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Himachal: ट्रांसफर के त्रिकोणीय खेल में जबरन घसीटी गई कर्मचारी का तबादला रद्द, जानें हाईकोर्ट के बड़े फैसले

Fri, 17 Jul 2026 05:20 AM IST
Krishan Singh संवाद न्यूज एजेंसी, शिमला।
संवाद न्यूज एजेंसी, शिमला। Published by: Krishan Singh Updated Fri, 17 Jul 2026 05:20 AM IST
सार

न्यायाधीश अजय मोहन गोयल की अदालत ने एक महिला स्वास्थ्य कर्मचारी के तबादले को रद्द करते हुए विभाग को उसे उसके वर्तमान स्थान पर ही सामान्य कार्यकाल पूरा करने देने का आदेश दिया है। अदालत ने याचिकाकर्ता अंजना कुमारी के पक्ष में फैसला सुनाते हुए स्वास्थ्य विभाग को आदेश दिया गया है कि वह प्रतिवादी राकेश कुमार को सीधे ढलियारा में समायोजित कर सकते हैं।

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Himachal High Court cancelled the transfer of an employee who was forcibly dragged into the triangular transfe
हिमाचल प्रदेश उच्च न्यायालय। - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने राज्य सरकार की ओर से किए जाने वाले अनावश्यक प्रशासनिक तबादलों पर कड़ी नाराजगी जताई है। न्यायाधीश अजय मोहन गोयल की अदालत ने एक महिला स्वास्थ्य कर्मचारी के तबादले को रद्द करते हुए विभाग को उसे उसके वर्तमान स्थान पर ही सामान्य कार्यकाल पूरा करने देने का आदेश दिया है। अदालत ने याचिकाकर्ता अंजना कुमारी के पक्ष में फैसला सुनाते हुए स्वास्थ्य विभाग को आदेश दिया गया है कि वह प्रतिवादी राकेश कुमार को सीधे ढलियारा में समायोजित कर सकते हैं।

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गौरतलब है कि याचिकाकर्ता को पहले कोर्ट के आदेश के बाद 4 अक्तूबर 2025 को प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र परागपुर (जिला कांगड़ा) में स्थानांतरित किया गया था। वहां उन्होंने 6 अक्तूबर 2025 को ज्वाइन किया था। 31 मार्च 2026 को स्वास्थ्य विभाग ने एक नया आदेश जारी कर उन्हें पीएचसी परागपुर से ढलियारा स्थानांतरित कर दिया। इस तबादले के पीछे विभाग ने एक त्रिकोणीय स्थानांतरण की योजना बनाई थी, जिसके तहत निजी प्रतिवादी राकेश कुमार को ईएसआई अस्पताल संसारपुर टैरेस से हटाकर याचिकाकर्ता की जगह परागपुर भेजा जाना था। याचिकाकर्ता को ढलियारा भेजा जाना था। एक अन्य निजी प्रतिवादी अश्वनी कुमार को ढलियारा से हटाकर राकेश कुमार की जगह संसारपुर टैरेस भेजा जाना था।

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याचिकाकर्ता ने विभाग के इस फैसले को हाईकोर्ट में चुनौती दी थी। अदालत ने तल्ख टिप्पणी करते हुए कहा कि अगर विभाग ने याचिकाकर्ता को परेशान न किया होता, तो यह आसानी से दोतरफा व्यवस्था हो सकती थी। विभाग संसारपुर टैरेस से राकेश कुमार को ढलियारा और ढलियारा से अश्वनी कुमार को संसारपुर टैरेस भेज सकता था। ऐसा करने से कोई आसमान नहीं टूट पड़ता, लेकिन विभाग ने बिना किसी ठोस कारण के याचिकाकर्ता को भी इस त्रिकोणीय फेरबदल में घसीट लिया और महज कुछ महीनों में ही उसका तबादला कर दिया। हाईकोर्ट ने कहा कि परागपुर और ढलियारा के बीच की दूरी महज 10 किलोमीटर है। ऐसे में विभाग सीधे तौर पर राकेश कुमार और अश्वनी कुमार के बीच आपसी तबादला कर सकता था।

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टीजीटी आर्ट्स भर्ती मामले में हाईकोर्ट ने खारिज की अपील
हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट की खंडपीठ ने स्पष्ट किया है कि यदि भर्ती एवं पदोन्नति नियमों में अंकों को राउंडिंग ऑफ यानी पूर्णांकित करने का कोई प्रावधान न हो, तो न्यूनतम पात्रता अंकों में कोई छूट नहीं दी जा सकती। मुख्य न्यायाधीश गुरमीत सिंह संधावालिया और न्यायाधीश बिपिन चंद्र नेगी की खंडपीठ ने एकल जज के फैसले को बरकरार रखते हुए दायर अपील को सिरे से खारिज कर दिया है। अपीलकर्ता ने जेबीटी/टीजीटी (आर्ट्स) भर्ती के लिए आवेदन किया था। विज्ञापन संख्या 1/2025 के अनुसार न्यूनतम योग्यता 45 फीसदी अंक थी, जबकि याचिकाकर्ता के बीकॉम में 44.89 फीसदी अंक थे। उन्होंने कोर्ट से गुहार लगाई थी कि उनके अंकों को राउंडिंग ऑफ करके 45 फीसदी माना जाए, जिसे अदालत ने नामंजूर कर दिया। अपीलकर्ता ने तर्क दिया था कि हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय और कुछ कॉलेजों में प्रवेश के समय राउंडिंग ऑफ का लाभ दिया जाता है। इस पर खंडपीठ ने कहा कि कॉलेज प्रवेश प्रक्रिया और सरकारी नौकरी की चयन प्रक्रिया दोनों बिल्कुल अलग हैं। विज्ञापन और नियमों को जानते हुए ही उम्मीदवार ने आवेदन किया था। इसलिए अब नियमों के विपरीत जाकर किसी भी अधिकार का दावा नहीं किया जा सकता।
 

