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मंडी संसदीय उपचुनाव: भाजपा और कांग्रेस की सियासी बिसात पर दो राजपूत आमने-सामने

Sun, 10 Oct 2021 12:29 PM IST
अरविन्द ठाकुर अमर उजाला नेटवर्क, मंडी
अमर उजाला नेटवर्क, मंडी Published by: अरविन्द ठाकुर Updated Sun, 10 Oct 2021 12:29 PM IST
सार

अनुसूचित जाति की आबादी (29.85 फीसदी) ब्राह्मणों से अधिक है लेकिन सिर्फ एक बार अनुसूचित जाति के नेता को ही सांसद बनने का मौका मिला है।

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Himachal News: Two rajput community candidates in By election for mandi parliamentary constituency
मंडी लोकसभा सीट - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

मंडी संसदीय उपचुनाव में भाजपा और कांग्रेस की सियासी बिसात पर एक बार फिर राजपूत आमने-सामने होंगे। 17 विधानसभा क्षेत्रों में 33.6 फीसदी राजपूत आबादी के अच्छे खासे वोट बैंक पर दोनों दलों ने दाव खेला है। हालांकि, दोनों राजपूतों की जंग में ब्राह्मण वोटर निर्णायक साबित होगा। 21.4 फीसदी की ब्राह्मण आबादी को जिसका समर्थन मिलेगा, उसकी स्थिति मजबूत होगी। 

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अनुसूचित जाति की आबादी (29.85 फीसदी) ब्राह्मणों से अधिक है लेकिन सिर्फ एक बार अनुसूचित जाति के नेता को ही सांसद बनने का मौका मिला है। 1952 के लोकसभा चुनाव में यहां से कांग्रेस के गोपी राम सांसद चुने गए थे। वह अनुसूचित जाति से थे। इसके बाद दो सांसद चुनने का नियम समाप्त कर दिया था। उस समय एक सीट सामान्य व एक अनुसूचित जाति वर्ग के लिए आरक्षित थी। 1952 के बाद किसी भी राजनीतिक दल ने अनुसूचित जाति के नेता पर विश्वास नहीं जताया है। संसदीय क्षेत्र छह जिलों के 17 विधानसभा क्षेत्रों में फैला है। इनमें पांच विधानसभा क्षेत्र रामपुर, आनी, बल्ह, नाचन व करसोग अनुसूचित जाति वर्ग के लिए आरक्षित हैं। 
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उल्लेखनीय है कि इस बार एक तरफ छह बार मुख्यमंत्री रहे दिवंगत वीरभद्र सिंह के दम पर प्रतिभा सिंह चुनावी मैदान में समुदाय के समर्थन की भी आस में होंगी तो सात साल के लंबे इंतजार के बाद कारगिल हीरो ब्रिगेडियर कुशाल चंद अपनों से एक मौके की तलाश में दिखेंगे। यहां की परंपरा रही है कि राजपूतों और ब्राह्मणों पर ही दाव लगता आया है। संसदीय सीट का इतिहास बताता है कि यहां दो ब्राह्मण नेता पंडित सुखराम और दिवंगत रामस्वरूप ही गद्दी संभाल सके हैं। इसके अलावा हमेशा बागडोर राजपूतों के हाथ ही रही है। 
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इस तरह है राजपूतों और ब्राह्रमणों का दबदबा 
1957 के चुनाव में गोपी राम को मैदान में उतारने के बजाय इंडियन नेशनल कांग्रेस (आईएनसी) ने तत्कालीन मंडी रिसायत के राजा विजय सेन को मैदान में उतारा था। 1962 व 1967 में यहां से आईएनसी ने तत्कालीन सुकेत रियासत के राजा ललित सेन को मैदान में उतारा था। 1971 के चुनाव में कांग्रेस की तरफ से वीरभद्र सिंह प्रत्याशी थे। 1977 में जनता पार्टी ने पहली बार यहां लोकसभा का चुनाव लड़ा। 

जनता पार्टी की तरफ से ठाकुर गंगा सिंह प्रत्याशी थे। इस चुनाव में पहली बार आईएनसी को हार का मुंह देखना पड़ा था। 1980 में हुए चुनाव में वीरभद्र सिंह दोबारा विजयी हुए थे। वीरभद्र सिंह के 1983 में मुख्यमंत्री बनने के बाद कांग्रेस ने पहली बार किसी ठाकुर नेता के बजाय ब्राह्मण नेता को टिकट दिया था। 1984 के चुनाव में पंडित सुखराम सांसद चुने गए थे। भाजपा की तरफ से कर्मचारी नेता मधुकर सिंह प्रत्याशी थे। 1989 के चुनाव में भाजपा ने कुल्लू के तत्कालीन राजा महेश्वर सिंह को प्रत्याशी बनाया था। वह पहली बार सांसद चुने गए। दो साल बाद चुनाव में उन्हें पंडित सुखराम के हाथ हार का सामना करना पड़ा था। 

1996 में भाजपा ने यहां से कर्मचारी नेता अदन सिंह को मैदान में उतारा था। 1998 के चुनाव में भाजपा के महेश्वर सिंह व कांग्रेस की ओर से प्रतिभा सिंह उम्मीदवार थे। 1999 में मुकाबला दो ठाकुरों महेश्वर सिंह व कौल सिंह के बीच हुआ था। 2004 के चुनाव में प्रतिभा सिंह व महेश्वर सिंह आमने-सामने थे। 2009 में वीरभद्र सिंह व महेश्वर सिंह कांग्रेस-भाजपा के प्रत्याशी थे। 2013 के उपचुनाव में कांग्रेस की प्रतिभा सिंह का मुकाबला भाजपा के जयराम ठाकुर से हुआ था।


2014 के चुनाव में भाजपा ने यहां पहली बार ब्राह्मण नेता रामस्वरूप शर्मा को मैदान में उतारा था। प्रतिभा सिंह को पराजित कर वह पहली बार सांसद बने थे। 2019 के लोकसभा चुनाव में दोनों दलों के उम्मीदवार ब्राह्मण थे। भाजपा ने दोबारा रामस्वरूप शर्मा के को मैदान में उतारा था। कांग्रेस ने पूर्व केंद्रीय पंडित सुखराम के पोते आश्रय शर्मा को उम्मीदवार बनाया था। 

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