आखिर ये है केंद्र से घोषित कैशलैस गांवों का असली सच, सच्चाई चौंका देगी
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केंद्र और राज्य सरकार के अधिकारियों की बैठक में सोमवार को भारत सरकार से जुड़ी संस्था सीएससी-एसपीवी ने हिमाचल के सोलन जिले का तुंदल और मंडी जिले के संधोल गांवों के कैशलेस होने का दावा किया था। लेकिन हिमाचल के इन दो कथित कैशलेस गांवों की जमीन पर पोल खुल गई।
इन गांवों के कई भोले लोग जानते तक नहीं कि कैशलेस क्या बला है। यहां दुकानों पर न स्वाइप मशीनें दिखीं, न डेबिट या क्रेडिट कार्ड। सारा कारोबार कैश पर चलता है। लेकिन सरकार की नजर में ये गांव कैशलेस हैं और अब इन्हें केंद्र सरकार से सम्मानित करवाने तक की बात चलने लगी है।
सरकारी संस्थाएं कैसे काम करती हैं और करवाती हैं इसका ताजा उदाहरण अमर उजाला की पड़ताल के बाद सामने आया। बीते सोमवार को भारत सरकार से जुड़ी एक संस्था कॉमन सर्विसेज सेंटर-स्पेशल पर्पज व्हीकल (सीएससी-एसपीवी) के दावे के बाद हिमाचल सरकार ने बाकायदा एक प्रेस नोट जारी किया था।
बताया गया कि इन दो गांवों को भारत सरकार की ओर से पुरस्कार को चुने जा रहे देश के 50 गांवों में नामित किया जा रहा है। मंगलवार को ‘अमर उजाला’ ने इन गांवों के कैशलेस होने के दावे की जमीन पर पड़ताल की तो सच्चाई कुछ और मिली। इन गांवों के कुछ लोगों को तो कैशलेस व्यवस्था की आधारभूत जानकारी तक नहीं है। कैशलेस होना तो दूर की बात थी।
तो बस इस वजह से कैशलैस घोषित हो गए ये गांव
मंगलवार को जब अमर उजाला ने सरकार के एक अफसर से इस दावे के बारे में पूछा तो उनका कहना था कि यह दावा केंद्र सरकार की संस्था सीएससी-एसपीवी का है, हमारा नहीं। अमर उजाला ने इस संस्था के राज्य प्रमुख जसपाल सिंह से पूछा कि यह दावा आपकी संस्था ने किस आधार पर किया है? जवाब मिला कि ऐसा लोकमित्र केंद्रों से मिली सूचना के आधार पर किया गया।
अब इस दावे की मौके पर जांच की जा रही है। फिर उन्होंने बताया कि सोलन में गांव का नहीं बल्कि पंचायत का नाम तुंदल है और इसी में एक गांव कलहोग कैशलेस है। मंडी के संधोल का कौन सा गांव कैशलेस है, इस पर वे बाद में ही कुछ बता पाएंगे। इन गांवों के कैशलेस होने के क्लेम मेें जो कमियां हैं, उनको भी ठीक किया जा रहा है। इनमें फोन, बिजली बिल आदि ऑनलाइन लोकमित्र केंद्रों में जमा हो रहे हैं। यानी खुद संस्था अभी तक इसे लेकर भ्रम में है।
दूसरी ओर, सूचना प्रौद्योगिकी निदेशक मानसी सहाय ठाकुर ने मंगलवार को कहा कि सीएससी-एसपीवी एजेंसी को डिजिटल भुगतान से संबंधित लोकमित्र केंद्र संचालकों के दावों की जांच करने के लिए इन दो नामित गांवों का दौरा करने के लिए कहा गया है। सूचना प्रौद्योगिकी विभाग के अधिकारी भी इन गांवों से संबंधित दावों की जांच के लिए मौके पर जाएंगे। भारत सरकार की डिजिटल भुगतान योजना के तहत पुरस्कार नामांकन, सीएससी-एसपीवी और लोकमित्र केंद्र संचालकों के दावों की मौके पर जांच के बाद ही किया जाएगा।
यहां जानिए कैशलैस गांव संधोल की पूरी सच्चाई
सुशील शर्मा संधोल (मंडी). जिला मंडी का संधोल गांव कैशलेस होने से कोसों दूर है। संधोल बाजार के दुकानों में न तो कार्ड स्वाइप मशीनें लगी हैं और न ही व्यापारियों को पेटीएम की जानकारी है। ग्रामीण क्षेत्रों के ग्राहक भी नकद पैसे देकर सामान खरीद रहे हैं। संधोल में ढाई सौ से अधिक दुकानें हैं। पंचायत की आबादी करीब 1700 है। केंद्रीय संस्था सीएससी-एसपीवी के संधोल गांव के कैशलेस होने के दावे पर मंगलवार को अमर उजाला ने हकीकत को जानने का प्रयास किया।
किसी भी दुकान पर स्वाइप मशीन और पेटीएम जैसी सुविधा नहीं दिखी। लोग नकद पैसे देकर जरूरत की चीजें खरीदते दिखे। संधोल में पीएनबी, ग्रामीण बैंक, राज्य सहकारी बैंक, यूको बैंक की शाखाएं हैं। बाजार में पीएनबी के दो एटीएम, यूको बैंक का एक एटीएम है। ये कैश न होने से बंद पड़े हैं। लोग बिजली-पानी के बिल भी नकद कैश पर ही जमा करवा रहे हैं। केंद्र सरकार ने संधोल को कैशलेस गांवों में नामित किया है, जबकि यह गांव कैशलेस होने के दावों से कोसों दूर है।
