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Himachal: हाईकोर्ट ने कहा- पारिवारिक इतिहास और सामूहिक सजा के आधार पर निवारक हिरासत अवैध

Thu, 16 Apr 2026 05:00 AM IST
Krishan Singh भारती मेहता, संवाद न्यूज एजेंसी, शिमला।
भारती मेहता, संवाद न्यूज एजेंसी, शिमला। Published by: Krishan Singh Updated Thu, 16 Apr 2026 05:00 AM IST
सार

हाईकोर्ट ने पीआईटी एनडीपीएस अधिनियम के तहत एक व्यक्ति की हिरासत को रद्द करते हुए कानून व्यवस्था और नागरिक अधिकारों के संरक्षण पर महत्वपूर्ण टिप्पणी की है। 

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Himachal: Preventive detention based on family history and collective punishment is illegal, says High Court
हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट। - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने पीआईटी एनडीपीएस अधिनियम के तहत एक व्यक्ति की हिरासत को रद्द करते हुए कानून व्यवस्था और नागरिक अधिकारों के संरक्षण पर महत्वपूर्ण टिप्पणी की है। मुख्य न्यायाधीश गुरमीत सिंह संधावालिया और न्यायाधीश जिया लाल भारद्वाज की खंडपीठ ने याचिकाकर्ता की हिरासत को अवैध ठहराते हुए उसे तुरंत रिहा करने के आदेश दिए हैं। हाईकोर्ट ने 19 दिसंबर 2025 के मूल हिरासत आदेश और 17 मार्च 2026 के विस्तार आदेश, दोनों को खारिज कर दिया। अदालत ने सख्त लहजे में कहा कि केवल संदेह या गुप्त सूचना के आधार पर किसी व्यक्ति को तब तक हिरासत में नहीं रखा जा सकता जब तक कि उसके द्वारा भविष्य में अपराध करने की ठोस और तत्काल आशंका न हो।

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निवारक हिरासत एक कठोर कानून है और इसका उपयोग केवल असाधारण परिस्थितियों में ही होना चाहिए, न कि किसी परिवार को परेशान करने या सामान्य पुलिस जांच की विफलता को छिपाने के लिए। खंडपीठ ने टिप्पणी करते हुए कहा कि पारिवारिक पृष्ठभूमि सजा का आधार नहीं हो सकती है। अदालत ने स्पष्ट किया कि याचिकाकर्ता को उसके पिता (जिनका आपराधिक इतिहास 1972 से है) उसके बेटों या भाई के कृत्यों के लिए जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता। पुलिस ने याचिकाकर्ता की हिरासत को जायज ठहराने के लिए उसके पूरे परिवार के आपराधिक रिकॉर्ड का हवाला दिया था, जिसे कोर्ट ने सामूहिक सजा करार दिया। पुलिस ने तर्क दिया था कि याचिकाकर्ता नशीली दवाओं के व्यापार में शामिल है।

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हालांकि, कोर्ट ने पाया कि याचिकाकर्ता को आखिरी बार जुलाई 2024 में एक मामले में नामजद किया गया था, जिसमें उसे अक्टूबर 2024 में जमानत मिल गई थी। दिसंबर 2025 में हिरासत आदेश जारी होने तक (लगभग 14 महीने) उसके खिलाफ कोई नया मामला दर्ज नहीं हुआ था। कोर्ट ने कहा कि पुराने मामलों और वर्तमान निवारक हिरासत के बीच का जीवंत संबंध टूट चुका है। अदालत ने पाया कि हिरासत के आदेश की तामील करते समय याचिकाकर्ता को जरूरी दस्तावेज नहीं दिए गए थे। इसके अलावा उसे अपनी बात रखने या प्रतिनिधित्व करने का उचित अवसर नहीं मिला, जो संविधान के अनुच्छेद 22(5) के तहत एक मौलिक अधिकार है। कोर्ट ने कहा कि निवारक हिरासत कानून का इस्तेमाल दंडात्मक कार्रवाई या सामान्य आपराधिक प्रक्रिया के विकल्प के रूप में नहीं किया जा सकता।

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राज्य में अपीलीय ट्रिब्यूनल कार्यात्मक, वहां दायर कर सकते हैं अपील
 प्रदेश हाईकोर्ट ने जीएसटी अधिनियम के तहत दायर याचिकाओं का निपटारा करते हुए स्पष्ट किया कि अब राज्य में अपीलीय ट्रिब्यूनल कार्यात्मक हो चुका है, इसलिए याचिकाकर्ता वहां अपनी अपील दायर कर सकते हैं। अदालत ने याचिकाकर्ताओं को यह छूट दी कि वे केंद्र सरकार की ओर से 17 सितंबर 2025 और राज्य कर एवं आबकारी विभाग की ओर से 24 फरवरी 2026 को जारी अधिसूचनाओं के तहत ट्रिब्यूनल के समक्ष अपील दायर कर सकते हैं। न्यायाधीश विवेक सिंह ठाकुर और न्यायाधीश रंजन शर्मा की खंडपीठ ने कहा कि याचिकाकर्ताओं ने सीजीएसटी अधिनियम 2017 की धारा 107 के तहत अपीलीय प्राधिकरण द्वारा 5 फरवरी 2024 को पारित आदेश को चुनौती दी थी। अदालत ने पाया कि याचिकाकर्ताओं के पास सीजीएसटी अधिनियम की धारा 112 के तहत अपीलीय ट्रिब्यूनल में अपील करने का एक प्रभावी कानूनी विकल्प उपलब्ध है। अदालत ने उल्लेख किया कि अपीलीय ट्रिब्यूनल अब कार्य करना शुरू कर चुका है, जिससे संबंधित विवादों के समाधान के लिए अब सीधे हाईकोर्ट आने की आवश्यकता नहीं है।

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