हिमाचली वाद्य यंत्रों को संजोने की कवायद शुरू
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देवभूमि में विभिन्न तरह के पारंपरिक वाद्य यंत्रों को बतौर धरोहर संजोने के लिए हिमाचल सरकार आगे आई है। मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह के निर्देश पर परिवहन मंत्री जीएस बाली ने पारंपरिक वाद्य यंत्रों और इन्हें बजाने की कला को संजोए रखने के लिए नीति बनाने के लिए कवायद शुरू की है। बाली ने प्रदेशभर के लोगों से नीति निर्माण के लिए आम लोगों से सुझाव मांगे हैं। अच्छे सुझाव देने वाले लोगों को उस टीम में भी शामिल किया जाएगा जो पालिसी इंप्लीमेंट करेगी।
मुख्यमंत्री हिमाचली परंपरा को आगे बढ़ाने की इच्छा जताते रहे हैं। लेकिन वीरभद्र के जन्मदिन पर उनकी इच्छा को जमीनी हकीकत पर लाने के लिए कैबिनेट मंत्री जीएस बाली ने कवायद शुरू की है। बाली ने प्रदेश की लोक संस्कृति को आगे बढ़ाने और बरकरार रखने की के लिए पहल शुरू की है।
बाली ने साफ किया है कि पालिसी बनाने के लिए महत्वपूर्ण सुझाव देेन वालों को पालिसी बनने के लिए उसके अनुपालन के लिए बनने वाली टीम का सदस्य भी बनाया जाएगा। मुख्यमंत्री के निर्देश पर अब सरकार इस क्षेत्र से जुड़े वादकों को प्रोत्साहित करने एवं
क्षेत्रीय से लेकर राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय मंचों तक इस फील्ड के एक्सट्रा आर्डिनरी कलाकारों को प्रतिनिधित्व उपलब्ध कराने का काम करेगी। साथ ही चंबा के रुमाल बनाने वाले कारीगरों, कांगड़ा पेंटिंग में दक्ष कलाकारों एवं पारंपरिक पहाड़ी शैली से लकड़ी से मंदिरों का निर्माण करने वाले कारीगरों के उत्थान के लिए भी नई नीति बनाने का प्रयास किया जाएगा।
ये वाद्ययंत्र हैं हिमाचल की पहचान
हिमाचल में इस समय शिमला, किन्नौर, सिरमौर, मंडी, कुल्लू से लेकर कांगड़ा-चंबा घाटी तक देव मिलन और अन्य सांस्कृतिक एवं मांगलिक कार्यकर्मों में अपनी तरह के अलग अलग वाद्य यंत्र बजाए जाते हैं। चंबा-चुराह घाटियों में घुरई खंजरी-रोमान जैसे वाद्य यंत्र बजाए जाते हैं।
इसी तरह प्रदेश में अन्य वाद्य यंत्र झांझ, मजीरा, खड़ताल, चिमटा, घड़ियाल, थाली, घुंघरू, कोकाठा, मुरचंग ढोल, ढोलकू, ढोलकी, नगाड़ा, ढमामा, दमंगटू, नगारट, गुज्जू, डौरू, हुडक तथा धौसा एवं मांगलिक कार्यों में बजने वाले रणसिंगा, करनाल, तुरही, बांसुरी अथवा विशुडी, शहनाई और पीपणी लोकप्रिय हैं।
इसलिए पड़ी जरूरत
बाली ने कहा कि वर्तमान समय में पीढ़ी दर पीढ़ी इस व्यवसाय से जुड़े कुशल वादक अब कम होते जा रहे हैं। लोगों का रहन सहन, मनोरंजन के तरीके बदल रहे हैं। ऐसे में हमारी संस्कृति इतिहास न हो जाए, इसलिए इस क्षेत्र से जुड़े लोगों को नीति बनाकर संरक्षण और प्रोत्साहन देने की जरूरत हे।
बाली बोले, पहचान बचाना जरूरी
कैबिनेट मंत्री जीएस बाली ने कहा कि इन सब लोक वाद्य यंत्रों की बनावट व उसे बजाने की कला पर अलग अलग परंपरा व क्षेत्रीय प्रभाव दिखता है। हिमाचल की घाटियों में लोक वादक या बजंतरी अपने परंपरागत लोक वाद्यों और वस्त्र आभूषणों के साथ जब उत्सवों में सम्मिलित होते हैं तो हिमाचल की संस्कृति को अनूठी पहचान मिलती है। ऐसे में हिमाचल की इस धरोहर को बचाना बेहद जरूरी है।