संधोल व्यापार विकास समिति के प्रधान राजेंद्र मंढोत्रा ने कहा कि संधोल बाजार में दो से ढाई सौ दुकानें हैं। किसी भी दुकान में स्वाइप मशीन और पेटीएम की सुविधा नहीं है। फिर संधोल कैशलेस कैसे हो सकता है। कहा कि गांव के लोगों के पास अभी तक क्रेडिट नहीं हैं। न ही उन्हें पेटीएम का इस्तेमाल करने का पता है।
जानें कैसे व्यापारियों ने खोली दावों की पोल
व्यापार मंडल संधोल के प्रधान संजय कुमार ने कहा कि गांव के कैशलेस होने का दावा सही नहीं है। आज भी गांव के लोग नकद पैसे से जरूरत की चीजें खरीद रहे हैं। कपड़ा व्यापारी देशराज ने कहा कि उनके पास भी स्वाइप मशीन नहीं है। बाजार में बैंकों के एटीएम बंद पड़े हैं। छोटे नोट न होने से व्यापारियों को दिक्कतें हो रही हैं।
स्थानीय निवासी अनिल धलारिया, गोपाल, महेंद्र सिंह, अशोक, रविंद्र और संजय ने कहा कि संधोल को कागजों में ही कैशलेस गांवों में नामित किया गया है। उनके पास क्रेडिट कार्ड तक नहीं है। न ही दुकानों में स्वाइप मशीनें हैं। पंचायत प्रधान कुमकुम के मुताबिक उन्हें अभी तक संधोल गांव कैशलेस होने के बारे में कोई जानकारी नहीं है। गांव के अधिकतर लोगों को कैशलेस के बारे में जानकारी नहीं है।
धर्मपुर के विधायक महेंद्र सिंह ठाकुर ने कहा कि क्षेत्र के लोगों को कैशलेस के बारे में पार्टी कार्यकर्ता जागरूक कर रहे हैं। जल्द ही क्षेत्र में शिविर लगाया जाएगा। इसमें लोगों को कैशलेस के बारे में बताया जाएगा। कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक अच्छा फैसला लिया है।
अब इस कैशलेस गांव तुंदल का सच भी जान लीजिए
जिला सोलन के कंडाघाट की तुंदल पंचायत में सुबह दस बजे सड़क किनारे खस्ताहाल पगडंडी के पास दसवीं पढ़ रहे शुभम और हेमंत क्रिकेट खेल रहे हैं। यहां आसपास कोई दुकान है। शुभम बोला नहीं, तीन किमी दूर कहलोग में है, हम वहीं से राशन लाते हैं। पूछने पर क्या राशन के लिए नगदी देते हो या कैशलेस ट्रांजेक्शन करवाते हो। जवाब मिला कैशलेस वो क्या होता है। हम तो पैसे देते हैं।
कुछ दूरी पर धूप सेंक रहे 75 वर्षीय बुजुर्ग लक्ष्मी सिंह वर्मा से बात की तो वे बोले मैं इस पंचायत का 17 साल तक प्रधान रहा हूं। 1978 से 1995 तक लगातार प्रधान बनकर इस गांव की सेवा की है। सुना है यह गांव कैशलेस हो गया है। वह मुस्कुरा कर बोले हां अखबारों में तो यही दावा हुआ है, लेकिन जमीनी हकीकत आप खुद देख लो। यहां के लोग सही मायने में एटीएम नहीं जानते तो कैशलेस क्या जानेंगे?
कृषि प्रधान गांव होने के चलते सिंचाई जैसी अहम सुविधा तो यहां पहुंची नहीं अब कैशलेस कैसे पहुंचेगी। कहलोग गांव के पास एक दुकान में कृषक राजेंद्र निवासी थाना बडहौल से मुलाकात हुई। उनके अनुसार चाहे सरकारी योजनाओं के लिए कैशलेस हो या अन्य के लिए, यह दावे महज बकवास हैं। उन्हें मंडियों में कैश की उपलब्ध न होने से मुश्किल है। जबकि गांव में हर व्यक्ति के पास एटीएम भी नहीं है। अगर एटीएम है तो उसकी समझ नहीं।
मात्र एक दुकान पर माइक्रो एटीएम और स्वाइप मशीन
तुंदल पंचायत में तुंदल, बडून, थाना, रूड़ा, बबौला, अलझोह और कहलोग गांव हैं। एक मात्र यूको बैंक साधुपुल में है। पूरी पंचायत में एक सरकारी डिपो समेत महज दो तीन निजी दुकानें और आबादी करीब 1000-1200। कहलोग में एक दुकान में जरूर कैशलेस की सराहनीय पहल देखने को मिली। संचालक को यूको बैंक की माइक्रो एटीएम मशीन और मिनी स्वाइप मशीन दी गई है।
अपना परिचय देकर करीब एक घंटा दुकान में बिताया। आज लाइट न होने से ब्राडबैंड नहीं चल रहा है। लिहाजा, किसी के जियो के हॉट स्पॉट से माइक्रो एटीएम चलाया गया। एक घंटे के भीतर कोई भी ग्रामीण ट्रांजेक्शन के लिए नहीं पहुंचे। सीनियर सेकेंडरी स्कूल का स्टाफ जरूर नकदी लेने के लिए कार्ड स्वाइप करवा रहा था।
संचालक अश्वनी कुमार ने बताया कि वह घर-घर जाकर भी लोगों को इस बारे में जागरूक कर रहे हैं। यूको बैंक के मैनेजर सुखदेव शर्मा भी वहां पहुंचे। उनके मुताबिक 100 फीसदी कैशलेस मुमकिन नहीं है। हां माइक्रो एटीएम की व्यवस्था नोटबंदी के दौर में लाभदायक साबित जरूर हो रही है, लेकिन ग्रामीणों में जागरूकता होना इसके लिए बेहद जरूरी है।