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काम की बात: सिंथेटिक दवाओं का विकल्प बनेगा हिमाचली शहद
Thu, 30 Dec 2021 03:02 PM IST
विक्रांत चतुर्वेदी
सुरेश शांडिल्य, शिमला
सुरेश शांडिल्य, शिमला
Published by: विक्रांत चतुर्वेदी
Updated Thu, 30 Dec 2021 03:02 PM IST
सार
एपिस सेराना और मेलिफेरा मधुमक्खियों के शहद पर अध्ययन में सामने आई बात। नौणी विश्वविद्यालय में 26 तरह के बैक्टीरिया पर अध्ययन किया गया है।
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शहद
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विस्तार
हिमाचल प्रदेश में पाई जाने वाली मधुमक्खियों का शहद सिंथेटिक दवाओं का विकल्प बनेगा। इससे प्राकृतिक दवाएं तैयार की जा सकती हैं। एपिस सेराना और एपिस मेलिफेरा प्रजाति की मधुमक्खियों के शहद पर किए गए अध्ययन में यह बात सामने आई है। यह अध्ययन डॉ. वाईएस परमार बागवानी एवं वानिकी विश्वविद्यालय नौणी में हुआ है। यहां पर माइक्रोबियल विविधता और जीवाणुरोधी क्षमता को जांचा गया है। इसमें यह कारगर पाया गया है।
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सेराना से 14 और मेलिफेरा से 12 तरह के बैक्टीरिया पर यह अध्ययन किया गया है। इन मधुमक्खियों के शहद ने एस्चेरिचिया कोलाई बैक्टीरिया के खिलाफ उत्कृष्ट निरोधात्मक गतिविधि का प्रदर्शन किया जबकि बेसिलस सबटिलिस स्यूडोमोनास एरुगिनोस, साल्मोनेला टाइफी और क्लेबसिएला न्यूमोनिया के खिलाफ अच्छेचिकित्सीय एजेंट के रूप में इसके उपयोग को उद्घाटित किया।
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अध्ययन में पाया गया कि यह शहद बैक्टीरिया के संक्रमण के इलाज के लिए सिंथेटिक दवाओं के सेवन से जुड़े कई दुष्प्रभावों को कम करने में प्रभावी हो सकता है। इससे सिंथेटिक दवाओं के लिए एक स्वस्थ विकल्प के रूप में शहद की भूमिका का संकेत मिलता है। उल्लेखनीय है कि प्रति जैविक या एंटी बैक्टीरियल या एंटी बायोटिक दवाएं तीन तरह से तैयार होती हैं। ये सिंथेटिक, सेमी सिंथेटिक या प्राकृतिक रूप से बनती हैं। सिंथेटिक दवाओं को प्रयोगशालाओं में रसायनों से तैयार किया जाता है। इनके साइड इफेक्ट होते हैं, मगर जो दवाएं प्राकृतिक रूप से तैयार होती हैं, उनसे दुष्प्रभाव नहीं होते हैं।
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आरकाइव्स ऑफ माइक्रोबायलॉजी जर्नल में छपा है यह अध्ययन
डॉ. वाईएस परमार बागवानी एवं वानिकी विश्वविद्यालय के बेसिक साइंसेज और एंटोमोलॉजी विभागों के विशेषज्ञों डॉ. सुनीता देवी, डॉ. अकवाल परिहार, डॉ. मीना ठाकुर, डॉ. भारती ठाकुर और डॉ. हरीश कुमार शर्मा का इस विषय पर यह अध्ययन आरकाइव्स ऑफ माइक्रोबायलॉजी नामक एक जर्नल में छपा है।
एपिस सेराना
इस मधुमक्खी को सतकोचवा कहते हैं। क्योंकि ये दीवारों या खोखलों में लगभग सात समानांतर छत्ते बना देती है। यह कम आक्रामक मधुमक्खी मानी जाती है। एक समय में एक छत्ते से दो किलो तक शहद निकल सकता है। यह दक्षिण एशिया में खूब पाई जाती है।
एपिस मेलिफेरा
यह पश्चिमी या यूरोपीय मधुमक्खियों की प्रमुख प्रजातियों में से एक है। यह शहद उत्पादन और परागण में बहुत इस्तेमाल होती है। सेब सीजन के दौरान परागण के लिए भी इसे हर साल हिमाचल लाया जाता है।