों और सत्ताधारियों को मिलकर हिंदी की उसी सांस्कृतिक मिलाप की शक्ति को जगाना होगा, जिसमें किसी भी जाति, धर्म और संप्रदाय की दीवारें नही हों। - डा. विद्यानिधि छाबड़ा, साहित्यकार, समालोचक और अनुवादक। सेवानिवृत्त प्रोफेसर।