पूर्व सैनिक कोटे के पद पर पदोन्नति मामले में आदेशों की अवहेलना पर अधिकारी तलब
 प्रदेश हाईकोर्ट ने पूर्व सैनिक कोटे के पद पर पदोन्नति मामले में अदालती आदेशों की अवहेलना पर कड़ा रुख अपनाया है। मुख्य न्यायाधीश गुरमीत सिंह संधावालिया और न्यायाधीश ज्योत्सना रिवाल दुआ की खंडपीठ ने भूषण लाल शर्मा बनाम हिमाचल प्रदेश सरकार मामले में नाराजगी जताते हुए जल शक्ति विभाग के संबंधित अधिकारी को 31 जुलाई को व्यक्तिगत रूप से अदालत में पेश होने का आदेश दिया है। अदालत ने पाया कि याचिकाकर्ता को पूर्व सैनिक कोटे के तहत वरिष्ठता और पदोन्नति के लाभ देने में विभाग ने लगातार आनाकानी की। हाईकोर्ट ने 2022 में ही आदेश दिया था कि अवैध रूप से नियुक्त प्रतिवादी सुमित सूद को वरिष्ठता में भूषण लाल शर्मा से जूनियर रखा जाए। इसके बावजूद बिना किसी अदालती रोक (स्टे) के विभाग ने सुमित सूद को पहले अधीक्षण अभियंता पद पर प्रमोट कर दिया, जबकि याचिकाकर्ता को बिना प्रमोशन 28 फरवरी 2025 को सेवानिवृत्त होना पड़ा। खंडपीठ ने पाया कि याचिकाकर्ता को उसके जायज हक और लाभ न देने के लगातार व जानबूझकर प्रयास किए गए। यह विवाद जल शक्ति विभाग में सहायक अभियंता (सिविल) के पद पर नियुक्ति से जुड़ा है। याचिकाकर्ता ने अदालत में साबित किया था कि उन्हें पूर्व सैनिकों के आश्रित कोटे के तहत नियुक्त किया जाना चाहिए था, लेकिन उनके स्थान पर प्रतिवादी सुमित सूद को अवैध रूप से नियुक्त कर दिया गया, जो इस कोटे के लिए पात्र ही नहीं थे। हाईकोर्ट ने आदेश दिया था कि याचिकाकर्ता को प्रतिवादी वाले पद पर ही सहायक अभियंता नियुक्त किया जाए। इसके साथ ही याची को उचित देय तिथि से वरिष्ठता और उससे मिलने वाले सभी परिणामी लाभ दिए जाएं।
 

अदालती आदेशों से जुड़े वित्तीय प्रस्तावों पर सरकार सख्त
 प्रदेश सरकार ने अदालतों के आदेशों से जुड़े मामलों में वित्तीय प्रभाव वाले प्रस्ताव सीधे वित्त विभाग को भेजने पर फिर सख्ती दिखाई है। वित्त विनियमन विभाग ने सभी प्रशासनिक सचिवों को निर्देश जारी कर कहा है कि न्यायालय के आदेशों के अनुपालन से संबंधित कोई भी प्रस्ताव निर्धारित प्रक्रिया पूरी किए बिना वित्त विभाग को न भेजा जाए। वित्त विभाग की ओर से 8 जुलाई 2026 को जारी पत्र में कहा गया है कि कई विभाग ऐसे मामलों में पर्याप्त वित्तीय दायित्व वाले प्रस्ताव बिना पूरी प्रक्रिया अपनाए सीधे वित्त विभाग को भेज रहे हैं। ऐसे मामलों को उच्च स्तर पर गंभीरता से लिया गया है। पत्र में स्पष्ट किया गया है कि 20 मई 2026 को जारी निर्देशों के अनुसार न्यायालय के आदेशों से जुड़े किसी भी वित्तीय प्रस्ताव को वित्त विभाग भेजने से पहले पूरा मामला संबंधित विभाग के सचिव के माध्यम से मुख्यमंत्री और संबंधित मंत्री के संज्ञान में लाना होगा। इसके साथ ही विधि विभाग अथवा महाधिवक्ता की राय भी प्राप्त करना अनिवार्य होगा। वित्त विभाग ने यह भी उल्लेख किया है कि कार्मिक विभाग ने 9 जून 2026 को न्यायालयी मामलों की समीक्षा, क्रियान्वयन और आगे की कानूनी कार्रवाई के संबंध में अलग से दिशा-निर्देश जारी किए हैं। इसके बावजूद कई विभाग इनका पालन नहीं कर रहे हैं। सरकार ने सभी विभागों को चेतावनी दी है कि भविष्य में निर्धारित प्रक्रिया का पूरी तरह पालन सुनिश्चित किया जाए। यदि अधूरी प्रक्रिया के साथ प्रस्ताव भेजे गए तो उन्हें वापस भेजा जा सकता है।

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